भारत का नया संसद भवन के निर्माण का कार्य करीब समाप्त हो गया है और अगले कुछ दिनो में नये संसद भवन का उद्घाटन भी किया जायेगा। उद्घाटन प्रधानमंत्री को करना चाहिए या राष्ट्रपति को इस बात पर सत्ता पक्ष और विपक्ष में विवाद चल रहा है. अब यह जानकारी प्राप्त हो रही है कि भारत के नये संसद भवन में स्पीकर के पास 'सेंगोल' रखा जायेगा. जब से यह खबर आइ है कि भारत के नये संसद भवन में सेंगोल को स्थापित किया जाएगा तभी से यह चर्चा का आरंभ हो गया है कि आखिर सेंगोल है क्या ? 'सेंगोल' वैसे कोइ नया नहीं है भारत के लिये, सेंगोल भारत की स्वतंत्रता और भारत के स्वर्णिम इतिहास के साथ जुडा हुआ है।
'सेंगोल' शब्द का उद्भव और इतिहास
कहा जाता है कि सेंगोल शब्द की उत्पत्ति संस्कृत शब्द "संकु" से लिया गया है, जिसका अर्थ होता है "शंख"। और ऐसा भी कहा जाता है कि सेंगोल यह शब्द तमिल भाषा के शब्द 'सेम्मई' से निकला हुआ शब्द है। इसका अर्थ होता है धर्म, सच्चाई और निष्ठा। सेंगोल राजदंड भारतीय सम्राट की शक्ति और अधिकार का प्रतीक हुआ करता था। हिंदू मान्यताओं और सनातन धर्म में शंख को बहुत पवित्र माना गया है। सेंगोल शब्द्प्रयोग यह चोला साम्राज्य से जुड़ा हुआ है। पुरातन काल में सेंगोल को सम्राटों की शक्ति और अधिकार का प्रतीक माना जाता था। इसे राजदंड भी कहा जाता था। 1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ तो इसी सेंगोल को अंग्रेजों से सत्ता मिलने का प्रतीक माना गया। अब नए संसद भवन में सेंगोल को स्थापित किया जाएगा। अब तक इस सेंगोल को प्रयागराज के संग्रहालय में रखा गया था।
भारत के लोगों के पास शासन एक आध्यात्मिक परंपरा से आया. सेंगोल शब्द का अर्थ और भाव नीति पालन से है. ये पवित्र है, और इस पर नंदी विराजमान हैं. ये आठवीं शताब्दी से चली आ रही सभ्यतागत प्रथा है. चोल साम्राज्य से चली आ रही है.
सेंगोल का तमिल चोल साम्राज्य से संबंध
चोल साम्राज्य दक्षिण भारत का सब से बडा साम्राज्य रहा है और चोल राजवंश के इतिहास को देखे तो पता चलता है कि चोल साम्राज्य के राजा और राजवंश साहित्य, कला, वास्तुकला एवं संस्कृति के संरक्षण में अपने असाधारण योगदान के लिए इतिहास प्रसिद्ध था। सेंगोल चोल राजाओं शासनकाल के दौरान उनकी सच्चाई, शक्ति और संप्रभुता के प्रतिष्ठित प्रतीक के रूप में प्रसिद्ध हुआ और इतिहास में अपनी अमर कहानी लिखी है।
चोल साम्राज्य के उस सुवर्णकाल के दौरान राजाओं के राज्याभिषेक समारोह होते थे तब उस समारोह में सेंगोल का अत्यधिक महत्व हुआ करता था। 'सेंगोल' एक ध्वजदंड या भाले के स्वरूप में कार्य करता था, 'सेंगोल' में अद्भुत नयनरम्य और विलक्षण उत्कीर्णन, नक्काशी और जटिल सजावट होती थी। 'सेंगोल' को अधिकार एवं शक्ति का एक पावन प्रतीक माना जाता था, जो एक शासक के द्वारा दूसरे शासक को सत्ता के हस्तांतरण के स्वरूप में सौंपा जाता था।

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