सोमवार, 30 नवंबर 2020

विज्ञान की अमर विभूति जगदीश चंद्र बसु / जन्म दिवस – 30 नवम्बर

 



विज्ञान की अमर विभूति जगदीश चंद्र बसु / जन्म दिवस – 30 नवम्बर


पेङ पौधौं से संबन्धित सवालों की जिज्ञासा बचपन से लिए, धार्मिक वातावरण में पले, जिज्ञासु जगदीश चंद्र बसु का जन्म 30 नवंबर, 1858 को बिक्रमपुर हुआ था, जो अब ढाका , बांग्लादेश का हिस्सा है । आपके पिता श्री भगवान सिंह बसु डिप्टी कलेक्टर थे। पेङ-पौधों के बारे में जब उनके सवालों का उत्तर बचपन में स्पष्ट नही मिला तो वे बङे होने पर उनकी खोज में लग गये। बचपन के प्रश्न जैसेः- माँ पेङ के पत्ते तोङने से क्यों रोकती थी? रात को उनके नीचे जाने से क्यों रोकती थी? अपनी जिज्ञासु प्रवृत्ति के कारण आगे चलकर उन्होंने अपनी खोजों से पूरे संसार को चकित कर दिया।


लंदन से रसायन शास्त्र और वनस्पति शास्त्र में उच्च शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात भारत वापस आ गये। कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में भौतिकी विज्ञान के अध्यापक बने। कॉलेज में उस समय अधिकतर अंग्रेज शिक्षक ही थे। प्रिंसीपल भी अंग्रेज थे। वहाँ भारतियों के साथ भेदभाव बरता जाता था। समान कार्य हेतु अंग्रेजों के मुकाबले भारतीयों को कम वेतन दिया जाता था। बचपन से ही उन्होने अपने देश और जाति के स्वाभिमान को समझा था अतः उन्होने इस अन्याय का डटकर सामना किया। भारतियों को कम वेतन देने का कारण ये भी था कि उन्हे विज्ञान की पढाई के योग्य नही समझा जाता था।



जगदीश चंद्र बसु के विरोध जताने पर वहाँ के प्रिंसिपल ने उनका वेतन और कम कर दिया, जिसे बसु ने लेने से इंकार कर दिया। बगैर वेतन के वे अपना काम करते रहे। आर्थिक तंगी के कारण उन्हे अनेक परेशानियों का सामना करना पङा किन्तु वे धैर्य के साथ अपनी बात पर अङे रहे। परिणाम स्वरूप उन्हे उनके स्वाभीमान का उचित फल मिला। उनकी ढृणता के आगे कॉलेज वालों को झुकना पङा। वे अन्य भारतियों को भी पूरा वेतन देने को तैयार हो गये। जगदीशचंद्र बसु की नौकरी भी पक्की कर दी गई तथा उनका बकाया वेतन भी उन्हे मिल गया।



बसु पढाने के बाद अपना शेष समय वैज्ञानिक प्रयोग में लगाते थे। उन्होने ऐसे यंत्रो का आविष्कार किया जिससे बिना तार के संदेश भेजा जा सकता था। उनके इसी प्रयोग के आधार पर आज के रेडियो काम करते हैं। जगदीशचंद्र बसु ही बेतार के तार के वास्तविक आविष्कारक हैं परंतु परिस्थिति वश इसका श्रेय उन्हे नही मिल सका।


बसु हार मानने वाले इंसान नही थे, उन्होने पेङ-पौधों पर अध्यन करना शुरु किया वैसे भी इसमें तो उनकी बचपन से जिज्ञासा थी। पेङ-पौधों पर की गई खोज उनके लिए वरदान सिद्ध हुई। उनकी खोज ने ये सिद्ध कर दिया कि पौधे भी सजीवों के समान सांस लेते हैं, सोते जागते हैं और उन पर भी सुख-दुख का असर होता है। उन्होने ऐसा यंत्र बनाया, जिससे पेङ-पौधों की गति अपने आप लिखी जाती थी।इस यंत्र को क्रेस्कोग्राफ (crescograph) कहा जाता है । लंदन स्थित रॉयल सोसाइटी ने उनके आविष्कार को एक अद्भुत खोज कहा और उन्हे रॉयल सोसाइटी का सदस्य भी मनोनित कर लिया।

इसी खोज को प्रदर्शित करते समय उनके साथ बहुत ही मजेदार घटना घटी। पेरिस में उन्हे पौधों पर तरह-तरह के जहरों का असर दिखाना था। उन्होने एक पौधे पर पोटेशीयम साइनाइड का प्रयोग किया किन्तु पौधा मुरझाने की बजाय और अधिक खिल उठा। पोटेशिय साइनाइड बहुत तेज किस्म का जहर होता है। उसका पौधे पर उलटा असर देख कर उन्हे बहुत आश्चर्य हुआ। उन्होने उसे चखा तो वो चीनी थी। वहीं वो कैमिस्ट भी था जिससे पोटेशियम साइनाइड उन्होने मँगाया था। कैमिस्ट ने कहा कि “कल मेरे पास एक नौकर पोटेशियम साइनाइड लेने आया था, मैने सोचा कहीं ये आत्महत्या न कर ले अतः मैने इसे चीनी का पाउडर दे दिया था।“



जगदीशचंद्र बसु निरंतर नई खोज करते रहे, 1915 में उन्होने कॉलेज से अवकाश लेकर लगभग दो साल बाद “बोस इन्स्ट्यूट” की स्थापना की। जो ‘बोस विज्ञान मंदिर’ के नाम से प्रख्यात है। 1917 में सरकार ने उन्हे सर की उपाधी से सम्मानित किया।


जगदीश चंद्र बसु केवल महान वैज्ञानिक ही नही थे, वे बंगला भाषा के अच्छे लेखक और कुशल वक्ता भी थे। विज्ञान तो उनके सांसो में बसता था। 23 नवंबर, 1937 को विज्ञान की ये विभूति इह लोक छोङ कर परलोक सीधार गई। आज भी वैज्ञानिक जगत में भारत का गौरव बढाने वाले जगदीसचन्द्र बसु का नाम सुनहरे अक्षरों में लिखा हुआ है। ऐसी विभूतियाँ सदैव अमर रहती हैं ।



रविवार, 29 नवंबर 2020

सेवाव्रती ठक्कर बापा / जन्म दिवस - 29 नवम्बर

 


सेवाव्रती ठक्कर बापा / जन्म दिवस - 29 नवम्बर


पूजा का अर्थ एकान्त में बैठकर भजन करना मात्र नहीं है। निर्धन और निर्बल, वन और पर्वतों में रहने वाले अपने भाइयों की सेवा करना भी पूजा ही है। अमृतलाल ठक्कर ने इसे अपने आचरण से सिद्ध कर दिखाया। उनका जन्म 29 नवम्बर, 1869 को भावनगर (सौराष्ट्र, गुजरात) में हुआ था। उनके पिता श्री विट्ठलदास ठक्कर धार्मिक और परोपकारी व्यक्ति थे। यह संस्कार अमृतलाल जी पर भी पड़ा और उन्हें सेवा में आनन्द आने लगा।


शिक्षा के बाद उन्हें पोरबन्दर राज्य में अभियन्ता की नौकरी मिली। वे रेल विभाग के साथ तीन साल के अनुबन्ध पर युगांडा गये। वहाँ से लौटे तो उनके क्षेत्र में दुर्भिक्ष फैला हुआ था। यह देखकर उनसे रहा नहीं गया और वे इनकी सेवा में जुट गयेे। यहीं से उनका नाम ‘ठक्कर बापा’ पड़ गया।



इसके बाद उन्होंने मुम्बई नगर निगम में काम किया। इस पद पर रहते हुए उन्हें सफाईकर्मियों के लिए उल्लेखनीय कार्य किये। 1909 में पत्नी के देहान्त के बाद निर्धनों की सेवा को अपने जीवन का लक्ष्य बनाकर वे मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में बसे वनवासियों के बीच काम करने लगे।


यह काम करते समय उन्होंने देखा कि वहाँ विदेशों से आये मिशनरियों ने विद्यालय, चिकित्सालय आदि खोल रखे थे; पर वे वनवासियों की अशिक्षा, निर्धनता, अन्धविश्वास आदि का लाभ उठाकर उन्हें हिन्दू से ईसाई बना रहे थे। बापा ने इस दुश्चक्र को तोड़ने का निश्चय कर लिया। इसके लिए वे हरिकृष्ण देव के साथ ‘भारत सेवक समाज’ में सम्मिलित हो गये।



उन्होंने गांधी जी, गोपाल कृष्ण गोखले, देवधर दादा, सुखदेव भाई और श्रीनिवास शास्त्री के साथ भी काम किया; पर राजनीतिक कार्य उनके अनुकूल नहीं थे। इसलिए वे उधर से मन हटाकर पूरी तरह वनवासियों के बीच काम करने लगे। 1914 में मुंबई नगर निगम की स्थायी नौकरी छोड़कर वे ‘सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसायटी’ के माध्यम से पूरे समय काम में लग गये।


1920 में उड़ीसा के पुरी जिले में बाढ़ के समय ठक्कर बापा ने लम्बे समय तक काम किया। 1946 में नोआखाली में मुस्लिम गुंडो द्वारा किये गये हिन्दुओं के नरसंहार के बाद वहां जाकर भी उन्होंने सेवाकार्य किये। वे जिस काम में हाथ डालते, उसका गहन अध्ययन कर विभिन्न पत्रों में लेख लिखकर जनता से सहयोग मांगते थे। उनकी प्रतिष्ठा के कारण भरपूर धन उन्हें मिलता था। इसका सदुपयोग कर वे उसका ठीक हिसाब रखते थे।



ठक्कर बापा जहाँ भी जाते थे, वहाँ तात्कालिक समस्याओं के निदान के साथ कुछ स्थायी कार्य भी करते थे, जिससे उस क्षेत्र के लोगों का जीवन उन्नत हो सके। विद्यालय, चिकित्सालय और आश्रम इसका सर्वश्रेष्ठ माध्यम थे। उन्होंने अनेक स्थानों पर प्रचलित बेगार प्रथा के विरोध में आन्दोलन चलाए। स्वतन्त्रता के बाद जब असम में भूकम्प आया, तब वहाँ के राज्यपाल के आग्रह पर अपने सहयोगियों के साथ वहाँ जाकर भी उन्होंने सेवा कार्य किये।



1932 में गांधी जी के आग्रह पर वे ‘हरिजन सेवक संघ’ के मंत्री बने। श्री घनश्याम दास बिड़ला ने इसका अध्यक्ष पद इसी शर्त पर स्वीकार किया कि ठक्कर बापा इसके मंत्री होंगे। बापा ने भील सेवा मंडल, अन्त्यज सेवा मंडल आदि संस्थाएं बनाकर इन वर्गों की आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति सुधारने के प्रयास किये। उन्हें सेवा कार्य में ही आनंद आता था। देश में कहीं भी, कैसी भी सेवा की आवश्यकता हो, वे वहां जाने को सदा तत्पर रहते थे।


19 जनवरी, 1951 को भावनगर में अपने परिजनों के बीच महान सेवाव्रती ठक्कर बापा का देहांत हुआ।


शनिवार, 28 नवंबर 2020

महान समाज सुधारक महात्मा ज्योतिबा फुले : पूण्य तिथि -28 नवम्बर

 



महान समाज सुधारक महात्मा ज्योतिबा फुले :  पूण्य तिथि -28 नवम्बर


​महात्मा ज्योतिबा फुले इनका जन्म 11 अप्रैल 1827 को महाराष्ट्र के सतारा ज़िले में हुआ था | उनका असली नाम ज्योतिराव गोविंदराव फुले था | वह 19वी सदी की एक बड़े समाज सुधारक, सक्रिय प्रतिभागी तथा विचारक थे | ज्‍योतिबा फुले भारतीय समाज में प्रचलित जाति आधारित विभाजन और भेदभाव के खिलाफ थे।

उन्‍होंने विधवाओं और महिलाओं के कल्याण के लिए काफी काम किया। उन्होंने इसके साथ ही किसानों की हालत सुधारने और उनके कल्याण के लिए भी काफी प्रयास किये। स्त्रियों की दशा सुधारने और उनकी शिक्षा के लिए ज्योतिबा ने 1854 में एक स्कूल खोला। यह इस काम के लिए देश में पहला विद्यालय था। लड़कियों को पढ़ाने के लिए अध्यापिका नहीं मिली तो उन्होंने कुछ दिन स्वयं यह काम करके अपनी पत्नी सावित्री को इस योग्य बना दिया। उच्च वर्ग के लोगों ने आरंभ से ही उनके काम में बाधा डालने की चेष्टा की, किंतु जब फुले आगे बढ़ते ही गए तो उनके पिता पर दबाब डालकर पति-पत्नी को घर से निकालवा दिया इससे कुछ समय के लिए उनका काम रुका अवश्य, पर शीघ्र ही उन्होंने एक के बाद एक बालिकाओं के तीन स्कूल खोल दिए।


२४ सितंबर १८७३ को दलितों और निर्बल वर्ग को न्याय दिलाने के लिए ज्योतिबा ने 'सत्यशोधक समाज' स्थापित किया। उनकी समाजसेवा देखकर 1888 ई. में मुंबई की एक विशाल सभा में उन्हें 'महात्मा' की उपाधि दी। ज्योतिबा ने ब्राह्मण-पुरोहित के बिना ही विवाह-संस्कार आरंभ कराया और इसे मुंबई हाईकोर्ट से भी मान्यता मिली। वे बाल-विवाह विरोधी और विधवा-विवाह के समर्थक थे।



उनके आयुष्य में महत्वपूर्ण बदलाव तब आया जब उनके मुस्लिम तथा इसाईं पडोसीयो ने उनकी अपार बुद्धिमत्ता को पहचानते हुए ज्योतिराव के पिता को ज्योतिराव को वहां के स्थानिक ' स्कोटीश मिशुनस हाई स्कूल ' में भर्ती करने के लिए राजी किया | थोमस पैन के 'राइटस ऑफ़ माँन ' इस पुस्तक से प्रभावित होते हुए फुलेजी ने सामाजिक न्याय के लिए और भारतीय जातीवाद के खिलाफ अपना एक दृढ़ दृष्टिकोण बना लिया |


महात्मा फुले ने अपने जीवन में हमेशा बड़ी ही प्रबलता तथा तीव्रता से विधवा विवाह की वकालत की | उन्होंने उच्च जाती की विधवाओ के लिए १८५४ में एक घर भी बनवाया था | दुसरो के सामने आदर्श रखने के लिए उन्होंने अपने खुद के घर के दरवाजे सभी जाती तथा वर्गों के लोगो के लिए हमेशा खुले रखे , इतना ही नहीं उन्होंने अपने कुए का पानी बिना किसी पक्षपात के सभी के लिए उपलब्ध किया |महात्मा ज्योतिबा व उनके संगठन के संघर्ष के कारण सरकार ने ‘एग्रीकल्चर एक्ट’ पास किया. धर्म, समाज और परम्पराओं के सत्य को सामने लाने हेतु उन्होंने अनेक पुस्तकें भी लिखी. 28 नवम्बर सन 1890 को उनका देहावसान हो गया.



गुरुवार, 26 नवंबर 2020

जीवमात्र का तारणहार वीर मेघमाया

 



जीवमात्र का तारणहार वीर मेघमाया


गुजरात की भूमि पर अनेक राजाओ एवं राजवंशोने राज किया और गुर्जर धरा को वैभवशाली बनाया। सभी राजवंशो के इतिहास को देखकर यह दृष्टिगोचर होता है कि सोलंकी वंश के काल को गुजरात का स्वर्णयुग माना जाता है । सोलंकी वंशका काल ई. स. 942 से ई. स. 1244 तक गिना जाता है । इस समय में सोलंकी वंश के कुल 12 राजाओने गुर्जर भूमि पर राज किया । सोलंकी वंश के शासकोंने अनेक प्रजालक्षी कार्य किए । इस वंश के छठ्ठे उत्तराधिकारी के रूप में सिद्धराज जयसिंहने ई. स. 1092 से ई. स. 1142 तक गुर्जर धरा उपर अपनी ध्वजा फहराई, राज किया ।

सिद्धराज जयसिंह को स्थानिक भाषा में "सघरा जेसंग" के नाम से भी जाना जाता है । सभी सोलंकी वंश के राजा मूर्तिकला और वास्तुकलाके निर्माण में अभिरुचि रखनेवाले थे। सिद्धराज जयसिंह भी इन्हीं राजाओ में से एक थे। सिद्धराज जयसिंहने प्रसिद्ध रुद्रमहालय का निर्माणकार्य भी पूरा करवाया जो उनके दादा के समय से शुरू हुआ था । धोलका का मलाव तालाब भी सिद्धराज जयसिंह के शासनकाल के दौरान ही बनाया गया था। इसके अतिरिक्त सौराष्ट्र में भी सिद्धराज जयसिंह द्वारा कई निर्माण करवाए गए थे, जिसके अवशेष आज भी चोबारी, आणंदपुर, वढवाण आदि स्थानों में देखे जा सकते है । सिद्धराज जयसिंह के शासनकाल के दौरान किये गए सबसे बेहतरीन वास्तुशिल्प निर्माणों में से एक यानी 1008 शिवलिंगों से अलंकृत पाटण की शोभा बढाता हुआ सहस्त्रलिंग सरोवर का निर्माण है । सहस्त्रलिंग सरोवर के निर्माण के साथ साथ बुनकर समुदाय के अस्मिता, श्रद्धा एवं आस्था के प्रतीकों में शिरमोर ऐसे वीर मेघमाया देवजी के सर्वोत्कृष्ट बलिदान का इतिहास जो बुनाई के तारों की तरह हरहंमेश बना हुआ है। 



बुनकर समुदाय जो स्थानिक रुप से वणकर समुदाय कहा जाता है इस समुदाय के विश्वास, आत्मसम्मान व आस्था के जीवंत प्रतीक समान वीर मेघमाया देवजी की यशश्वी गाथा ई. स. 1138 में महा सूद नोम के दिन जागृत, पवित्र गुर्जर धरा पर स्वर्ण अक्षरों में अंकित हुई थी ।


जिस समय अणहिलपुर पाटण को राजधानी बनाई गई, उस समय गुजरात के सिंहासन पर विराजमान सिद्धराज जयसिंह के नेतृत्व में सोलंकी वंश की सफल एवं यशस्वी ध्वजा लहरा रही थी । नयनरम्य और उत्कृष्ठ स्थापत्य के निर्माणों के शौकिन महाराज सिद्धराज जयसिंहने अपने दादा दुर्लभराज द्वारा बनाया हुआ और लंबे समय से बिना पानी के सुखे पडे सरोवर के जीर्णोद्धार का फैसला किया । सरोवर व तालाब की खुदाई के लिए उस समय मालदेव के ओड समुदाय को विशेषज्ञ माना जाता था, जो बनासकांठा व राजस्थान के इलाकों में निवास करते थे । सिद्धराज जयसिंह ने ओड समुदाय के लोगों को सरोवर के नवीनीकरण, जिर्णोद्धार के लिए आमंत्रित किया ।



ओड मालदेव लोगों में एक सुंदर दिखने वाली परिणीता जसमा भी शामिल थी । सिद्धराज जयसिंह सरोवर के निर्माण कार्य का निरीक्षण करने सरोवर पर जाते रहते थे । इस बीच सिद्धराज जयसिंह की नजर विवाहिता जसमा पर पड़ी और राजा सिद्धराज जसमा की और आकर्षित व मोहित हो गए और परिणित महिला जसमा को अपनी रानी बनाने के लिए अनेक प्रस्ताव भेजे । पतिव्रता जसमा ने राजा से आये प्रत्येक अनैतिक प्रस्ताव को ठुकरा दिया । हालाँकि सिद्धराज जयसिंह के प्रस्ताव जारी रहें। अपने समुदायकी एक परिणीता का स्वयं राजा द्वारा उत्पीड़न होता देख ओड समुदाय के लोगोने सरोवर की खुदाई को छोड़कर रात होते ही अपने वतन की और प्रस्थान किया ।


महाराज सिद्धराज जयसिंहको तुरंत सूचित किया गया कि ओड समुदाय के लोग काम छोड़कर वापस लौट रहे है । राजाने तुरंत ओड लोगो को वापस लाने के लिए सैनिकों को भेजा। सैनिकों ने ओड लोगो को रास्ते से पुनः वापिस लौटने को कहा परंतु स्वाभिमानि स्वभाव रखनेवाले ओड लोगोने वापिस लौटने का स्पष्टरूप से इनकार कर दिया। ओड लोगो के इनकार से क्रोधित सैनिकोंने जसमा के पति की निर्मम हत्या करदी और पति की निर्मम हत्या से दुःखी, व्यथित ओर क्रोधित जसमा को सिद्धराज जयसिंह के समक्ष पेश किया गया। क्रोधित जसमाने भरे दरबारमें सिद्धराज जयसिंह की उपस्थिति में अपने पास छूपाई हुई तेज धारदार कटार को अपने पेट मे घोंस दी और वीरगति को प्राप्त हुई। अपने जीवन की अंतिम सांस लेते हुए सती जसमा ने महाराज सिद्धराज जयसिंह को शाप देते हुए कहा कि, "हे ! राजन, तुने रक्षक होकर एक पतिव्रता स्त्री पर कुदृष्टि की है और मेरे निर्दोष पति की निर्मम हत्या की है इसलिए में एक पतिव्रता स्त्री तुझको शाप देती हुं कि तु जिस दुर्लभ सरोवर को बनवा रहा है उस दुर्लभ सरोवर में कभी भी पानी नहीं आएगा और तेरे राज्य के सभी जीव पानी के बिना तड़पेंगे। सती जसमा के शाप के कारण परम शिवभक्त सिद्धराज जयसिंह बहुत व्यथित हो गए और उन्होंने अपने पापों के प्रायश्चित के रूपमें गुजरात और सौराष्ट्र में कई शिव मंदिरों का निर्माण करवाया। 



सती जसमा के शाप से परेशान होकर सिद्धराज जयसिंहने कई शिवमंदिरों का निर्माण करवाया, ईसी तरह 500 मील के दायरे में एक दुर्लभ सरोवर बनवाया और इसके किनारे 1000 शिवलिंगों को स्थापित किया। यह सरोवर सहस्त्रलिंग सरोवर के नाम से विख्यात है । शिवमंदिर में नित्य आरती होती थी और उस आरती में व्यथित, शापित हुए महाराज सिद्धराज जयसिंह भी स्वयं उपस्थित रहते थे । सती जसमा का शाप सत्यवचन था और सहस्त्रलिंग सरोवर में पानी आता ही नहीं था, जिस कारण पाटण में पानी की समस्या कायमी हो गई और सभी जीव बिना पानी के तड़पने लगें। उपर से राज्य में अकाल पडा जिससे सभी जीवों को पीने के पानी की परेशानी होने लगी।


जैन धर्मसे प्रभावित राजा अपने राज्य में जीवो की यह दशा देख नहीं पाए और सती जसमा के शाप के निवारण हेतु, शाप से सहस्त्रलिंग सरोवर को मुक्त कराने के लिए अपने प्रधान राज्यमंत्री मुंजाल द्वारा अनेक विद्वानों, धर्माचार्यो, ज्योतिषशास्त्र के निष्णांतो की सभा बुलवाई। अनेकविध चर्चा व शास्त्रों के अभ्यास के बाद उपाय बताया गया कि, सती जसमा के शाप से मुक्ति मीले और पाटण के जीवों को पर्याप्त पानी मिल सके व उनको भटकना न पड़े उसके लिए धरती माता एक बत्तीसगुणी पुरुष का बलिदान मांग रही है । यह सुनते ही राजा के साथ समग्र सभा स्तब्ध ओर अवाचक हो गई । महाराजने सभा में उपस्थित महानुभावो को बलिदान के लिए अग्रेसर होने को कहा । प्रजा की सुखाकारी के लिए टहेल दी परंतु कोई राजी नहीं हुआ, कोई आगे नहीं आया ।


सभा में से कोई तैयार न हुआ बाद में महाराज जयसिंह ने अपने समग्र राज्य में ढिंढोरा पिटवाया, सात दिनों तक पूरे गुजरात में यह ढिंढोरा पिटवाया गया परंतु कोई बलिदान देने के लिए आगे न आया सबको अपनी जान प्यारी थी । तब धोलका पंथक के छोटे से गाँव रनोडा में रहते बुनकर या वणकर समुदाय से माया नामक वीर पुत्र पाटण के प्यासे जीवों व मानवीओ के लिए बलिदान देने के लिए तैयार हुआ । बचपन से ही पिता घरमशी की छत्रछाया खोने के बाद दादा के संस्कारों की स्नेहछाया में पले - बढ़े मायाने अपने निर्णय की जानकारी अपनी माता गंगाबाई (खेतीबाई) और पत्नी हरखा (मरघा बाई) को दी एवं दादा सहित सब से यज्ञ की वेदी में बलिदान देने की अनुमति मांगी । अपने बेटे को परमार्थ बलिदान होने की अनुमति माता तथा दादा ने गौरव सहित दे दी तब माया की पत्नी ने भी सकारात्मक रवैया रखकर अनुमति दे दी ।


रनोडा गाँव तथा धोलका के निवासी मानवश्रेष्ठ एवं वीर मेघमाया को बाजे गाजे के साथ पाटण स्थित राजा के दरबार मे लेकर आए । पाटण के दरबार मे बैठे हुए कुछ जातिवादी मानसिकता रखनेवाले ब्राह्मणो और दरबारियों तथा नगरजन "मेघमाया" को देखते ही खड़े हो गए और कहने लगे कि, "यह मेघमाया तो बुनकर व वणकर समुदाय जाति का अछूत है इसका बलिदान धरती माता नहीं स्वीकार करेगी ।" यह सुनते ही महाराज सिद्धराज जयसिंहने सभा में उपस्थित विद्वान ज्योतिषियों की ओर देखा । ज्योतिषी मेघमाया के मुख पर के तेज को जान गए और पूरी सभा मे एक स्वर में जोर से कहा कि, "हे राजा, जीवमात्र के लिए प्राण न्योछावर करनेवाला वीर मेघमाया अछूत नहीं है, वो तो हम सभी का गुरु है, बत्तीसगुणी वीर है और इस नरवीर का बलिदान धरती माता अवश्य स्वीकार करेंगी।" बलिदान के लिए सिद्धराज जयसिंह ने जब मेघमाया की ओर देखा और पूछा तब जन्मजात निडर, निर्भय और तेजस्वी ऐसे मेघमाया ने राजा को नम्रता से उत्तर दिया,

"हे महाराज अन्नदाता ! मेरे जीवन के बलिदान से प्यासे जीवो, मानवो को पानी मिले तो यह मस्तक हाजिर है परंतु आपसे नतमस्तक पूर्वक एक अरज है ।"


महाराज सिद्धराज जयसिंहने कहा, "बोल वीर मेघमाया बोलो भय और संकोच के बिना बोलो..."

तब वीर मेघमाया ने गर्वसे सीधे शरीर से अपना सिर झुकाया और कहा, "महाराज ! हमारे समुदाय को बहुत दुःख है, हम गरीब है और हम पर छुआछूत का कलंक लगा हुआ है जिसे दूर कीजिये, हमारे समाज पर के बंधनों को मुक्त कर नगर में निवास, आँगन में तुलसी का पौधा, पीपल की छाँव, उत्तम वस्त्र धारण करने की आज़ादी, वेल - वंशावली के लिए वहीवंचा बारोट सहित स्वाभिमान से जीवन जीने के लिए समान अधिकार दीजिए ।" यह कहते हुए, वीर मेघमाया ने महाराज सिद्धराज जयसिंह को नमन किया ।


विक्रम संवत 1172 महा सूद सातम की सुबह ढोल, शहनाई की रमझट के बीच मे और नगरजनों की अबीर-गुलाल, पुष्पवर्षा के साथ वीर मेघमाया के बलिदान शोभायात्रा निकली जिसमे स्वयं महाराज सिद्धराज जयसिंह, नगर शेठ, ब्राह्मणों, ज्योतिषाचार्यों, धर्मगुरुओं तथा हजारो नगरजनों का समुद्र "वीर मेघमाया की जयकार" करते, सती जसमा ओडण के शाप को मिटाने, पाटण नगर के मानवों व जीवों को बचाने, शास्त्रोक्त मंत्रोच्चार के साथ वीर मेघमाया के सहस्त्रलिंग सरोवर में कदम रखते ही भगवान के आशीर्वाद स्वरूप बारीश हुई और सहस्त्रलिंग सरोवर में पाताल में से अमृत समान पानी प्रवाहित हुआ और इस पानी मे परोपकारी, वीर मेघमाया ने समाधि ले ली ।

भारतीय समाज मे तथाकथित अछुतो को अधिकार दिलानेवाले सर्व प्रथम वीर मेघमाया थे तथा अब तक इतिहास को देखते हुए, अछूत कहेजानेवाले समाज के अधिकारों के लिए अपने जीवन का बलिदान करनेवाले एक मात्र वीर मेघमाया देव ही है।


पाटण का सहस्त्रलिंग सरोवर आज भी बुनकर, वणकर समुदाय की अस्मिता, गौरव, आस्था, श्रद्धा एवं शौर्य के प्रतीक ऐसे परोपकारी जीवमात्र के जीवन को बचाने अपने जीवन का बलिदान देनेवाले वीर मेघमाया के बलिदान का साक्षी बनकर खड़ा है ।


बुनकर, वणकर समुदाय के बुजुर्गों द्वारा वीर मेघमाया के बलिदान की स्मृति पीढ़ी - दर - पीढ़ी दी जाती है। वीर मेघमाया का बलिदान पूरे देश मे अमर है । परोपकारी, नीडर, निर्भय, तेजस्वी, अडिग ऐसे वीर मेघमाया का बुनकर, वणकर समाज अतूट श्रद्धा व आस्था से पूजन करता हैं । वीर मेघमाया के बलिदान के गौरवमय इतिहास का सदा जतन हो, उनकी स्मृतियाँ हमेंशा बनी रहे उसके लिए पाटण के गुजरात बुनकर, वणकर समाज संलग्न "वीर माया स्मारक समिति" के अविरत प्रयासों से वीर मेघमाया के बलिदान स्थान पर भव्य स्मारक परिसर स्थापित किया जा रहा हैं । जिसके लिए गुजरात सरकार द्वारा 3 करोड़ रुपये भी आवंटित किये गए है । प्रस्तावित परिसर में वीर माया स्मृति मंदिर, अनुसंधान केंद्र, पुस्तकालय, अतिथि भवन, बाल क्रीड़ांगण, गुरुकुल तथा वीर मेघमाया की यशश्वी गाथा दर्शाता हुआ ध्वनि प्रकाश शो(Light and sound show) का भी आयोजन किया गया है ।


- © देवेन्द्र कुमार

रविवार, 22 नवंबर 2020

झलकारी बाई : जन्म 22 नवम्बर, 1830

 #वीरांगना_को_वंदन #झलकारीबाई_को_वंदन


वीरांगना झलकारी बाई / जन्म दिवस - 22 नवम्बर



भारत की स्वाधीनता के लिए 1857 में हुए संग्राम में पुरुषों के साथ महिलाओं ने भी कन्धे से कन्धा मिलाकर बराबर का सहयोग दिया था। कहीं-कहीं तो उनकी वीरता को देखकर अंग्रेज अधिकारी एवं पुलिसकर्मी आश्चर्यचकित रह जाते थे। ऐसी ही एक वीरांगना थी झलकारी बाई, जिसने अपने वीरोचित कार्यों से पुरुषों को भी पीछे छोड़ दिया।


झलकारी बाई का जन्म 22 नवम्बर, 1830 को ग्राम भोजला (झांसी, उ.प्र.) में हुआ था। उसके पिता मूलचन्द्र जी सेना में काम करते थे। इस कारण घर के वातावरण में शौर्य और देशभक्ति की भावना का प्रभाव था। घर में प्रायः सेना द्वारा लड़े गये युद्ध, सैन्य व्यूह और विजयों की चर्चा होती थी। मूलचन्द्र जी ने बचपन से ही झलकारी को अस्त्र-शस्त्रों का संचालन सिखाया। इसके साथ ही पेड़ों पर चढ़ने, नदियों में तैरने और ऊँचाई से छलांग लगाने जैसे कार्यों में भी झलकारी पारंगत हो गयी।


एक बार झलकारी जंगल से लकड़ी काट कर ला रही थी, तो उसका सामना एक खूँखार चीते से हो गया। झलकारी ने कटार के एक वार से चीते का काम तमाम कर दिया और उसकी लाश कन्धे पर लादकर ले आयी। इससे गाँव में शोर मच गया। एक बार उसके गाँव के प्रधान जी को मार्ग में डाकुओं ने घेर लिया। संयोगवश झलकारी भी वहाँ आ गयी। उसने हाथ के डण्डे से डाकुओं की भरपूर ठुकाई की और उन्हें पकड़कर गाँव ले आयी। ऐसी वीरोचित घटनाओं से झलकारी पूरे गाँव की प्रिय बेटी बन गयी।


जब झलकारी युवा हुई, तो उसका विवाह झाँसी की सेना में तोपची पूरन कोरी से हुआ। जब झलकारी रानी लक्ष्मीबाई से आशीर्वाद लेने गयी, तो उन्होंने उसके सुगठित शरीर और शस्त्राभ्यास को देखकर उसे दुर्गा दल में भरती कर लिया। यह कार्य झलकारी के स्वभाव के अनुरूप ही था। जब 1857 में अंग्रेजी सेना झांसी पर अधिकार करने के लिए किले में घुसने का प्रयास कर रही थी, तो झलकारी शीघ्रता से रानी के महल में पहुँची और उन्हें दत्तक पुत्र सहित सुरक्षित किले से बाहर जाने में सहायता दी।


झलकारी ने इसके लिए जो काम किया, उसकी कल्पना मात्र से ही रोमांच हो आता है। उसने रानी लक्ष्मीबाई के गहने और वस्त्र आदि स्वयं पहन लिये और रानी को एक साधारण महिला के वस्त्र पहना दिये। इस प्रकार वेष बदलकर रानी बाहर निकल गयीं। दूसरी ओर रानी का वेष धारण कर झलकारी बाई रणचंडी बनकर अंग्रेजों पर टूट पड़ी।


काफी समय तक अंग्रेज सेना के अधिकारी भ्रम में पड़े रहे। वे रानी लक्ष्मीबाई को जिन्दा या मुर्दा किसी भी कीमत पर गिरफ्तार करना चाहते थे; पर दोनों हाथों में तलवार लिये झलकारी उनके सैनिकों को गाजर मूली की तरह काट रही थी। उस पर हाथ डालना आसान नहीं था। तभी एक देशद्रोही दुल्हाज ने जनरल ह्यूरोज को बता दिया कि जिसे वे रानी लक्ष्मीबाई समझ रहे हैं, वह तो दुर्गा दल की नायिका झलकारी बाई है।


यह जानकर ह्यूरोज दंग रह गया। उसके सैनिकों ने एक साथ धावा बोलकर झलकारी को पकड़ लिया। झलकारी फाँसी से मरने की बजाय वीरता की मृत्यु चाहती थी। उसने अपनी एक सखी वीरबाला को संकेत किया। संकेत मिलते ही वीरबाला ने उसकी जीवनलीला समाप्त कर दी। इस प्रकार झलकारी बाई ने अपने जीवन और मृत्यु, दोनों को सार्थक कर दिखाया।

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