बुधवार, 31 अक्टूबर 2018

Statue of Unity : कृतज्ञ राष्ट्र की ऋणस्वीकारांजलि


आज भारत के प्रधानमंत्री, अग्रणी स्वतंत्रता सेनानी, वर्तमान भारत के शिल्पकार, दूरद्रष्टा, विघटीत स्वतंत्र भारत का एकीकरण करने वाले सरदार वल्लभभाई पटेल की 182 फ़ीट ऊंची प्रतिमा, जो की विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा होंगी “एकता की प्रतिमा” स्टेच्यू ऑफ यूनिटी के चरण-स्पर्श कर राष्ट्र की ओर से सरदार वल्लभभाई पटेल को ॠणस्वीकारांजली देंगे इससे आगे बढ़कर कहें तो स्वतंत्रता के पश्चात सरदार पटेल को हुए उन सभी अध्यायों का राष्ट्र के द्वारा कीया पश्चाताप ही हैं।
स्टेच्यु ऑफ युनिटी का भूमिपूजन 2013
सरदार सरोवर परियोजना नर्मदा बांध के पास साधु बेट पर रेकोर्ड 56 महिनों में ही तैयार किया गया है। विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा का सबसे पहला विचार 7 अक्टुबर 2007 में किया गया और इस विचार को कार्यान्वित करने हेतु गुजरात सरकार ने सरदार वल्लभभाई पटेल राष्ट्रीय एकता ट्रस्ट (SVPRET) की स्थापना की। सरदार वल्लभभाई पटेल की 138 वीं जन्मजयंती 31 अक्टूबर 2013 के दिन वर्तमान प्रधानमंत्री और उस समय के गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के ने भूमि पूजन करके इस प्रतिमा की निंव रखी । स्टेच्यु ऑफ युनिटी के नाम पर अलग-अलग कार्यक्रमों की एक मुहिम चलाई गई ।
किसानों के द्वारा लोहे का समर्पण
भारत के 6 लाख गांवों के किसानों ने इस योजना के लिए करीब 5000 टन लोहे के खेत के औजारों का समर्पण किया। बाद में इस लोहे को शुद्ध करने के बाद परियोजना के लिए उपयोग किया गया।
रन फॉर युनिटी (Run for Unity)
15 दिसंबर 2013 को समग्र भारत में अनेक जगहों पर रन फॉर युनिटी Run for Unity मैराथन दौड़ का आयोजन किया गया जिसमें हजारों लोगों ने स्वयंभु रजिस्ट्रेशन कर हिस्सा लिया।
सुराज पीटीशन
स्टेच्यु ऑफ युनिटी परियोजना के अंतर्गत सुराज पीटीशन का आयोजन किया गया जिसमें करीब 20 मिलियन नागरिकों ने सुराज के लिए अपने विचार लिखें और अपने हस्ताक्षर किए। सुराज पीटीशन पर हस्ताक्षर करके भारत के नागरिकों ने विश्व की सबसे ज्यादा लोगों द्वारा हस्ताक्षर की गई सबसे बड़ी पीटीशन का रेकॉर्ड बना दिया।
स्टेच्यु ऑफ युनिटी के विषय में पिछले कुछ दिनों से बहुत सारी जानकारियां प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक, सायबर मिडिया और सोशल मीडिया मिडिया के जरिए न केवल भारत अपितु सम्पूर्ण विश्व में प्रकाशित, प्रसारित एवं प्रचारित की जा रही है इसलिए उसी जानकारियों का पिष्टपेषण करना उचित नहीं होगा और स्वतंत्रता संग्राम में तथा स्वतंत्रता के पश्चात के सरदार वल्लभभाई पटेल का राष्ट्र के प्रति योगदान समग्र भारत जानता ही है इसलिए उसे भी दोहराना नहीं चाहुंगा, परंतु स्वतंत्रता के पश्चात भारत के लोह पुरुष कहे जाने वाले सरदार वल्लभभाई पटेल को इतिहास से भुलाने, मिटाने और अप्रस्तुत करने की जो कोशिशें हुईं उसे जानना आवश्यक है क्योंकि जब तक उन घृणित प्रयासों की जानकारी नहीं होंगी स्टेच्यु ऑफ युनिटी समज में नहीं आ सकता।
कोंग्रेस प्रेसिडेंट और स्वतंत्र भारत केप्रधानमंत्री पद के लिए हुआ अन्याय
सरदार वल्लभभाई पटेल प्रति अन्याय की शुरुआत स्वतंत्रता से पहले ही हो चुकी थी जब 1929 और 1937 में गांधीजी ने जवाहरलाल नेहरू को सरदार पटेल के बदले कोंग्रेस के प्रमुख के रूप में पसंद कीया था। स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के लिए कोंग्रेस की राज्य/प्रदेश की 15 कमेटियों में से 12 ने सरदार वल्लभभाई पटेल की दरख्वास्त की थी और बाकी की 3 कमेटी ओं ने कीसी भी नाम की दरख्वास्त नहीं की थी बावजूद इसके स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को बनाया गया। यह निर्णय जब डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने सुना तब उन्होंने कहा था “Gandhi had once again sacrificed his trusted lieutenant in favour of the ‘glamorous Nehru’.
संसद परिसर में सरदार पटेल की प्रथम प्रतिमा नहीं स्थापित की गई।
सरदार पटेल की मृत्यु 1950 में हुई उसके 13 वर्ष पश्चात 1963 में सरदार पटेल का पुतला दिल्ली के पटेल चौक में लगाया गया। इस प्रतिमा लगाने के पीछे के कुछ तथ्य जानने आवश्यक है। सरदार पटेल की प्रतिमा की तख्ति पर सरदार के विषय में क्या लिखा जाए ? ऐसी चर्चा हुई तब श्री जवाहरलाल नेहरू ने प्रस्ताव कीया के “Architect Of Indian Unity” ऐसा लिखा जाए, जो मंजुर भी किया गया, सुनने में जो कीतना अच्छा लगता है परंतु जब प्रतिमा का अनावरण किया गया तब तख्ति पर लिखा मिला “Architect Of Nation”. इस प्रतिमा का अनावरण सरदार पटेल की 88 वीं जन्मजयंती की प्रतिक्षा ना करते हुए करीब डेढ़ माह पहले 18 सितंबर 1963 को ही संसद के प्रांगण में न रखकर संसद मार्ग के दुसरे चौराहे पर कर दिया गया प्रश्न यह उठता है कि सरदार वल्लभभाई पटेल की प्रतिमा को संसद के प्रांगण में क्युं नहीं स्थापित किया ? और अनावरण के लिए उनके जन्मदिन तक प्रतिक्षा क्यों नहीं की गई ? जबकि तीन महीने पहले ही जवाहरलाल नेहरू के पिता एवं कोंग्रेस के पूर्व प्रमुख श्री मोतीलाल नेहरू की प्रतिमा का अनावरण उनके 102 वें जन्मदिन 6/05/1963 पर संसद के प्रांगण में ही कीया गया था।
संसद के प्रांगण में नेताओं की प्रतिमाओं का इतिहास और सरदार पटेल
संसद के प्रांगण में सबसे पहली 12.5 फीट की प्रतिमा जवाहरलाल नेहरू के पिता एवं कोंग्रेस के पूर्व प्रमुख मोतीलाल नेहरू की 1963 में लगाई गई, बाद में श्री गोपालकृष्ण गोखले की प्रतिमा लगाई गई जीसकी ऊंचाई 3.5 फ़ीट थी। स्वतंत्र भारत के संविधान निर्माता डॉ बाबासाहेब आंबेडकर की 18 फ़ीट की प्रतिमा 1967 में, महात्मा गांधी की प्रतिमा 1993 में, जवाहरलाल नेहरू की प्रतिमा 1995 में की स्थापना की गई। 1996 में संसद के प्रांगण में श्रीमती इंदिरा गांधी और मौलाना अबुल कलाम आजाद की 18-18 फ़ीट की प्रतिमा ओं का अनावरण किया गया। उसके बाद सरदार वल्लभभाई पटेल की प्रतिमा 1998 में संसद के प्रांगण में स्थापित की गई, यहां इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि 1998 में भारत के प्रथम गैर-कोंग्रेसी प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेई सत्तारूढ़ थे और सरदार वल्लभभाई पटेल की प्रतिमा प्रायोजित की थी गुजरात सरकार ने वो भी गैर-कोंग्रेसी थी ।
संसद परिसर में तैलचित्रों का इतिहास अर्थात् सरदार पटेल की अवगणना का दस्तावेज
सरदार पटेल की प्रतिभा और उनके राष्ट्र के प्रति उनके योगदान को भुलाने की जो कोशिशें की गईं उसका साक्षी संसद परिसर भी है। संसद परिसर में भारत के इतिहास के महान राष्ट्रप्रेमी ओं के तैल चित्र लगाएं जाते हैं।
संसद परिसर में सबसे पहला तैल चित्र महात्मा गांधी का 28/08/1947 में लगाया गया। बाद में श्री बालगंगाधर तिलक का 28/07/1956 में, श्री लाला लाजपतराय का 17/11/1956 में तैल चित्र लगाएं गये। 30/03/1957 में मोतीलाल नेहरू का तैल चित्र लगाया गया। मौलाना अबुल कलाम आजाद की मृत्यु 22/02/1958 को हुई और केवल आठ दिन बाद उनका तैल चित्र संसद परिसर में लगाने की दरख्वास्त की गई 16/12/1959 में उनका तैल चित्र लगाया गया। सरदार वल्लभभाई पटेल की मृत्यु 15/12/1950 को हुई और आठ वर्षों के बाद उनका तैल चित्र लगाया गया 23/04/1958 के दिन।
  • श्री जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु 27/05/1964 को हुई और उनका तैल चित्र 05/05/1966 में लगाया गया।
  • श्रीमती इंदिरा गांधी की मृत्यु 31/10/1984 के दिन हुई और उनका तैल चित्र लगाया गया 19/04/1987 में जब 1988-89 में चुनाव आ रहे थे और तत्कालीन प्रधानमंत्री पर भ्रष्टाचार के सीधे आरोप लगाये गये थे।
  • श्री राजीव गांधी की मृत्यु 21/05/1991 में हुई और उनका तैल चित्र 20/08/1993 में ही संसद परिसर में स्थापित किया गया।
  • डॉ बाबासाहेब आंबेडकर का परिनिर्वाण 06/12/1956 में हुआ और तैल चित्र लगाया गया 12/04/1990 जब भाजपा समर्थित गैर कोंग्रेसी सरकार सत्तारूढ़ थी।
राष्ट्रीय संग्रहालयों की स्थापना और सरदार पटेल की अवगणना का इतिहास
स्वतंत्रता के बाद गांधीजी जहां रहा करते थे ऐसे बिरला हाउस और मुम्बई के मणीभुवन को उसके मालिकों से लेकर संग्रहालय बना दिया गया, जवाहरलाल नेहरू जिस घर में रहते थे उस तिनमूर्ति भवन का भी संग्रहालय बना दिया गया परंतु सरदार वल्लभभाई पटेल का खुद का घर नहीं था और दिल्ली में बनवारीलाल जी के घर में रहते थे वहां आजतक कोई संग्रहालय नहीं बनाया गया।
भारत रत्न सन्मान और सरदार पटेल की अवगणना
भारत रत्न सन्मान भारत का सबसे बड़ा नागरिक पुरस्कार है। इस सर्वोच्च नागरिक सम्मान देने में भी सरदार वल्लभभाई पटेल को अन्याय कीया गया। भारत रत्न सन्मान देने का इतिहास देखें तो एक परिवार के महिमा मंडन करने करने की कोशिश जितनी स्पष्ट हो जाती है साथ साथ सरदार वल्लभभाई पटेल के राष्ट्र के प्रति योगदान को भुलाने, मिटाने की कोशिश भी उतनी ही उजागर होती है। कुछ तारीखें और तवारिख देखते हैं भारत रत्न सन्मान की………
  • श्री जवाहरलाल नेहरू को भारत रत्न 1955 में मिला जब वो खुद प्रधानमंत्री थे
  • श्रीमती इंदिरा गांधी को भारत रत्न सन्मान 1971 में दिया गया जब वो खुद प्रधानमंत्री थीं।
  • श्री राजीव गांधी की मृत्यु 21 मे 1991 को हुई और एक ही महीने के बाद उनको भारत रत्न सन्मान मिल गया।
  • यह तो भारत के नागरिकों को मिलें भारत रत्न सन्मान की बात है विदेशी नागरिक नेल्सन मंडेला को 1990 में दिया गया।
  • मदर टेरेसा को 1980 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया ।
  • भारत के एक राज्य के मुख्यमंत्री और फिल्मएक्टर एम.जी. रामचंद्रन को 1988 में भारत रत्न दिया गया।
उपरोक्त तवारिख खुद की साक्षी है सरदार पटेल के अपमान की। प्रश्न यह है कि सरदार वल्लभभाई पटेल को भारत रत्न से कब सन्मानित कीया गया ?
सरदार वल्लभभाई पटेल को 1991 में राजीव गांधी के साथ भारत रत्न सन्मान दिया गया।
इससे एक तरिके से सरदार वल्लभभाई पटेल के राष्ट्र के प्रति योगदान और राजीव गांधी के योगदान को समान दिखाने की कोशिश की गई जो कि सरदार पटेल का एक द्रष्टिकोण से अपमान ही था।
इस पुरे लेख को लिखने का उद्देश्य सरदार वल्लभभाई पटेल को हुए अन्यायों को याद करते हुए यह समजने का प्रयास था कि उनकी 182 मीटर की विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा Statue of Unity एकता की प्रतिमा केवल एक प्रतिमा नहीं है और ना ही इस प्रतिमा को प्रतिमा के स्वरुप में देखा जाए ।
Statue of Unity एकता की प्रतिमा समर्थ भारत की सरदार वल्लभभाई पटेल को दी गई ऋणांजलि है।
Statue of Unity एकता की प्रतिमा सरदार वल्लभभाई पटेल का राष्ट्र के प्रति योगदान का स्वीकार है।
Statue of Unity एकता की प्रतिमा सरदार वल्लभभाई पटेल की अवगणनाओं का राष्ट्र का कृतज्ञतापूर्वक किया प्रायश्चित है।
भारत के नामी कवि श्री हरिवंशराय बच्चन की सरदार वल्लभभाई पटेल पर लिखी कविता लिखकर मैं सरदार पटेल को नतमस्तक हो वंदन करता हुं।
यही प्रसिद्ध लोह का पुरुष प्रबल,
यही प्रसिद्ध शक्ति की शिला अटल,
हिला इसे सका कभी न कोई शत्रु दल,
पटेल पर स्वदेश को गुमान है।
सुबुद्धि उच्च श्रुंग पर किए जगह,
ह्रदय गंभीर है समुद्र की तरह,
कदम छुए हुए जमीन की तरह,
पटेल देश के निगाह-बान है ।
हरेक पक्ष को पटेल तोलता,
हरेक भेद को पटेल खोलता,
दुराव या छिपाव से उसे गरज ?
कठोर नग्न सत्य बोलता,

पटेल हिंद के निडर जबान है

सोमवार, 29 अक्टूबर 2018

नये भारत की नई ट्रेन : T-18 और भारतीय रेलवे का विश्लेषण : पार्ट -1

आज नये भारत की नई ट्रेन T-18 या Train-18 का ट्रायल होने वाला है। कुछ समय से सोश्यल मिडिया में इस ट्रेन के विषय में कुछ ना कुछ लिखा जा रहा है साथ अखबारों एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भी थोड़ी थोड़ी झलकियां दि जा रही है इस नये भारत की नई ट्रेन के लिए।
इस ट्रेन के विषय में जानने से पहले भारतीय रेल के विकास और इतिहास की जानकारी उपलब्ध करना निहायत ही आवश्यक है अन्यथा ऐसी योजना या ऐसी ट्रेन की आवश्यकता क्यों है ? कितनी है और इससे क्या फायदा है यह समज पाने में दिक्कत होने की संभावना है।
भारतीय रेल का सर्व प्रथम प्रस्ताव 1832 में रखा गया जीस के पीछे अंग्रेजों का उद्देश्य अपनी सेना, पत्र व्यवहार, शस्त्रों की जल्द हेराफेरी करना ही था। भारत की सर्व प्रथम ट्रेन रेड हिल के नाम से जिसे आर्थर कोटन ने बनाया था, 1837 में रेड हिल से चिंताड्रीपेट ब्रीज के बीच तत्कालिन मद्रास में चली थी। उसके बाद लगातार रेलवे का विकास होता रहा।
भारतीय रेलवे के विकास की प्रक्रिया स्वतंत्रता के पश्चात भी जारी रहा। आज भारतीय रेलवे विश्व में तिसरे और एशिया की दूसरे नंबर की सबसे बड़ी रेलवे है।
भारतीय रेलवे के विकास का विष्लेषण एवं आकलन करना आवश्यक लगता है परंतु भारतीय रेलवे के विकास की तुलना विश्व के संदर्भ में करना राष्ट्र के साथ अन्याय होगा इसलिए भारतीय रेलवे की तुलना एक ऐसे राष्ट्र की रेलवे से करनी चाहिए जो रेलवे के संबंध में समकालीन हो। संशोधन के पश्चात ऐसा एक ही राष्ट्र विश्व के पटल पर नजर आता है और वो है भारत के साथ धोखाधड़ी करने वाला और मित्र के महोरे के पीछे छुपा हुआ दुश्मन देश चीन।
भारत और चीन की स्वतंत्रता एवं रेलवे की शुरुआत
भारत 1947 अगस्त में स्वतंत्र हुआ वहां चीन को अक्टुबर 1949 में स्वतंत्रता मिली। भारतीय रेलवे की शुरुआत 1837 में हुई वहां चीन में रेलवे की शुरुआत 1864 में हुई। यह दोनों बातें स्पष्ट कर रही है कि भारत के मुकाबले चीन दो वर्ष बाद स्वतंत्र हुआ और रेलवे की शुरुआत भी भारत के मुकाबले करीब 30 वर्ष बाद ही हुई थी।
भारत और चीन रेलवे के विकास की तुलना
1947 में जब भारत को स्वतंत्रता मिली तब भारत में 53596 किलोमीटर का रेलवे ट्रेक था और जब की चीन के पास 1945 में 27000 किलोमीटर रेलवे ट्रेक था । आज की भारत और चीन की रेलवे की तुलना करने पर कुछ तथ्य मिलते हैं ….. भारत की रेलवे के पास 1,21,407 किलोमीटर का कुल ट्रेक है जिसमें से 93902 किलोमीटर का ट्रेक रनिंग ट्रेक है और कुल मिलाकर रेलवे ट्रेक की लंबाई 67368 किलोमीटर है जो चीन के 1,27,000 किलोमीटर के दायरे से काफी कम है। यह तो हुई रेलवे ट्रेक की लंबाई की तुलना भारत की रेलवे चीन की रेलवे की तुलना में काफी पीछे नजर आती है कुछ उदाहरण यहां रखने यह बात अपने आप ही स्पष्ट हो जाएगी।
  • भारत और चीन के रेलवे ट्रैक के इलेक्ट्रीफिकेशन की तुलना
भारत के कुल रेलवे ट्रेक में से इलेक्ट्रीफाइड ट्रेक 31-03-2018 के आंकड़ों के अनुसार 33057 किलोमीटर था जहां चीन के पास इलेक्ट्रीफाइड रेलवे ट्रेक करीब 87000 किलोमीटर है अर्थात चीन अपने कुल रेलवे ट्रैक का 68.50% इलेक्ट्रीफीकेशन कर चुका है वहां भारत अपने कुल ट्रेक के 27% और कुल लंबाई के केवल 49% रेलवे ट्रेक का इलेक्ट्रीफीकेशन कर पाया है। चीन के पास डबल या मल्टी ट्रेक की लंबाई करीब 72000 किलोमीटर है और भारतीय रेलवे के ऐसे आंकड़े मिल नहीं पाये है, ठीक ऐसे ही चीन के कुल रेलवे ट्रैक का करीब 19000 – 25000 किलोमीटर ट्रैक हाई स्पीड ट्रैक है वहां भारत की रेलवे के ऐसे आंकड़े नहीं मिल पाये है।
  • भारत और चीन की ट्रेनों की गति की तुलना
भारत और चीन की ट्रैनों की औसत गति की तुलना करने पर भारतीय रेलवे का एक “बेचारा” जैसा स्वरुप सामने आता है। भारत की ट्रैनों की जहां औसतन गति (Speed) 50.9 किलोमीटर प्रतिघंटा की है वहां चीन की ट्रैनों की औसतन गति 88 किलोमीटर प्रतिघंटा है । हाइ स्पीड ट्रेनों की रफ्तार की तुलना करने पर भारतीय रेलवे शायद रेलवे की शुरुआत के दौर में ही दिखती है। चीन की हाई स्पीड (लंबी दूरी) ट्रेनों की औसतन गति 300 किलोमीटर प्रतिघंटा है और भारतीय रेलवे की हाई स्पीड ट्रेनों की गति औसतन 88 किलोमीटर प्रतिघंटा है।
यह तुलना केवल बुनियादी विषय पर ही की गई है, मुनाफा-नुकशान,कुल स्टेशनों की संख्या, यात्रियों की संख्या, माल की ढुलाई, रेलवे स्टेशनों पर उपलब्ध सुविधाएं, कर्मचारियों की कार्यक्षमता और कार्य के प्रति जागरूकता एवं प्रतिबद्धता, यात्रियों की सुविधा, सलामती, सुरक्षा एवं संरक्षा, भ्रष्टाचार, योजनाओं को कार्यान्वित करने की क्षमता और योग्यता तथा इच्छाशक्ति, रेल मंत्री जी के द्वारा अपनाया गया प्रांतवाद और परिणाम स्वरुप भारतीय रेलवे का असंतुलित विस्तार ऐसे कई पहलुओं पर विचार और तुलनात्मक समीक्षा हो सकती है और परिणाम क्या होगा यह हम जानते ही हैं।
चीन से ही तुलना क्यों ?
भारत के साथ कइ ऐसी बातें हैं जो चीन से मिलती जुलती है, वैसे भारत की समानता सबसे ज्यादा विषयों पर पाकिस्तान के साथ है परंतु जहां भारत आज विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था ओं में शामिल हैं वहां पाकिस्तान करीब करीब दिवालिया हो चुका है। वैसे भारतीय रेलवे की तुलना जापान की रेलवे से करना संपूर्ण अनुचित होगा, दुसरे कीसी एशियन या युरोपीयन देश के साथ भारतीय रेलवे की तुलना करना भारतीय रेलवे के साथ अन्याय होता इसलिए भारतीय रेलवे की तुलना चीन की रेलवे से की है।
अब सवाल यह है कि T-19 या ट्रेन-19 क्या है ? इस लेख के अगले अंक में प्रकाशित होगा इस प्रश्न का उत्तर ।

बुधवार, 17 अक्टूबर 2018

पाकिस्तान का कश्मीर पर कब्जा करने का नापाक षड्यंत्र : ओपरेशन टोपाक - पार्ट 2

वर्ष 1971 जीसे पाकिस्तान कभी भुल नहीं सकता, करीब एक लाख पाकिस्तानी सैनिकों ने भारतीय सेना के सामने समर्पण कर हथियार डाल दिए थे और पाकिस्तान के दो टुकड़े कर विश्व के पटल पर नये राष्ट्र का निर्माण किया था भारत की सेना ने। 1948, 1965 और 1974 की शर्मनाक हार के बाद पाकिस्तान और उसकी सेना को यह वास्तविकता समज में आ गई थी की भारत को युद्ध के मैदान में वो कभी नहीं हरा सकता, इस लिए पाकिस्तान के तत्कालीन लश्करी तानाशाह जनरल जीया उल हक़ कश्मीर पर कब्जा करने के लिए एवं भारत की एकता को तोड़ने के लिए एक षड्यंत्र रचा जिसका नाम ओपरेशन टोपाक था, इस षड्यंत्र की विस्तृत जानकारी जनरल जीया उल हक़ ने आइएसआइ के लोगों को 1988 अप्रैल में प्रेजेंटेशन के जरिए दी। तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल जिया-उल-हक ने 1988 में भारत के विरुद्ध ‘ऑपरेशन टोपाक’ नाम से ‘वॉर विद लो इंटेंसिटी’ की योजना बनाई। इस योजना के तहत भारतीय कश्मीर के लोगों के मन में अलगाववाद और भारत के प्रति नफरत के बीज बोने थे और फिर उन्हीं के हाथों में हथियार थमाने थे।
जनरल जीया उल हक़ आइएसआइ के लोगों को अपनेओपरेशन टोपाक का विस्तृत वर्णन किया है। कैसा होगा, कौन चलायेगा, क्या चाहते हैं, क्या लक्ष्य है, क्या मिलेगा और क्या पाकिस्तान चाहता है ? जीया उल हक़ कहते हैं…..
यहां हमें युद्ध के उन तरीकों को अपनाना होगा जिसे कश्मीरी स्वीकार करें और उसमें जुड़े, दुसरे शब्दों में कहें तो सैन्य कार्रवाई न करके कश्मीरी के नैतिक और भौतिक मूल्यों का समन्वित इस्तेमाल करना चाहिए जिससे हमारे दुश्मन की इच्छाशक्ति को नष्ट कर दें, उसकी राजनीतिक क्षमता को खत्म कर दुनिया के सामने एक दमनकारी के रूप में उसे दिखा सकें। जैन्टलमेन हमने शुरुआत में यह लक्ष्यांक पाना है ।
इतना कहकर जीया उल हक़ ने कश्मीर पर कब्जा करने और भारत के विरुद्ध छद्मयुद्ध केअपने षड्यंत्र का आयोजन बताया।
पहले चरण में एक दो वर्ष हमें हमारे कश्मीरी भाईयों को सत्ता में आने के लिए सहायता करने की कोशिश करनी होंगी। मैं यह बताना चाहता हूं कि बिना दिल्ली की सरकार की रजामंदी के कश्मीर में सरकार नहीं चला सकते। यह कहना अवास्तविक होगा कि एमयुएफ या उसके जैसा अन्य कोई गुट डेमोक्रेटिक या अन्य तरीके से सत्ता में आ सकते हैं। सत्ता दिल्ली जिसकी तरफदारी करेंगी उसी के पास होंगी। इसलिए हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि शासक इलाइट वर्ग के कुछ खास पसंदीदा राजनेताओं को हमें चुनना होगा जो हमें सत्ता के सभी प्रभावी अंगो को हथियाने में मदद करते रहें । संक्षेप में कश्मीर पर कब्जा करने की योजना जीसे ओप. टोपाक ऐसा सांकेतिक नाम दिया है।
इसके बाद जीया उल हक़ ने ओपरेशन टोपाक का विस्तृत वर्णन किया। जो कुछ ऐसा था।
Phase 1 : चरण 1
  • सरकार के विरुद्ध छोटे स्तर पर विद्रोह जगाना है परंतु यह ध्यान रखना है कि विद्रोह इतना बड़ा न हो ताकि जम्मु और कश्मीर में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया जाय।
  • हमारा समर्थन करने वाले लोगों को सरकार में महत्वपूर्ण पदों पर कब्जा करने में मदद करें जिससे वो पुलिस बल, वित्तिय संस्थान, संचार नेटवर्क और अन्य महत्वपूर्ण संस्था ओं को तोड सकें और हमारे विरुद्ध होनेवाली गतिविधियों की जानकारियां हमें मिलती रहें।
  • हमें किसानों और छात्रों को आगे रखकर भारत विरोधी भावनाओं को भड़काना है, धार्मिक भावनाओं को भड़काकर इस्तेमाल करना होगा जिससे हमें दंगे करवाने में और सरकार एवं भारत के विरुद्ध प्रदर्शनों में छात्रों एवं किसानों का सक्रिय सहयोग मिल सकें।
  • शुरुआत में कश्मीर घाटी में स्थित सुरक्षा बलों से निपटने के लिए घाटी के सक्षम विध्वंशकारी गुटों को व्यवस्थित और प्रशिक्षित किया जाय ।
  • जम्मु और कश्मीर तथा कश्मीर में लडाख के बीच की संचार एवं यातायात नेटवर्क को काटना है, इससे सुरक्षा बलों को बहार से सहायता नहीं मिल पायेगी । विशेषकर उस सड़क को टारगेट करना है जो सड़क जोजिला से कारगील तथा जो सड़क जोजिला से खरडुंगला जाती है ।
  • सरकार का ध्यान घाटी से हटाने के लिए सिख चरमपंथियों के साथ मिलकर जम्मु में अराजकता और आतंक खड़ा करें । इससे हिंदुओं के मन में भी सरकार के विरुद्ध भावनाएं खडी हो पाएगी।
  • कश्मीर घाटी में जहां जहां सेना स्थित या तैनात नहीं है ऐसे भागों पर नियंत्रण स्थापित किया जाए, इसके लिए दक्षिण कश्मीर सबसे उचित क्षेत्र है।
Phase 2 : चरण 2
  • मुख्य कश्मीर घाटी से सेना का ध्यान एवं तैनाती हटाने या कम करने के लिए सियाचिन, कारगील, राजौरी-पुंछ जैसे क्षेत्रो में लश्करी दबाव बढ़ाया जाए।
  • समय आने पर श्रीनगर, पट्टन, कुपवाड़ा, बारामुला और चौकिवाला में स्थित भारतीय सेना के बैस डिपो एवं हमला कर खत्म कीए जाए।
  • ओपरेशन जिब्राल्टर के सबकों से सिखना होगा। अफगानी मुजाहिदीनों को “आजाद” कश्मीर में बसाकर कश्मीर घाटी के पाकिस्तानी आतंकी ओं के प्रभाव वाले क्षेत्रों में घुसपैठ करानी होगी। इस पहलु को कार्यान्वित करने के लिए विस्तृत, सरल और विशेष योजना की आवश्यकता होगीं।
  • आजाद कश्मीर में स्थित सेवा निवृत्त सेना अधिकारियों का समूह अफगानी मुजाहिदीनों को भारतीय एयर फिल्ड, रेडियो स्टेशन पर हमलें करने के लिए और बैनीहाल सुरंग तथा कारगील लेह राजमार्ग को ब्लोक करने का प्रशिक्षण देकर तैयार करेंगे ।
  • ओपरेशन टोपाक के एक निश्चित समय पर पंजाब तथा जम्मु और कश्मीर के आसन्न क्षेत्रों में पाकिस्तानी सेना आक्रामक रवैया अपनाकर अतिरिक्त दबाव बनाएं रखें।
Phase 3 : चरण 3
ओपरेशन टोपाक के तिसरे चरण का विस्तृत वर्णन करते हुए जनरल जीया उल हक़ ने जो कहा वो भारत की एकता और अखंडता के लिए बहुत ही चिंताजनक था। जनरल जीया उल हक़ ने कहा :
“कश्मीर घाटी की मुक्ति के लिए विशेष योजना का हमारा लक्ष्य एक स्वतंत्र इस्लामिक देश की रचना करना है जो हमारे नियंत्रण में रहेगा।
हमारे पास ज्यादा वक्त नहीं है। भारत के आम चुनावों से पहले और जबतक भारत की सेना श्रीलंका में फंसी है तब तक हमें ज्यादा से ज्यादा दबाव बनाना शुरू कर देना चाहिए। अल्लाह ताला की दुआ है कि हमें अफगानी लड़ाकों को लिए अमेरिका से बडी संख्या में आधुनिक हथियार एवं गोला-बारूद मिला है जिसका इस्तेमाल हम कश्मीर में करेंगे , यह आधुनिक हथियार एवं गोला-बारूद हमारे कश्मीरी भाईयों को हमारे दिए लक्ष्य को हासिल करने में मदद करेगा। हमें शुरुआत में आजाद कश्मीर की तरह वहां आजाद कश्मीर जैसे क्षेत्र बनाने है तो हमारा लक्ष्य इतना दूर नहीं दिखेगा जितना आज दिखता है । साथ ही साथ हमें भारत की इनफन्ट्री का ध्यान रखना होगा जो श्रीलंका की स्थति से विशेष रूप से प्रशिक्षित है और अनुभवी भी है,इस इनफन्ट्री का खासकर हाल की घटनाएं एवं परिस्थितियों के लिए और विशेष रूप से उत्तर पूर्व क्षेत्रो में कारवाई करने में सक्षम है।
परंतु कश्मीर की स्थिति संपूर्ण रुप से अलग बनानी होंगी और इसके लिए कस्बों में फिलिस्तीनी “इन्फेटाडा” और ग्रामीण क्षेत्रों में मुजाहिदीन की पैटर्न पर बड़े पैमाने पर हमलें करने होंगे क्योंकि कश्मीर में अराजकता का माहौल ज्यादा समय तक रहना आवश्यक है।
और इस पर हमारे मित्र चीन क्या करेगा ? हमारा मित्र चीन यह सुनिश्चित करेगा कि उनके सामने तैनात की गई भारतीय सेना वहां से हटे नहीं इसके लिए जो करना होगा वो चीन करेगा । परंतु यह हमारे ओपरेशन के तिसरे और अंतिम चरण में तब आवश्यक होगा अगर हम कीसी गंभीर मुश्किल परिस्थितियों में आ जाए। ओफकोर्स, हमारे जो शक्तिशाली मित्र देश है वो हमें एक या दुसरे समय पर बचाने हमारी मदद करेंगे। वो यह सुनिश्चित करेंगे कि हम जीते भले ही नहीं परंतु हमारी हार न हो।
आखिरकार, मैं आपको फिर से सावधान करना चाहता हुं की भारत से सीधे लड़कर कुछ भी हासिल करने का विश्वास करना भी विनाशकारी होगा। हमें हमारी सेना को लो प्रोफाइल पर रखना होगा, हमारा ध्यान इस ओर होना चाहिए कि भारत को चरण 1 या चरण 2 के समय ऐसी कोई स्थिति का निर्माण न हो जिसका आधार लेकर भारत पाकिस्तान पर सीधे हमला करें। हमें इस ओपरेशन के प्रत्येक चरण को रोकना, मुल्यांकन करना और जरुरत पड़ने पर बदलाव करना होगा क्योंकि रणनिती और योजनाओं को कुछ परिस्थितियों में कठोर परिवर्तन की आवश्यकता हो सकती है। मुजे ईस बात पर जोर देना जरूरी लगता है कि प्रत्येक चरण में स्थति का जानबूझकर और उद्देश्यपूर्ण मुल्यांकन सुनिश्चित किया जाना चाहिए तभी पाकिस्तान के लिए कोई दिक्कत नहीं होगी।”
बाद में इस षड्यंत्र में बदलाव किए गए। जिसके तहत चौथे चरण में गैर मुस्लिम को कश्मीर से भगाया गया और कश्मीर नहीं छोड़ने वाले गैर मुस्लिम की हत्याएं की गई।
इसके पांचवें चरण में यह लक्ष्यांक पाना तय किया गया कि कश्मीर में बड़े पैमाने पर लोगों को पुलिस बल के खिलाफ भड़काकर हिंसा फैलाना, सरे-आम भारत विरोधी नारेबाजी करवाना, भारत से खिलाफत करवाना तथा राज्य पुलिस बल के जवानों की हत्याएं करना तथा उन्हें राज्य पुलिस की नौकरी छोड़ने के लिए मजबूर करना। आज कश्मीर इस चरण का शिकार हैं।
इसके बाद अंतिम एवं निर्णायक चरण के तहत कश्मीर में अराजकता फैला कर आंतरिक गड़बड़ पैदा करना, उपरांत सीमाओं पर बड़े पैमाने पर हमले करने की योजना को अंजाम देना ताकि एक ओर से भारतीय सेनाओं पर पाक सेना हमले करे तो दूसरी ओर से घुसपैठ में सफल होने वाले आतंकवादी और स्थानीय अलगावावादी ।
विश्वस्त सूत्रों एवं रक्षा विशेषज्ञों की मानें तो पाकिस्तान अब ओपरेशन टोपाक के अंतिम चरण को लागु करने की तैयारी में जुट गया है। स्थानिक एवं विदेशी आतंकवादी उतनी संख्या में उपलब्ध नहीं होने के कारण पाकिस्तान अपनी सेना के चुनिंदा, प्रशिक्षित सैनिकों को जम्मु और कश्मीर में घुसपैठियों के रूप में भेजने की सोच में है।
भारत के विरुद्ध इतनी गहरी और बडी साजीस का पता राजनीतिक लोगों को नहीं होगा ऐसा मानना शायद मुर्खता हो सकती है, भारतीय नेताओं की ढ़ीली ढाली निती, और रवैये की वजह से ही आज ओपरेशन टोपाक अपने पहले, दुसरे, तीसरे और सभी चरणों को पार कर अपने आखिरी चरण में सफलतापूर्वक पहुंच गया है ।

सोमवार, 15 अक्टूबर 2018

जम्मु और कश्मीर पर कब्जा करने का नापाक षड्यंत्र : ओपरेशन टोपाक - पार्ट 1

स्वतंत्रता के समय अंग्रेजों ने षड्यंत्र के तहत भारत को अनेक रजवाड़ों में बिखेरा था परंतु सरदार वल्लभभाई पटेल ने दीर्घदृष्टि, चतुराईपूर्वक करीब 562 रजवाड़ों को भारतीय संघ में जोड़कर एकीकृत भारत के नक्शे का निर्माण किया । 1947 से ही पाकिस्तान की मंशा जम्मु और कश्मीर पर कब्जा करने की थी, स्वतंत्रता दिवस से ही भारत के लिए जम्मु और कश्मीर तत्कालिन प्रधानमंत्री श्री की ढीली, द्रष्टीहीन, एक तरफा नीति के चलते एक हमेशा तकलीफ देनेवाला राज्य बन गया जिसके लिए भारत को पाकिस्तान के साथ तीन तीन युद्ध लड़ने पड़े और प्रत्येक बार पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ी।
शौर्यवान भारतीय सेना ने पाकिस्तान को 1971 में दो टुकड़ों में विभाजित कर विश्व के पटल पर एक नये राष्ट्र का निर्माण किया, करीब एक लाख पाकिस्तानी सैनिकों ने भारतीय सेना के सामने समर्पण कर हथियार डाल दिए थे हालांकि वह बात अलग है कि भारत की सेना जो युद्ध के मैदान में जीतकर लाती है उसे राजनीतिक नेतृत्व टेबल पर हार जाते हैं, 1971 के युद्ध में भी यही हुआ और सिमला में जो हुआ वो इतिहास है।
1971 की हार पाकिस्तान की सेना को करारा तमाचा था और इस हार का बदला लेने के लिए काबुल के पाकीस्तान मिलिट्री एकेडमी के न सैनिकों को सोगंध दिलाई गई थी । 1971 की करारी हार के बाद पाकिस्तान को एक बात अच्छी तरह समझ में आ गई थी की भारत को युद्ध में हराना उसके लिए न केवल मुश्किल परंतु असंभव है। ईस वास्तविकता को पहचान पाकिस्तान ने अपनी रणनीति में आमूल परिवर्तन कर भारत के साथ छद्म युद्ध छेड़ने का षड्यंत्र रचा जिस षड्यंत्र का पर्दाफाश जुलाई 1989 के में इंडियन डिफेंस रिव्यू (IDR) में पहली बार किया गया। संपूर्ण आर्टीकल पढ़ने के बाद आज जम्मु और कश्मीर में जिस तरह स्थानिक पुलिस, कश्मीरी युवा जो रक्षा विभाग में कार्यरत हैं उन पर जो हमलें हो रहें हैं और उनकी जो हत्याएं हो रही है उसके पीछे का रहस्योद्घाटन हो जाता है। ओपरेशन टोपाक के तहत उन स्थानिक कश्मीरीओं पर हमले और उनकी हत्या करना अंतिम चरण है।
क्या है ओपरेशन टोपाक :
1971 की करारी हार और अपना आधा हिस्सा खोने के बाद पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने कश्मीर पर कब्जा करने के लिए भारत के साथ 1000 वर्ष लड़ने की गिदड भभकी दी थी, परंतु वो खुद 10 वर्ष तक पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नहीं रह पाये, जीया उल हक़ ने बगावत कर 1979 में भुट्टो को फांसी पर लटका दिया।
अब पाकिस्तान लश्करी शासन की एड़ी के नीचे आ चुका था। दुसरी तरफ अफगानिस्तान में तालिबान का उद्भव हुआ, और अब 1971 के वैश्विक अपमान का बदला लेने के लिए, छद्म युद्ध छेड़ने के लिए जनरल जीया उल हक़ की अगुवाई में षड्यंत्र रचा गया, जिसका नाम ” ओपरेशन टोपाक” 
भारतीय जासूसी संस्था रो “रिसर्च एंड एनालिसिस विंग” (RAW) के जांबाज जासूसों ने जीया उल हक़ ने अप्रैल 1988 में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई (Inter Service Intelligence – ISI) के सामने जो प्रेजन्टेशन दिया था उसके सबूत इकट्ठा कर “ओपरेशन टोपाक” का पर्दाफाश किया। भारत के विरुद्ध यह एक छद्म युद्ध था । शुरुआत में यह षड्यंत्र को तीन चरणों में कार्यरत करने की बात हुई जिसे बाद में तीन और चरण जोड़कर 6 चरण तय कीए गये और प्रत्येक चरण में क्या करना है उसकी रणनीति बनाई गई।
जीया उल हक़ ने 1988 अप्रैल में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के सामने जो प्रेजन्टेशन दिया था उसकी शुरुआत के अंश कुछ यह थे “ जैन्टलमेन, मैंने इस विषय पर काफी समय पहले बात की है इसलिए मैं विवरणों में नहीं जाउंगा। आप जानते हैं कि इस्लाम के लिए अफगानिस्तान में हमारी व्यस्तता के कारण यह योजना आपके सामने पहले नहीं रख पाया । हमारा लक्ष्य स्पष्ट और द्रढ है कि कश्मीर घाटी की मुक्ति, घाटी के हमारे कश्मीरी मुस्लिम भाईयों को अब ज्यादा समय तक भारत के साथ नहीं रहने दिया जा सकता । अतीत में हमने सैन्य और हथियारों के विकल्प का चयन कर इस्तेमाल किया था परंतु हम सफल नहीं हो पाए। इसलिएजैसे कि मैंने पहले उल्लेख किया अब हमने सैन्य के विकल्प को आखिरी रखा है और वो भी आवश्यकता पड़ने पर ही। कश्मीर घाटी के हमारे भाई दिल और दिमाग से हमारे साथ है और हमारी विचारधारा वाले हैं। हालांकि जैसे पंजाबी और अफगानी लोग में विदेशी प्रभुत्व के खिलाफ युद्ध को जितनी स्वाभाविकता से स्वीकार्य है ऐसा कश्मीरीओं में स्वीकार्य नहीं है। हालांकि कश्मीरीओं में कुछ गुण है जिसका हम इस्तेमाल कर सकते हैं, पहला गुण है उनकी चतुराई और बुद्धि, दबाव में अपने को संरक्षित करने की शक्ति और तीसरा अगर मैं कहुं तो वो अपनी राजनीतिक चाल का खुद मास्टर है, अगर हम कुछ ऐसा करें जिससे वो अपने गुणों का इस्तेमाल कर सकें। जैसा की मैंने पहले कहा सैन्य की आवश्यकता हर बार ज़रुरी नहीं है खासकर हमें जो स्थिति कश्मीर में मिलने वाली है।
आगे जनरल जीया उल हक़ अपने आइएसआइ के लोगों को अपने ओपरेशन टोपाक का विस्तृत वर्णन किया है। कैसा होगा, कौन चलायेगा, क्या चाहते हैं, क्या लक्ष्य है, क्या मिलेगा और क्या पाकिस्तान चाहता है ? जीया उल हक़ कहते हैं…..
यहां हमें युद्ध के उन तरीकों को अपनाना होगा जिसे कश्मीरी स्वीकार करें और उसमें जुड़े, दुसरे शब्दों में कहें तो सैन्य कार्रवाई न करके कश्मीरी के नैतिक और भौतिक मूल्यों का समन्वित इस्तेमाल करना चाहिए जिससे हमारे दुश्मन की इच्छाशक्ति को नष्ट कर दें, उसकी राजनीतिक क्षमता को खत्म कर दुनिया के सामने एक दमनकारी के रूप में उसे दिखा सकें। जैन्टलमेन हमने शुरुआत में यह लक्ष्यांक पाना है ।
इसके बाद पाकिस्तान के लश्करी तानाशाह जनरल जीया उल हक़ ने अपने नापाक इरादों को “ओपरेशन टोपाक” के जरिए हासिल करने की साज़िश का पुरा स्वरुप कहा है।
अपूर्ण…….

सोमवार, 8 अक्टूबर 2018

भारतीय अवकाश सीमाओं की सुरक्षा : S-400 सुरक्षा प्रणाली की आवश्यकता

2016 में भारत ने रशिया से आधुनिक विश्व में मिसाइल शिल्ड कही जाने वाली S-400 सुरक्षा प्रणाली खरीदने का विचार किया था। भारत के इस फैसले से अमेरिका को अचंभित कर दिया था, और अमेरिका ने भारत एस-400 सुरक्षा प्रणाली न खरीदें इसके लिए भारत सरकार पर दबाव बनाना शुरू किया था। अमेरिका ने साम, दाम, दण्ड, भेद हर हथियार अपनाया जिसमें उसके “काटसा (CAATSA)” कानुन के तहत भारत पर प्रतिबंध लगा सकता है एसी धमकी भी दी थी, गौरतलब है कि इसी कानून के अंतर्गत अमेरिका रशिया, ईरान, उत्तर कोरिया पर प्रतिबंध लगा चुका है। कुछ संरक्षण विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका के विरोध करने का कारण रशिया के वैश्विक स्तर पर बढ़ते कद को लेकर था।
परंतु भारत ने अमेरिका के विरोध, दबाव को नजरंदाज कर दिया और रशियन राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा के दौरान एस-400 सुरक्षा प्रणाली के सौदे को अंतिम स्वरुप दिया।
भारत ने अमेरिका जैसी वैश्विक शक्ति के विरोध करने के बावजूद यह सुरक्षा प्रणाली को खरीदने पर क्युं बल दिया ? भारत के लिए S-400 मिसाइल शिल्ड कही जाने वाली सुरक्षा प्रणाली क्यों आवश्यक है ? जबतक हमें भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान और चीन की मिसाइलों की जानकारी न हो यह दोनों सवालों का जवाब नहीं मिल सकता । इस दोनों सवालों के जवाब में हमने इस श्रेणी के प्रथम खंड में पाकिस्तानी मिसाइलों का परिचय और द्वितिय खंड में चीन की मिसाइलों का परिचय करने का प्रयास किया था इस खंड में चीन की कुछ और मिसाइलों का परिचय करने का प्रयास करते हैं।
  • 9. डोंग फेंग – 15, DF – 15 (CSS 6) : DF-15 चीन की सेना में 1990 से ओपरेशनल है, यह घन ईंधन प्रोपेलेंट संचालित कम दूरी तक (SRBM) प्रहार करने वाली बैलिस्टिक मिसाइल है, इसकी प्रहार क्षमता 600 किलोमीटर तक की है, 500-750 किलोग्राम परंपरागत हथियार के अलावा यह मिसाइल 50-350Kt तक परमाणु हथियार भी वहन करने में सक्षम है। डोंग फेंग 15 को सब से पहले बैजिंग इंटरनेशनल डिफेंस एक्सपो में प्रर्दशित किया गया। DF-15 उस ‘M’ श्रेणी की मिसाइल है जिसका विकास 1984 में निर्यात करने हेतु किया गया और निर्यात करने के लिए इसका नाम M-9 रखा गया।
  • 10. डोंग फेंग 15A (DF – 15A): डोंग फेंग 15ए अपने पुरोगामी डोंग फेंग 15 से थोडी लंबी और अधिक सटीक है। 2009 में आई रिपोर्ट के अनुसार डीएफ-15ए की प्रहार क्षमता 900 किलोमीटर तक की है।
  • 11. डोंग फेंग -15B (DF-15B) : DF-15B को वर्ष 2009 में बैजिंग की सैनिक परेड में शामिल किया गया तब विश्व को जानकारी मिली। वैसे डीएफ-ए और डीएफ-बी दोनों एक जैसी ही है परंतु DF-15B की सटीकता DF-15A के मुकाबले काफी अच्छी है जबकि प्रहार मर्यादा 50 से 800 किलोमीटर तक की है जो कि उस पर रखें गए हथियारों के साथ बदलती है।
  • 12. डोंग फेंग 15C (DF-15C) : डोंग फेंग 15C हकीकत में 15B का संवर्धित संस्करण है। वर्ष 2007 में सार्वजनिक हुइ एक रिपोर्ट के अनुसार चीन ने यह मिसाइल भूमिगत बंकर एवं भूमिगत सैनिक हथियारों के स्थानों को नष्ट करने हेतु विकसित किया है ।
  • 13. डोंग फेंग 16 (DF-16) : डोंग फेंग-16 घन ईंधन प्रोपेलेंट से संचालित शोर्ट रेंज बैलेस्टिक मिसाइल है। यह मिसाइल अपने साथ 1000 किलोग्राम वजन के हथियारों के साथ 800-1000 किलोमीटर तक प्रहार करने के लिए सक्षम है, इसे तीन MIRV और परमाणु हथियार से भी लैस किया जा सकता है।
  • 14. डोंग फेंग 41, DF – 41 (CCS-X-10) : यह मिसाइल का अभी अंतिम परीक्षण नहीं किया गया है। जो जानकारियां उपलब्ध है उस पर विश्वास करें तो इस आंतरखंडिय बैलेस्टिक मिसाइल (ICBM) की ओपरेशनल प्रहार रेंज 12000 – 15000 किलोमीटर तक की है। कुछ संरक्षण विशेषज्ञों की मानें तो डोंग फेंग 41 विश्व की सबसे तेज मिसाइल है जो अमेरिका पर केवल 30 मिनट में प्रहार करने की क्षमता रखती है। इसकी 10 MIRVed वोरहेड क्षमता इस को ओर घातक बनाती है। 80000 किलोग्राम वजन वाली यह मिसाइल थ्री स्टेज घन ईंधन प्रोपेलेंट से संचालित है जो 2500 किलोग्राम हथियारों का जखीरा वहन करने में सक्षम है।
  • 15. होंग निआओ श्रेणी (HN-1) : होंग निआओ श्रेणी की इन्टरमीडिएट रेंज क्रुज मिसाइल के विकास की शुरुआत करीब 1970 के दशक में की गई। इस प्रोजेक्ट का प्राथमिक लक्ष्य 3000 किलोमीटर तक प्रहार और परमाणु क्षमता संपन्न क्रुज मिसाइल का विकास करना था। होंग निआओ श्रेणी की क्रुज मिसाइल धरती, जल, वायु और सबमरीन से दागी जा सकती हैं। होंग निआओ 1 HN-1 करीब 1200 किलोग्राम वजन के साथ टर्बोजेट से संचालित सब सोनिक क्रुज मिसाइल है जो 400 किलोग्राम हाइ एक्सप्लोसिव (HE) अथवा पारंपरिक हथियारों या 20-90kT परमाणु हथियार का वहन करने में सक्षम है। इस इन्टरमीडिएट रेंज क्रुज मिसाइल को वर्ष 1996 में चीन ने अपनी सेना में शामिल किया है।
  • 16. HN 2 : एच.एन.-2 मिसाइल एच.एन. 1 का संवर्धित स्वरुप है जिसकी रेंज बढ़ाई गई है। जमीन और पानी (जहाज) से लोंच की जा सकती HN-1A और HN-1B की रेंज 1800 किलोमीटर तक की है जबकि सबमरीन से दागी जा सकती HN-2C की प्रहार मर्यादा 1400 किलोमीटर तक की है। HN-2 का प्रथम परीक्षण 1995 में किया गया और 2002 में इसे सेना में शामिल किया गया। 2010 के अमेरिकी रिपोर्ट के मुताबिक चीन के पास 200 से 500 परमाणु हथियार संपन्न HN-2 मिसाइलें तैनात हैं।
  • 17. HN-3 : वर्ष 1999 में पहली बार इस मिसाइल का परीक्षण किया गया और वर्ष 2007 में चीनी सेना शामिल किया गया। HN-3A जमीन और पानी (जहाज) से प्रहार करने की क्षमता रखती है और इसकी मारक रेंज 3000 किलोमीटर की है, जबकि HN-3B सबमरीन से मार करने वाली मिसाइल है जिसकी मारक रेंज 2200 किलोमीटर की है। वैसे ऐसा माना जाता है कि HN-3 श्रेणी रशिया की A5-15B कैंट और अमेरिका की टौमहौक तकनीक पर आधारित है।
  • 18. जु लांग 2 (Ju Lang 2JL-2 (CSSNX-14) जेएल-2 को गोल्फ क्लास टाइप 031 सबमरीन में लगाया गया और JL-2 का सबसे पहला परीक्षण वर्ष 2002 में किया गया और उसके बाद लगातार 2003, 2004, 2005, 2012 और 2015 में करने के बाद आखिर 2015 में सेना में शामिल कर लिया गया। जेएल-2 मिसाइल 2000 से 8000 किलोमीटर तक 1050 से 2800 किलोग्राम वजन के हथियारों के साथ प्रहार कर सकती हैं। इस मिसाइल को 1Mt परमाणु हथियार से लैस किया जा सकता है और 3-8 कम क्षमता के MIRVed हथियार से भी लैस किया जा सकता है।
भारत के परंपरागत दुश्मन माने जाने वाले दोनों दुश्मन देश पाकिस्तान और चीन की मिसाइल क्षमता और मिसाइलों का परिचय करने के बाद यह खुद-ब-खुद समज में आ जाता है कि भारत के लिए सक्षम मिसाइल शिल्ड यानी मिसाइल हमलों के सामने एक कवच, बख्तर का होना अनिवार्य है और भारत की अवकाश सीमाओं की सुरक्षा के लिए रशिया द्वारा विकसित एवं निर्मित विश्व की सबसे श्रेष्ठ एंटी मिसाइल सुरक्षा प्रणाली S-400 का होना अतिआवश्यक है ।

शनिवार, 6 अक्टूबर 2018

भारतीय अवकाश सीमाओं की सुरक्षा : चीन की मिसाइलों की पहचान


                   

दिनांक 5/10/2018 को भारत ने अमेरिका के दबाव को दरकिनार करते रशिया के साथ एस-400 के सौदे को अंतिम स्वरुप दिया।
आखिर क्यों जरुरी है S-400 सुरक्षा प्रणाली भारत के लिए ?
भारत के पडोस में चीन एक ताकतवर राष्ट्र बनकर उभरा है, न केवल आर्थिक रूप से परंतु लश्करी द्रष्टी से भी चीन एक ताकतवर राष्ट्र माना जा रहा है। चीन की बढ़ती ताकत को नजरंदाज करना भारत के भविष्य के लिए खतरा साबित हो सकता है। पिछले वर्ष डोकलाम विवाद के बाद और बार बार भारतीय सीमाओं में घुसखोरी करने वाले चीन पर विश्वास नहीं कीया जाना चाहिए क्यों कि चीन के साथ हम एक युद्ध 1962 का हार चुके हैं, उस युद्ध से चीन हमारी जमीन हडप कर बैठा है।
1962 में जब चीन को भारत से कोई ख़तरा नहीं था तब हमारे उपर युद्ध थोप दिया था तो आज और आनेवाले भविष्य में भारत चीन का वैश्विक प्रतिद्वंद्वी बनकर उभर रहा है तब धोखेबाज चीन से चौकन्ने और सतर्क रहना तथा साथ साथ अपनी सैन्य ताकत बढ़ाना भारत के लिए अतिआवश्यक हो गया है।
इस श्रेणी प्रथम भाग दिनांक 5/10/2018 के अंक में पाकिस्तान की मिसाइलों का परिचय दिया था, आज चीन की मिसाइलों का परिचय करते हैं
  • 1. डोंग फेंग 4 (DF-4) : डोंग फेंग 4 1980 से चाइनीज सेना People’s Liberation Army (PLA) से शामिल हैं जिसे 2005 में निवृत्त कीया जाना था लेकिन एक ब्रिगेड हेनन प्रांत के लिंगबाओ में आज भी इसे ओपरेट करती है। करीब 22000 किलोग्राम वजन वाली, दो स्टेज, प्रवाही प्रोपेलेंट इंजन से संचालित है। इसकी मारक क्षमता 4500-5000 किलोमीटर तक की है। अंतर्देशीय से आंतरखंडिय मिसाइल अपने साथ 2200 किलोग्राम वजन के हथियारों का वहन करने में सक्षम है तथा 1-3 मेगाटन परमाणु हथियार भी वार करने में सक्षम है।
  • 2. डोंग फेंग 11 (DF-11) : 1992 से चीन की सेना में शामिल यह मिसाइल 280-300 किलोमीटर तक मार कर सकती हैं, अपने 3800 किलोग्राम वजन के साथ यह मिसाइल 500-800 किलोग्राम तक के एकल वोरहेड को ले जाने के लिए सक्षम है। DF-11 परमाणु हथियार भी वार करने में सक्षम है। इसी मिसाइल का M11 वर्जन निर्यात कीया जाता है। पाकिस्तान की शाहिन मिसाइल श्रेणी इस की नकल माना जाता है।
  • 3. डोंग फेंग 21 ( DF 21/CSS -5) : डोंग फेंग 21 चीन की पहली मध्यम दूरी की रोड मोबाइल बैलेस्टिक मिसाइल है। 1991 में पीपल्स लिबरेशन आर्मी में शामिल किया गया था। 14700 किलोग्राम वजन वाली यह मिसाइल एक साथ 600 किलोग्राम हथियार या 250-500 kT परमाणु हथियार 2150 किलोमीटर तक वार करने की क्षमता रखती है।
  • 4. डोंग फेंग 31 (DF-31/DF-31A/CSS-10) : वर्ष 2006 में चाइनीज सेना में शामिल की गई 42000 वजन वाली, 8000-11700 किलोमीटर तक की दूरी तक प्रहार करने की क्षमता रखती यह आंतरखंडिय मिसाइल है। तीन स्टेज घन ईंधन प्रोपेलेंट से संचालित यह मिसाइल 1-3 mt परमाणु हथियार दागने में भी सक्षम है। PLA ने DF-31 का अपग्रेड वर्जन विकसित किया है जिसे DF-31A या CSS-10 मोड 2 नाम से जाना जाता है। DF-31A को 1990 में विकसित किया गया, 1999 में परीक्षण कीए गये और 2007 से सेना में डिप्लोय किया गया। इस मिसाइल की मारक क्षमता 11000 किलोमीटर तक की है।
  • 5. डोंग फेंग 26 (DF – 26) : DF – 26 चीन की ही DF – 21 मध्यम रेंज बैलेस्टिक मिसाइल का संवर्धित लंबी दूरी तक प्रहार करने वाली इन्टरमीडिएट रेंज बैलेस्टिक मिसाइल है। यह मिसाइल 3000 – 4000 किलोमीटर तक की दूरी पर प्रहार करने में सक्षम है और इसे 1200 – 1800 किलोग्राम पारंपरिक हथियारों का जखीरा वहन करने में सक्षम है इसके अलावा परमाणु हथियार से भी लैस किया जा सकता है।
  • 6. डोंग फेंग 5 (CSS – 4 मोड 2) : चीन की यह आंतरखंडिय (ICBM) मिसाइल है जिसका विकास 1966 से शुरू किया गया था। 13000 किलोमीटर से अधिक वार करने की क्षमता रखती इस मिसाइल को 1981 में चाइनीज सेना में शामिल किया गया।
  • 7. डोंग फेंग 5B (CSS – 4 मोड 3) डोंग फेंग 5B मिसाइल डोंग फेंग 5 की संवर्धित आवृत्ति है, इसकी सटीकता में 300 मीटर CEP की बढ़ोतरी हुई है। यह मिसाइल प्रवाही इंधन प्रोपेलेंट संचालित आंतरखंडिय मिसाइल है। डोंग फेंग 5B का भौतिक आकार डोंग फेंग 5 जैसा ही है परंतु इसे MIRVed (Multiple independent Targetable Reentry Vehicle) वोरहेड के वहन के लिए सक्षम किया गया है। वर्ष 2016 में मिली जानकारी के अनुसार चीन के पास 10 DF-5 लोंचर्स और 30 वोरहेडस है।
  • 8. डोंग फेंग 5C : 21 जनवरी 2017 में ऐसी रिपोर्ट बाहर आई की चीन ने अपने मिसाइल डोंग फेंग 5B के संशोधित संस्करण डोंग फेंग 5-C का परीक्षण किया है जो 10 MIRV से लैस किया गया है जो पुराने डोंग फेंग 5B में लगे 3 MIRV वोरहेड से कहीं ज्यादा है।
(अन्य चाइनीज मिसाइलों की जानकारी अगले अंक में प्रकाशित होगी)
कुछ चाइनीज मिसाइलों की जानकारी को देखते हुए यह कहने में किसी भी प्रकार की हिचकिचाहट नहीं होती कि भारत के पास अपनी हवाई सीमाओं तथा सभी सीमाओं की सुरक्षा करना अनिवार्य है और इसके लिए रशिया द्वारा विकसित एवं निर्मित S-400 जैसी सुरक्षा प्रणाली का होना बहुत ही आवश्यक है।
क्रमशः

शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2018

भारतीय सीमाओं की सुरक्षा - पाकिस्तानी मिसाइलों का परिचय



भारत के खुद ही बन बैठे दुश्मन देश पाकिस्तान के द्वारा चीन के सहयोग से मिसाइल श्रेणी का बडे पैमाने पर विस्तार कीया जा रहा है । भारत के दोनों दुश्मन देशों का गठबंधन शस्त्रो का विकास किया जा रहा है वह भारत की जमीनी, हवाई और दरियाई सीमाओं की सुरक्षा के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। आज पाकिस्तान के द्वारा तैयार की गई कुछ मिसाइलों का परिचय करते हैं जिससे यह समजना आसान हो जाएगा की भारत के लिए रशिया द्वारा विकसित एवं निर्मित S-400 मिसाइल प्रणाली की आवश्यकता क्यों है। पाकिस्तान की मिसाइल का परिचय।
1. अबाबिल - Ababeel : चीन के सहयोग से विकसित इस मीडियम रेंज बैलेस्टिक मिसाइल है। तीन स्टेज में घन इंधन से संचालित यह मिसाइल की रेंज 2200 किलोमीटर तक की कही जाती है और परमाणु हथियार का वहन भी कर सकती है। सतह से सतह पर मार करने वाली पाकिस्तान की यह पहली मिसाइल है, इसे 2007 में विश्व समक्ष पेश किया गया। अबाबिल मिसाइल का प्रथम परीक्षण 24 जनवरी 2017 में किया गया।
2. हत्फ 3 या गजनवी : चीन की DF-11 का पाकिस्तानी वर्जन बताया जाता एक इस मिसाइल को। इराक की स्कड मिसाइल का संवर्धित स्वरुप भी कहा जाता है। सिंगल स्टेज घन ईंधन से संचालित यह बैलेस्टिक मिसाइल 12-20 किलोटन परमाणु हथियार के साथ 700 किलो हथियार का वहन करने मे सक्षम है। पाकिस्तानी सेना मे शामिल इस मिसाइल की रेंज 290 किलोमीटर तक मार कर सकती है।
3. अब्दाली - हत्फ 2 : 2005 में पाकिस्तानी सेना में शामिल की गई यह शोर्ट रेंज बैलेस्टिक मिसाइल है। इसकी मारक क्षमता 180-200 किलोमीटर तक की है एवं अपने 1750 किलो वजन के साथ साथ 250-450 किलो हथियार का वहन करने के लिए सक्षम है। यह मिसाइल सिंगल घन ईंधन प्रोपेलंट से संचालित है।
4. बाबर - हत्फ 7 : 1750 किलो वजन वाली यह मिसाइल 450 किलो वजन के हथियार के साथ 700 किलोमीटर तक वार कर सकती हैं। इस मिसाइल को 10 से 35 kT परमाणु हथियार से लैस किया जा सकता है। वर्ष 2005 में इसकी मारक रेंज 500 किलोमीटर बताया गया, जबकि वर्ष 2012 में 700 किलोमीटर बताया गया साथ साथ यह भी कहा गया कि भविष्य में इसकी रेंज को 1000 किलोमीटर तक बढ़ाया जा सकता है, हालांकि अमेरिकी संरक्षण विशेषज्ञों के अनुसार इसकी रेंज 350 किलोमीटर से भी कम है। पाकिस्तान की यह मिसाइल चीन के होंग निआओ 3, रशिया के AS-15 और SS-N-27 की मिश्रीत आवृत्ति है।
5. घोरी - हत्फ 5 : पाकिस्तान को 1980-1990 के वर्षो में उत्तर कोरिया से 12 से 25 नो-डोंग 1 मिसाइल मिले थे और यह मिसाइल उत्तर कोरिया की नो डोंग 1 MRBM का नाम बदलकर पाकिस्तानी नाम घोरी रख्खा गया है एसी मान्यता है । घोरी मिसाइल सिंगल स्टेज प्रवाही प्रोपेलेंट इंजन से संचालित है। 15850 किलो वजन वाली यह मिसाइल 1250-1500 किलोमीटर तक 5 से 2500 मीटर की एक्युरेट वार कर सकती हैं। एक साथ 1200 किलो वजन के हथियार का वहन करने की क्षमता रखते हुए यह मिसाइल 700 किलो वजन के हथियार और 12-35 kT परमाणु हथियार का वहन करने में सक्षम है। 2003 से पाकिस्तानी सेना में शामिल हैं यह मिसाइल।
6. नासर - हत्फ 9 : नासर का सबसे पहला सफल परीक्षण 2011 में किया गया। नासर पाकिस्तान की सरफेस से सरफेस वार करने वाली शोर्ट रेंज बैलेस्टिक मिसाइल है। 1200 किलो वजन वाली यह मिसाइल अपने साथ 400 किलो वजन के हथियारों का वहन करने की क्षमता रखती है, यह मिसाइल परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम है। इस मिसाइल की मारक क्षमता 60 किलोमीटर तक की है। हाल में विकास प्रक्रिया में है।
7. राड - हत्फ 8 : पाकिस्तान की हवा से वार करने वाली यह सबसोनिक क्रुज मिसाइल है, इसका प्रथम परीक्षण अगस्त 2007 में किया गया था, काफी परीक्षणों के बाद जनवरी 2016 में इसका सफल परीक्षण किया गया। टर्बोजेट प्रोपल्शन से संचालित इस सब-सोनिक क्रुज मिसाइल की मारक क्षमता 350 किलोमीटर की दूरी तक की है। यह मिसाइल पाकिस्तान की सेना में शामिल हैं या नहीं इसकी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है।
8. शाहिन 1- हत्फ 4 : शाहिन-1 या हत्फ 4 के नाम से जानी जाने वाली पाकिस्तान की 9500 किलो वजन वाली शोर्ट रेंज बैलेस्टिक मिसाइल 750 किलोमीटर दूर तक वार कर सकती हैं। कहा जाता है कि शाहिन-1 चाइनीज DF 11 मिसाइल का संवर्धित स्वरुप है। सिंगल स्टेज घन ईंधन प्रोपेलेंट इंजन से संचालित यह मिसाइल 700 किलो वजन के हथियारों का जखीरा वहन करने की क्षमता रखती है। यह मिसाइल परमाणु एवं रासायणीक हथियारों का भी वहन करने में सक्षम है।
9. शाहिन-2 हत्फ 6 : कुछ संरक्षण विशेषज्ञों के अनुसार चाइनीज M18 की नकल है यह मिसाइल।2014 से पाकिस्तानी सेना में शामिल शाहिन-2 एक मिडियम रेंज बैलेस्टिक मिसाइल है । सिंगल स्टेज घन ईंधन प्रोपेलेंट इंजन से संचालित 23,600 वजन वाली यह मिसाइल 1500-2000 किलोमीटर तक की दूरी तक वार करने की क्षमता रखती है। अपने साथ 700 किलो वजन के हथियारों का वहन करने में सक्षम है,15-35 kT परमाणु हथियार का वहन कर सकती हैं, रासायणीक हथियारों का जखीरा भी वार करने में सक्षम है।
10. शाहिन -3 : पाकिस्तान की सबसे लंबी दूरी तक प्रहार करने वाली मिसाइल है शाहिन-3, इसे सबसे पहले 2016 की आर्मी की परैड में प्रर्दशित किया गया था अब तक यह मिसाइल विकास प्रक्रिया में है। टु स्टेज घन ईंधन प्रोपेलेंट इंजन से संचालित यह मिसाइल 2750 किलोमीटर तक की दूरी तक प्रहार करने की क्षमता रखती है। शाहिन-3 परमाणु हथियार का वहन करने में सक्षम है। यह मिसाइल की मारक रेंज में संपूर्ण भारत आ गया है। वर्ष 2015 में मार्च एवं दिसंबर महीने में इसका सफल परीक्षण किया गया था।
10. हत्फ -1 : 1992 से सर्विस में कार्यरत पाकिस्तान की यह 1500 किलो वजन वाली शोर्ट रेंज बैलेस्टिक मिसाइल 70-100 किलोमीटर तक की दूरी पर प्रहार करने की क्षमता रखती है। इस मिसाइल के तीन वर्जन है , हत्फ-1, हत्फ-1A और हत्फ-1B.
इसके अलावा पाकिस्तान के पास फ्रांस के एक्जोसेट एन्टी शीप शोर्ट रेंज क्रुज मिसाइल की श्रेणी उपलब्ध है, MM38, MM40, MM40 Block-2 जैसी जमीन और पानी में से छोडी जाने वाली मिसाइलें हैं, इसके उपरांत वायु में से छोडी जा सकती AM39 और SM39 मिसाइलों का भी जखिरा है।
उपरोक्त पाकिस्तान की मिसाइल क्षमता को तथा पाकिस्तान की गैरजिम्मेदार राष्ट्र की वैश्विक पहचान को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता और इसी वजह से भारत को अपनी सीमाओं को मिसाइल हमलों से सुरक्षित करना अनिवार्य हो गया है ।

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