गुरुवार, 22 अक्टूबर 2020

अशफाक_उल्ला_खां महान देशभक्त को वंदना

 



अशफाक_उल्ला_खां महान देशभक्त को वंदना


राम (प्रसाद बिस्मिल) के कनैया अशफाक उल्ला खां


रामप्रसाद बिस्मिल की पंक्ति जो अशफाक उल्ला खां को बहुत पसंद थी।


"कभी तो कामयाबी पर मेरा हिन्दोस्ताँ होगा।

रिहा सैय्याद के हाथों से अपना आशियाँ होगा।।"


इस पंक्ति को अशफाक उल्ला खां ने ऐसे पूर्ण किया।


"बहुत ही जल्द टूटेंगी गुलामी की ये जंजीरें,

किसी दिन देखना आजाद ये हिन्दोस्ताँ होगा।"


जंगे-आज़ादी के नायक अशफाक उल्ला खान

देश की गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूमने वाले अशफाक उल्ला खान जंग-ए-आजादी के महानायक थे।अंग्रेजों ने उन्हें अपने पाले में मिलाने के लिए तरह-तरह की चालें चलीं लेकिन वे सफल नहीं हो पाए। स्वतंत्रता संग्राम पर कई पुस्तकें लिख चुके इतिहासकार सर्वदानंदन के अनुसार काकोरी कांड के बाद जब अशफाक को गिरफ्तार कर लिया गया तो अंग्रेजों ने उन्हें सरकारी गवाह बनाने की कोशिश की और कहाकि यदि हिन्दुस्तान आजाद हो भी गया तो उस पर हिन्दुओं का राज होगा तथा मुसलमानों को कुछ नहीं मिलेगा। इसके जवाब में अशफाक ने ब्रितानिया हुकूमत के कारिन्दों से कहा कि फूट डालकर शासन करने की अंग्रेजों की चाल का उन पर कोई असर नहीं होगा और हिन्दुस्तान आजादहोकर रहेगा। अशफाक ने अंग्रेजों से कहा था,तुम लोग हिन्दू-मुसलमानो में फूट डालकर आजादी की लड़ाई को नहीं दबा सकते।उनके इस जवाब से अंग्रेज दंग रह गये उन्होने कहा भारतमाँ अगर हिँदुओ की माँ है तो हम मुस्लमान भी इसी माँ के लाल है अब हिन्दुस्तान में क्रांति की ज्वाला भड़क चुकी है जो अंग्रेजी साम्राज्य को जलाकर राख कर देगी। अपने दोस्तों के खिलाफ मैं सरकारी गवाह बिल्कुल नहीं बनूंगा।


 22 अक्तूबर 1900 को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में जन्मे अशफाक उल्लाखान अपने छह भाई बहनों में सबसे छोटे थे।

अशफाक पर गांधीजी का काफी प्रभाव था लेकिन जब चौरी चौरा की घटना के बाद गांधीजी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया तो वह प्रसिद्ध क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल से जा मिले। जो कि अशफाक के बचपन के मित्र थे । रामप्रसाद बिस्मिल और चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में क्रांतिकारियों की आठ अगस्त1925 को शाहजहांपुर में एक बैठक हुई और हथियारों के लिए रकम जुटाने के उद्देश्य से ट्रेन में ले जाए जाने वाले सरकारी खजाने को क्रान्तिकारी प्रवृत्ति के लिए अंग्रेजों से छीन लेने की योजना बनाई गई। क्रांतिकारी जिस खजाने को हासिल करना चाहते थे, दरअसल वह अंग्रेजों ने भारतीयों से ही लूटा था।


 9 अगस्त 1925 को रामप्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्र लाहिडी,ठाकुर रोशन सिंह, सचिंद्र बख्शी, केशव चक्रवर्ती, बनवारी लाल मुकुंद और मन्मथ लाल गुप्त ने लखनऊ के नजदीक काकोरी में ट्रेन में ले जाए जा रहे भारत को लूटकर इकठ्ठा किये सरकारी खजाने को भारत के स्वतंत्रता संग्राम के लिए अंग्रेजों से छीन लिया। इस घटना से ब्रितानिया हुकूमत तिलमिला उठी। क्रांतिकारियों की तलाश में जगह-जगह छापे मारे जाने लगे। एक-एक कर काकोरी कांड में शामिल सभी क्रांतिकारी पकड़े गए लेकिन चंद्रशेखर आजाद और अशफाक उल्ला खान हाथ नहीं आए। इतिहास में यह घटना काकोरी कांड के रूप में दर्ज हुई।

अशफाक शाहजहांपुर छोड़कर बनारस चले गए और वहां एक इंजीनियरिंग कंपनी में 10 महीने तक काम किया। इसके बाद उन्होंने विदेश जाने की योजना बनाई ताकि क्रांति को जारी रखने के लिएबाहर से मदद करते रहें। इसके लिए वह दिल्ली आकर अपने एक मित्र के संपर्क में आए लेकिन इस मित्र ने अंग्रेजों द्वारा घोषित इनाम के लालच में आकर पुलिस को सूचना दे दी। यार की गद्दारी से अशफाक पकड़े गए। अशफाक को फैजाबाद जेल भेज दिया गया। उनके वकील भाई रियासत उल्ला ने बड़ी मजबूती से अशफाक का मुकदमा लड़ा लेकिन अंग्रेज उन्हें फांसी पर चढ़ाने पर आमादा थे और आखिरकार अंग्रेज जज ने डकैती जैसे मामले में अशफाक को फांसी की सजा सुना दी। 19 दिसंबर 1927 को अशफाक को फांसी दे दी गई जिसे उन्होंने हंसते-हंसते चूम लिया। इसी मामले में राम प्रसाद बिस्मिल को भी 19 दिसंबर 1927 को फांसी दे दी गई।

महंगाई के अनमोल फायदे: ज़रा दूसरा पहलू भी देखिए!

आजकल जहां देखो वहां एक ही राग सुनाई देता है—“महंगाई बढ़ गई, महंगाई ने जीना मुश्किल कर दिया!” लेकिन क्या आपने कभी सिक्के का दूसरा पहलू देखने ...