मंगलवार, 21 जुलाई 2020

थार की लता "रुकमा मांगणियार"

थार की लता "रुकमा मांगणियार" / पुण्य तिथि - 21 जुलाई

राजस्थान के रेगिस्तानों में बसी मांगणियार जाति को निर्धन एवं अविकसित होने के कारण पिछड़ा एवं दलित माना जाता है। इसके बाद भी वहां के लोक कलाकारों ने अपने गायन से विश्व में अपना विशिष्ट स्थान बनाया है। पुरुषों में तो ऐसे कई गायक हुए हैं; पर विश्व भर में प्रसिद्ध हुई पहली मांगणियार गायिका रुकमा देवी को ‘थार की लता’ कहा जाता है।

रुकमा देवी का जन्म 1945 में बाड़मेर के पास छोटे से गांव जाणकी में लोकगायक बसरा खान के घर में हुआ था। निर्धन एवं अशिक्षित रुकमादेवी बचपन से ही दोनों पैरों से विकलांग भी थीं; पर उन्होंने इस शारीरिक दुर्बलता को कभी स्वयं पर हावी नहीं होने दिया।

उनकी मां आसीदेवी और दादी अकला देवी अविभाजित भारत के थार क्षेत्र की प्रख्यात लोकगायिका थीं। इस प्रकार लोक संस्कृति और लोक गायिकी की विरासत उन्हें घुट्टी में ही मिली। कुछ बड़े होने पर उन्होंने अपनी मां से इस कला की बारीकियां सीखीं। उन्होंने धीरे-धीरे हजारों लोकगीत याद कर लिये। परम्परागत शैली के साथ ही गीत के बीच-बीच में खटके और मुरके का प्रयोग कर उन्होंने अपनी मौलिक शैली भी विकसित कर ली।

कुछ ही समय में उनकी ख्याति चारों ओर फैल गयी। ‘केसरिया बालम आओ नी, पधारो म्हारे देस’ राजस्थान का एक प्रसिद्ध लोकगीत है। ढोल की थाप पर जब रुकमा देवी इसे अपने दमदार और सुरीले स्वर में गातीं,तो श्रोता झूमने लगते थे। मांगणियार समाज में महिलाओं पर अनेक प्रतिबंध रहते थे; पर रुकमादेवी ने उनकी चिन्ता न करते हुए अपनी राह स्वयं बनाई।

यों तो रुकमादेवी के परिवार में सभी लोग लोकगायक थे; पर रुकमादेवी थार क्षेत्र की वह पहली महिला गायक थीं, जिन्होंने भारत से बाहर लगभग 40 देशों में जाकर अपनी मांड गायन कला का प्रदर्शन किया। उन्होंने भारत ही नहीं, तो विदेश के कई कलाकारों को भी यह कला सिखाई।

रुकमा को देश और विदेश में मान, सम्मान और पुरस्कार तो खूब मिले;पर सरल स्वभाव की अशिक्षित महिला होने के कारण वे अपनी लोककला से इतना धन नहीं कमा सकीं, जिससे उनका घर-परिवार ठीक से चल सके। उन्होंने महंगी टैक्सी, कार और वायुयानों में यात्रा की, बड़े-बड़े वातानुकूलित होटलों में ठहरीं; पर अपनी कला को ठीक से बेचने की कला नहीं सीख सकीं। इस कारण जीवन के अंतिम दिन उन्होंने बाड़मेर से 65कि.मी दूर स्थित रामसर गांव में फूस से बनी दरवाजे रहित एक कच्ची झोंपड़ी में बिताये।

आस्टेªलिया निवासी लोकगायिका सेरडा मेजी ने दस दिन तक उनके साथ उसी झोंपड़ी में रहकर यह मांड गायिकी सीखी। इसके बाद दोनों ने जयपुर के जवाहर कला केन्द्र में इसकी जुगलबंदी का प्रदर्शन किया। वृद्ध होने पर भी रुकमादेवी के उत्साह और गले के माधुर्य में कोई कमी नहीं आयी थी।

गीत और संगीत की पुजारी रुकवा देवी ने अपने जीवन के 50 वर्ष इस साधना में ही गुजारे। 21 जुलाई, 2011 को 66 वर्ष की आयु में उनका देहांत हुआ। जीवन के अंतिम पड़ाव पर उन्हें इस बात का दुख था कि उनकी मृत्यु के बाद यह कला कहीं समाप्त न हो जाए; पर अब इस विरासत को उनकी छोटी बहू हनीफा आगे बढ़ाने का प्रयास कर रही है।

पोस्ट एवं फोटो सौजन्य :  Vishwa Samvad Kendra Gujarat

सोमवार, 20 जुलाई 2020

बटुकेश्वर दत्त

महान क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त / पुण्य तिथि - 20 जुलाई

यह इतिहास की विडम्बना है कि अनेक क्रान्तिकारी स्वतन्त्रता के युद्ध में सर्वस्व अर्पण करने के बाद भी अज्ञात या अल्पज्ञात ही रहे। ऐसे ही एक क्रान्तिवीर बटुकेश्वर दत्त का जन्म 18 नवम्बर, 1910 को ग्राम ओएरी खंडा घोष (जिला बर्दमान, बंगाल) में श्री गोष्ठा बिहारी दत्त के घर में हुआ था। वे एक दवा कंपनी में काम करते थे, जो बाद में कानपुर (उ.प्र.) में रहने लगे। इसलिए बटुकेश्वर दत्त की प्रारम्भिक शिक्षा पी.पी.एन हाईस्कूल कानपुर में हुई। उन्होंने अपने मित्रों के साथ ‘कानपुर जिमनास्टिक क्लब’की स्थापना भी की थी।

उन दिनों कानपुर क्रान्तिकारियों का एक बड़ा केन्द्र था। बटुकेश्वर अपने मित्रों में मोहन के नाम से प्रसिद्ध थे। भगतसिंह के साथ 8 अप्रैल, 1929 को दिल्ली के संसद भवन में बम फेंकने के बाद वे चाहते, तो भाग सकते थे; पर क्रान्तिकारी दल के निर्णय के अनुसार दोनों ने गिरफ्तारी दे दी।

छह जून, 1929 को न्यायालय में दोनों ने एक लिखित वक्तव्य दिया, जिसमें क्रान्तिकारी दल की कल्पना, इन्कलाब जिन्दाबाद का अर्थ तथा देश की व्यवस्था में आमूल परिवर्तन की बातें कही गयीं थीं 25 जुलाई, 1929 को उन्होेंने गृहमन्त्री के नाम एक पत्र भी लिखा, जिसमें जेल में राजनीतिक बन्दियों पर हो रहे अत्याचार एवं उनके अधिकारों की चर्चा की गयी है। उन्होंने अन्य साथियों के साथ इस विषय पर 114 दिन तक भूख हड़ताल भी की।

भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरू को फाँसी घोषित हुई, जबकि दत्त को आजीवन कारावास। इस पर भगतसिंह ने उन्हें एक पत्र लिखा। उसमें कहा गया है कि हम तो मर जायेंगे; पर तुम जीवित रहकर दिखा दो कि क्रान्तिकारी जैसे हँस कर फाँसी चढ़ता है, वैसे ही वह अपने आदर्शों के लिए हँसते हुए जेल की अन्धकारपूर्ण कोठरियों में यातनाएँ और उत्पीड़न भी सह सकता है।

23 मार्च, 1931 को लाहौर जेल में भगतसिंह आदि को फाँसी हुई और बटुकेश्वर दत्त को पहले अंदमान और फिर 1938 में पटना जेल में रखा गया। जेल में वे क्षय रोग तथा पेट दर्द से पीड़ित हो गये। आठ सितम्बर, 1938 को वे कुछ शर्तों के साथ रिहा किये गये; पर 1942 में फिर भारत छोड़ो आंदोलन में जेल चले गये। 1945 में वे पटना में अपने बड़े भाई के घर में नजरबंद किये गये।

1947 में हजारीबाग जेल से मुक्त होकर वे पटना में ही रहने लगे। इतनी लम्बी जेल के बाद भी उनका उत्साह जीवित था। 36 वर्ष की अवस्था में उन्होंने आसनसोल में सादगीपूर्ण रीति से अंजलि दत्त से विवाह किया। भगतसिंह की माँ विद्यावती जी उन्हें अपना दूसरा बेटा मानती थीं।

पटना में बटुकेश्वर दत्त को बहुत आर्थिक कठिनाई झेलनी पड़ी। उन्होंने एक सिगरेट कंपनी के एजेंट की तथा पत्नी ने एक विद्यालय में 100 रु0मासिक पर नौकरी की। 1963 में कुछ समय के लिए वे विधान परिषद में मनोनीत किये गये; पर वहाँ उन्हें काफी विरोध सहना पड़ा। उनका मन इस राजनीति के अनुकूल नहीं बना था।

1964 में स्वास्थ्य बहुत बिगड़ने पर पहले पटना के सरकारी अस्पताल और फिर दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में उनका इलाज हुआ। उन्होंने बड़ी वेदना से कहा कि जिस दिल्ली की संसद में मैंने बम फेंका था, वहाँ मुझे स्ट्रेचर पर आना पड़ेगा, यह कभी सोचा भी नहीं था।

बीमारी में माँ विद्यावती जी उनकी सेवा में लगी रहीं। राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री और उनके कई पुराने साथी उनसे मिले। 20 जुलाई, 1965 की रात में दो बजे इस क्रान्तिवीर ने शरीर छोड़ दिया। उनका अन्तिम संस्कार वहीं हुआ, जहाँ भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव के शव जलाये गये थे। अपने मित्रों और माता विद्यावती के साथ बटुकेश्वर दत्त आज भी वहाँ शान्त सो रहे हैं।

पोस्ट एवं फोटो सौजन्य : Vishwa Samvad Kendra Gujarat

मंगलवार, 14 जुलाई 2020

सरस्वती गेलेक्सी

दिन विशेष : 14 जुलाई 2017

 14 जुलाई 2017,

 भारतीय साइंटिस्टों ने ढूंढी थी सूर्य से 2Cr अरब गुना बड़ी गैलेक्सीज, नाम सरस्वती रखा

नई दिल्ली. इंडियन एस्ट्रोनॉमर्स की टीम ने सूर्य से 2 करोड़ अरब गुना बड़ी गैलेक्सीज की खोज की है। इसे सरस्वती का नाम दिया गया है। पुणे की इंटर यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स (IUCAA) के साइंटिस्टों ने कई गैलेक्सीज के इस सुपर क्लस्टर की खोज की। बता दें कि एक क्लस्टर में 1000 से 10,000 गैलेक्सीज होती हैं और एक सुपर क्लस्टर में 43 तक क्लस्टर हो सकते हैं। साइंटिस्ट्स के मुताबिक ये स्पेस में खोजा गया अब तक का सबसे बड़ा स्ट्रक्चर है।

क्यों खास गैलेक्सीज का ये सुपरक्लस्टर...
1000 करोड़ साल पुरानी हैं।
400 करोड़ लाइट ईयर (प्रकाशवर्ष) दूर हैं।
60 करोड़ लाइट ईयर से भी ज्यादा Mass (द्रव्यमान) है।

100 गुना तक बढ़ जाता है साइज
- अमेरिकन एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी के द एस्ट्रोफिजिकल जर्नल में पब्लिश रिपोर्ट में इस खोज के बारे में बताया गया।
- IUCAA ने कहा, "सुपर क्लस्टर कॉस्मिक वेब में मिला सबसे बड़ा स्ट्रक्चर है। ये गैलेक्सीज और गैलेक्सी क्लस्टर्स की चेन है, जो एक दूसरे से ग्रैविटी के जरिए जुड़ी हुई हैं। इसका आकार अक्सर 100 गुना तक बढ़ जाता है और इसमें हजारों गैलेक्सीज शामिल हैं।"
- खोज में शामिल IUCAA के साइंटिस्ट शिशिर सांख्यायन और रिपोर्ट के राइटर जॉयदीप बागची ने कहा, "हाल में खोजा गया सरस्वती सुपरक्लस्टर 60 करोड़ लाइट ईयर तक एक्स्टेंड हो सकता है। इसका आकार 2 करोड़ अरब सूर्यों के बराबर है। हमारी गैलेक्सी भी सुपर क्लस्टर लैनिआकी का हिस्सा है।"
- "स्लोअन डिजिटल स्काई सर्वे नाम के स्पेक्ट्रोस्कोपिक सर्वे में इस विशाल दीवार जैसी गैलेक्सी का मिलना एक आश्चर्य की तरह है।"
कई सवालों के जवाब मिलेंगे
- साइंटिस्टों ने कहा, "डाटा को एनालाइज करने के बाद ये खोज संभव हो सकती है। ये सुपर क्लस्टर साफ तौर पर कॉस्मिक फिलामेंट्स (ब्रह्मांडीय धागे) का नेटवर्क है, जिनमें कल्सटर्स और लार्ज वॉइड्स (बड़े निर्वात/शून्य) शामिल हैं। इस तरह के बड़े सुपर क्लस्टर कम ही पाए गए हैं। सरस्वती सुपर क्लस्टर इन सबसे काफी दूर है और इसकी खोज के कई ऐसे सवालों का जवाब मिलने की उम्मीद है,जो अभी तक अनसुलझे हैं। जैसे कि किस तरह इतना बड़ा और घना क्लस्टर अरबों साल पहले बना?"
ये साइंटिस्ट थे खोज में शामिल
शिशिर सांख्यायन, पीएचडी स्कॉलर, इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस एंड एजुकेशन एंड रिसर्च (IISER)
प्रतीक दबाढे, रिसर्च फेलो, IUCAA
जो जैकब, न्यूमैन कॉलेज
प्रकाश सरकार, नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, जमशेदपुर

- साभार बिजनेस स्टान्डर्ड और Vishwa Samvad Kendra Gujarat

नई दिल्ली. इंडियन एस्ट्रोनॉमर्स की टीम ने सूर्य से 2 करोड़ अरब गुना बड़ी गैलेक्सीज की खोज की है। इसे सरस्वती का नाम दिया गया है। पुणे की इंटर यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स (IUCAA) के साइंटिस्टों ने कई गैलेक्सीज के इस सुपर क्लस्टर की खोज की। बता दें कि एक क्लस्टर में 1000 से 10,000 गैलेक्सीज होती हैं और एक सुपर क्लस्टर में 43 तक क्लस्टर हो सकते हैं। साइंटिस्ट्स के मुताबिक ये स्पेस में खोजा गया अब तक का सबसे बड़ा स्ट्रक्चर है।

क्यों खास गैलेक्सीज का ये सुपरक्लस्टर...
1000 करोड़ साल पुरानी हैं।
400 करोड़ लाइट ईयर (प्रकाशवर्ष) दूर हैं।
60 करोड़ लाइट ईयर से भी ज्यादा Mass (द्रव्यमान) है।

100 गुना तक बढ़ जाता है साइज
- अमेरिकन एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी के द एस्ट्रोफिजिकल जर्नल में पब्लिश रिपोर्ट में इस खोज के बारे में बताया गया।
- IUCAA ने कहा, "सुपर क्लस्टर कॉस्मिक वेब में मिला सबसे बड़ा स्ट्रक्चर है। ये गैलेक्सीज और गैलेक्सी क्लस्टर्स की चेन है, जो एक दूसरे से ग्रैविटी के जरिए जुड़ी हुई हैं। इसका आकार अक्सर 100 गुना तक बढ़ जाता है और इसमें हजारों गैलेक्सीज शामिल हैं।"
- खोज में शामिल IUCAA के साइंटिस्ट शिशिर सांख्यायन और रिपोर्ट के राइटर जॉयदीप बागची ने कहा, "हाल में खोजा गया सरस्वती सुपरक्लस्टर 60 करोड़ लाइट ईयर तक एक्स्टेंड हो सकता है। इसका आकार 2 करोड़ अरब सूर्यों के बराबर है। हमारी गैलेक्सी भी सुपर क्लस्टर लैनिआकी का हिस्सा है।"
- "स्लोअन डिजिटल स्काई सर्वे नाम के स्पेक्ट्रोस्कोपिक सर्वे में इस विशाल दीवार जैसी गैलेक्सी का मिलना एक आश्चर्य की तरह है।"
कई सवालों के जवाब मिलेंगे
- साइंटिस्टों ने कहा, "डाटा को एनालाइज करने के बाद ये खोज संभव हो सकती है। ये सुपर क्लस्टर साफ तौर पर कॉस्मिक फिलामेंट्स (ब्रह्मांडीय धागे) का नेटवर्क है, जिनमें कल्सटर्स और लार्ज वॉइड्स (बड़े निर्वात/शून्य) शामिल हैं। इस तरह के बड़े सुपर क्लस्टर कम ही पाए गए हैं। सरस्वती सुपर क्लस्टर इन सबसे काफी दूर है और इसकी खोज के कई ऐसे सवालों का जवाब मिलने की उम्मीद है,जो अभी तक अनसुलझे हैं। जैसे कि किस तरह इतना बड़ा और घना क्लस्टर अरबों साल पहले बना?"
ये साइंटिस्ट थे खोज में शामिल
शिशिर सांख्यायन, पीएचडी स्कॉलर, इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस एंड एजुकेशन एंड रिसर्च (IISER)
प्रतीक दबाढे, रिसर्च फेलो, IUCAA
जो जैकब, न्यूमैन कॉलेज
प्रकाश सरकार, नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, जमशेदपुर

- साभार बिजनेस स्टान्डर्ड और Vishwa Samvad Kendra Gujarat

गुरुवार, 25 अप्रैल 2019

7 नवंबर : विद्यार्थी दिवस : डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर




    डॉ. भीमराव आंबेडकर के प्रति अपने सन्मान के प्रतिक स्वरुप महाराष्ट्र भाजपा सरकार के शिक्षा विभाग ने 27 अक्टुबर 2017 को एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए दिनांक 7,नवंबर को विद्यार्थी दिवस के रूप में सभी विद्यालयों एवं जुनियर कोलेजों में मनाया जाएगा।

   118 वर्ष पुर्व 7 नवंबर 1900 के दिन बालक भीमराव रामजी सकपाल (आंबेडकर) का सातारा शहर के राजवाड़ा चौक पर स्थित गवर्नमेंट हाईस्कूल जो अब प्रतापसिंह हाईस्कूल विख्यात है के अंग्रेजी पहली कक्षा में स्कुल प्रवेश हुआ था। राजवाड़ा की गवर्नमेंट हाईस्कूल के रजिस्टर में "भीमा रामजी आंबेडकर" का नाम क्रमांक 1914 पर अंकित हुआ था । रजिस्टर में अपने नाम के सामने बालक भीमराव के हस्ताक्षर मौजूद हैं। यह ऐतिहासिक दस्तावेज क्यों स्कुल प्रसाशन ने सम्मान और गर्व से सहेज रखा है।
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का  का स्कूल में प्रवेश का दिन एक क्रांति दिन के साथ एक ऐतिहासिक घटना भी है।  बाबासाहेब के स्कूल का पहला दिन यानी शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति और एक युगांतर की शुरुआत थी. उनके स्कूल में जाने के कारण ही अनेक सुशिक्षित हुए साथ ही करोड़ो दलितों का उद्दार भी हुआ. उनके स्कूल जाने के कारण ही भारत को एक बेहतरीन संविधान भी मिला जो स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे को महत्व देता है ।
  7,नवंबर 1900 के दिन हुए भीमराव आंबेडकर के शिक्षा के प्रथम दिन के स्मरण हेतु और विद्यार्थियों को "केवल शिक्षा ही उन्नति का एकमात्र साधन है, और इसके कठीन परिश्रम की जानकारी मिलने हेतु" महाराष्ट्र की भाजपा सरकार ने इस दिवस को "विद्यार्थी दिन" के रूप में घोषित किया है।
इस दिन महाराष्ट्र के सभी विद्यालयों एवं जुनियर कोलेजों में डॉ. भीमराव आंबेडकर के जीवन एवं कार्य पर आधारित निबंध, व्याख्यान, प्रतियोगिताएं, क्विज प्रतियोगिताएं, कविता पाठ, वक्तृत्व प्रतियोगिता जैसे विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।


शुक्रवार, 12 अप्रैल 2019

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर : रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया




આ આર્ટિકલ ને ગુજરાતી ભાષા માં વાંચવા માટે અહીં ક્લિક કરો. https://free29811.wordpress.com/2019/04/01/ડૉ-બાબાસાહેબ-આંબેડકર-વિદ/?preview=true

आज अप्रैल का पहला दिन, भारतीय अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा दिन और समर्थन इतिहास है। 1 अप्रैल, 1935 को, इंपीरियल लेजिस्लेटिव काऊंसिल मे पारित किये बिल से भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना बाबासाहेब अम्बेडकर द्वारा हिल्टन यंग कमीशन (भारतीय मुद्रा और वित्त पर शाही आयोग) द्वारा प्रस्तुत दिशा-निर्देशों, कार्यशैली और दृष्टिकोण के अनुसार की गई थी।
डॉ। बाबासाहेब अम्बेडकर का नाम लेते ही दर्शकों के सामने एक जीवंत संघर्ष उभर कर आएगा। डॉ भीमराव रामजी आंबेडकर का नाम लेते हुए, एक अदम्य योद्धा के दूरदर्शी दर्शन हैं। डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर केवल एक नाम या व्यक्ति नहीं है, बल्कि एक से अधिक लोगों का पर्यायवाची शब्द है, एक से अधिक वैशेष्ट्यौ की दैव निर्मित एकता है। एक से अधिक कृति के स्वामी की पहचान है। तेजस्वीता, वैचारिक स्पष्टता और अखंडता के जीवित प्रतीक का अर्थ है कि डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर।
भारतीय इतिहास में सबसे ज्यादा अन्याय जिन महापुरुषो, राष्ट्रनयाको को हुआ है उनमे सबसे मुख्य व्यक्तित्व यानि ड़ॉ बाबासाहब अंबेडकर। शायद एक राष्ट्रीय नेता के नेता को एक विशेष समुदाय का नेता बनाने का षड्यंत्र शायद इसी वजह से हुआ होगा ताकी सुर्य समान दीपवमान भीमराव की आभा से शायद किसी की व्यक्तिगत सिमित प्रतिभा सम्पूर्ण स्वरुप से छीप जाने का जोखिम था।
डॉ। बाबासाहेब अम्बेडकर ने अपनी पुस्तकों के साथ-साथ उनके भाषणो में क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्लेटफार्मों से विभिन्न विषयों पर अपने विचार प्रकाशित किए हैं। उनका विषय केवल राजनीति तक ही सीमित नहीं है, परंतु सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, कानूनी, संवैधानिक, इतिहास, शिक्षा जैसे कई विषयों में विस्तारित है।
यदि वास्तव में आप ड़ॉ बाबासाहेब अम्बेडकर को समझना चाहते हैं, तो कोनसे बाबासाहेब अम्बेडकर को समझना ? क्योंकि डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर समाजशास्त्री हैं, डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर इतिहासकार हैं, बाबासाहेब अम्बेडकर एक अर्थशास्त्री हैं, डॉ बाबासाहेब एक नृवंशशाश्त्री हैं, शिक्षक ड़ॉ बाबासाहेब अम्बेडकर, एक कानून का पालन करने वाले डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर, संविधान निष्णात है ड़ॉ बाबासाहब अंबेडकर, धरमपुरष है ड़ॉ बाबासाहब अंबेडकर, राष्ट्रनयाक है बाबासाहब अंबेडकर ......  ये प्रत्येक व्यक्तित्व एक महापुरुष मे समाविष्ट है।लेकिन हां, डॉ बाबासाहेब किसी धर्म या जाति विशेष के खिलाफ नहीं हैं।
जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने कहा कि – महापुरुषोको उनकी महानता के लिए क्या सजा की जाएं उसकी समज ना होने से ईश्वर उनको अनुयाई देकर सजा करते हैआज के समय में, कई राष्ट्रीय नेताओं को एक जातिवादी वैगन में बदलने और उन्हें जातिवाद केजार के नीचे एक अंधे की आंख को मोड़ने का दुष्ट कार्य जारी है। चलिए, आज इस विषय पर अधिक नहीं कहना चाहिए अन्यथा बहोत पुस्तके भरी जा सकती है।
डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर के व्यक्तित्व में शामिल अर्थशास्त्री को सम्मनित करना है। डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर भारत की पहली पीढ़ी के पहले अर्थशास्त्री थे जिन्होंने अर्थशास्त्र में औपचारिक शिक्षा प्राप्त की। भारतीय राजनीति में, वे पहले ऐसे नेता थे जिन्होंने अर्थशास्त्र में व्यावसायिक प्रशिक्षण लिया। उनके संशोधन पत्र दुनिया की प्रमुख अकादमिक पत्रिकाओं में छपे थे। डॉ बाबासाहेब अंबेडकर अर्थशास्त्र का अध्ययन करने के लिए जुलाई 1913 में कोलंबिया विश्वविद्यालय पहुंचे। कोलंबिया विश्वविद्यालय में, उन्होंने 29 अर्थशास्त्र, 11 इतिहास, 6 समाजशास्त्र, 5 दर्शनशास्त्र, 4 मानवशास्त्र, 3 राजनीति और 1-1 प्राथमिक जर्मन और फ्रेंच भाषा पाठ्यक्रमों का गहन अध्ययन किया। बाबासाहेब अम्बेडकर की शिक्षा, सीखने की उनकी लगन और पुरुषार्थ के लिए कोलंबिया विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध प्रोफेसर, श्री सेलिगम ने कोलंबिया विश्वविद्यालय के स्मारक में लिखा है की - : "यदि कोई छात्र कोलंबिया विश्वविद्यालय में अब तक अध्ययन करने के लिए आया है तो वो है बी आर अंबेडकर, और अंतिम छात्र अध्ययन करके गया है, तो वह है बी आर अम्बेडकर ......।  डॉ भीमराव अंबेडकर तीन साल कोलंबिया विश्वविद्यालय में अभ्यास करने के बाद 1916 में भारत लौटे। तत्पश्चात , मुंबई कॉलेज में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर के रूप में, उन्होंने लगभग तीन वर्षों तक अर्थशास्त्र पढ़ाया। इसके बाद वह अपनी डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त करने के लिए लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स चले गए। 1923 में, उन्होंने एडविन केनन के मार्गदर्शन में अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। लंदन में अध्ययन के दौरान, डॉ अम्बेडकर धाराशाश्त्री  बने।
भारत लौटने के बाद, उन्होंने देखा कि भारतीय निर्यातकों और ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासकों के वहीवट के हितो के बीच संघर्ष था। इस विषय से डॉ अंबेडकर ने रुपये की समस्या पर अधिक ध्यान केंद्रित किया, उन्होंने समस्या की गणना की, और देखा कि ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार ब्रिटिश निर्यातकों को उनके तैयार माल के निर्यात की सुविधा के उद्देश्य से भारतीय रुपये के उच्च मूल्य को बनाए रखती है, ताकि भारतीय निर्यातकों को नुकसान हो जाता है। डॉ। बाबासाहेब अम्बेडकर के विचारों और कांग्रेस के विरोध के बाद, ब्रिटिश सरकार समस्या के निदान और जांच के लिए सहमत हुई और 1925 में, रॉयल “कमीशन ऑन इंडियन करेंसी एंड फाइनेंस" पर गठित हुई। वह समस्या की जांच करने के लिए भारत आने वाला था।
“रॉयल कमिशन ऑन इंडियन करन्सी ऐंड फायनांस” का मुख्य उदेश्य भारतीय वित्तीय मामलों के प्रबंधन के नियमन कर एक नीति बनाना था । डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर ने आयोग में उपस्थित होकर जॉन मेनार्ड कीनस्टार्ट के सुझाव का विरोध करते हुए व्यापार विनियमन में स्वर्ण मानक पर विचार करने का सुझाव दिया। 2001 में भारतीय आर्थिक इतिहासकार श्री अंबिराज भारतीय अर्थशास्त्र में बाबासाहेब के योगदान के बारे में बोलते हुए, उन्होंने कहा कि "उनके पास पूरी तरह से सैद्धांतिक विचार नहीं थे, लेकिन उस नीति को लागू करने और इसे लागू करने के निहितार्थ के बारे में सोच रहे थे"।
रॉयल कामिशन ऑन इंडियन करन्सी ऐण्ड फायनान्स समक्ष बाबासाहेब ने जिस तरह से भारतीय रुपये के संघर्ष के संदर्भ को परिभाषित किया वह आज के समय के संबंध में भी उतना ही प्रासंगिक और प्रस्तूत है। डॉ अंबेडकर ने कहा कि शुरुआत से ही यह समझना आवश्यक है कि इस विवाद में दो अलग-अलग प्रश्न शामिल हैं। 1. क्या हमें अपनी विनिमय दर को स्थिर करना चाहिए? 2. किस अनुपात में विनिमय दरों का अनुपात होना चाहिए, जिस पर हम अपनी विनिमय दरों को समायोजित कर सकें? आज की स्थिति काफी अलग है लेकिन डॉ। बाबासाहेब अंबेडकर ने जिस तरह से सवाल पेश किया, वह आज भी मौजूद है। इस तरह से कि "भारतीय रिजर्व बैंक को रुपया बचाना चाहिए?" और आपको विनिमय दर के किस स्तर पर पैसा बचाना चाहिए?
उस समय विनिमय दर दो अलग-अलग समूहों के बीच थी जो एक दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा करते थे, जिसमें ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार एसा विनिमय दर चाहती थी जो ब्रिटिश निर्यातकों को अधिक लाभान्वित करे जबकी कांग्रेस भारतीय व्यापारियों के पक्ष में सस्ते रुपये की मांग कर रही थी। 19 वीं शताब्दी के अंतिम चरण में, भारतीय निर्यातकों के लिए सस्ता रुपया फायदेमंद हो19 वीं शताब्दी के अंतिम चरण में, भारतीय निर्यातकों के लिए सस्ता रुपया फायदेमंद होगा यह डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर एक अर्थशास्त्री होने के कारण जानते थे उन्होंने एक आकर्षक तर्क दिया कि रुपये का सीमित मूल्यह्रास किया जाना चाहिए। डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर रुपये के उलटफेर से उत्पन्न होने वाले राजस्व बंटवारे के सवाल से भलीभांति परिचित थे।
डॉ बाबासाहेब अंबेडकर ने कहा कि "रुपये के सीमित मूल्यह्रास से पेशेवरों, उद्योग और वेतनभोगी दोनों वर्गों को मदद मिलेगी, रुपये का एक बड़ा मूल्यह्रास हानिकारक साबित होगा क्योंकि इससे मुद्रास्फीति की दरों में तेज वृद्धि देखी जाएगी। उन्होंने कहा कि रुपये का मूल्यह्रास करते समय, इन दोनों समूहों के हितों का ध्यान रखा जाना चाहिए क्योंकि उच्च मूल्यह्रास से मुद्रास्फीति बढ़ेगी जिससे वेतनभोगी वर्ग की वास्तविक आय कम हो जाएगी।
रॉयल कामिशन ऑन इंडियन करन्सी ऐण्ड फायनान्स के सामने अपनी बात पेश करते हुए, डॉ बाबासाहेब ने कहा कि सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा यह माना जाता है कि कम विनिमय दर से लाभ होता है, लेकिन यह लाभ कहाँ से आता है? ज्यादातर उद्योगपतियों का मानना है कि कम विनिमय दरों से निर्यात फायदेमंद है और बहुत से लोगों ने इस बारे में सोचे बिना ही अंध बन कर इसका स्वीकार कर लिया है, जिससे यह एक एसा विचार बन गया है कि निम्न विनिमय दर देश को समग्र रूप से लाभान्वित करती है। अब अगर वास्तव में देखा जाए तो विनिमय दर कम होने के कारण आंतरिक कीमतें बढ़ती हैं, इससे यह स्पष्ट है कि यह लाभ वास्तव में देश के बाहर से लाभ नहीं है, लेकिन देश के एक वर्ग का नुकसान दूसरी श्रेणी का लाभ है।
डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर ने रुपयों की समस्या को अच्छी तरह से समझा था। उन्होंने साबित किया कि घरेलू मुद्रास्फीति की समस्या के साथ रुपये का सीधा संबंध है। उन्होंने अपने शोध प्रबंध में कहा कि "जब तक रुपये की स्थानीय क्रय शक्ति स्थिर नहीं होगी, तब तक रुपया स्थिर नहीं होगा"।
आर्थिक इतिहासकार श्री अम्बिराजन ने कहा कि "डॉ अंबेडकर ने मूल्यों और स्वचालित वित्तीय प्रबंधन की स्थिरता का स्पष्ट रूप से समर्थन किया।“ इस बात को आज के संदर्भ मे एसे कहा जा सक्ता है की "विनियमित वित्तीय प्रबंधन"।
डॉ अम्बेडकर ने जब से अर्थशास्त्र में अपनी पढ़ाई पूरी की, तब से लेकर आज तक भारतीय अर्थव्यवस्था बहुत बदल गई है, लेकिन रुपये की समस्या का निदान, रोकथाम के लिए उनके विचार और उनके दृष्टिकोण अभी भी प्रासंगिक हैं। जैसे खुली अर्थव्यवस्था में मूल्यह्रास के लाभ, वितरण के परिणामों पर विचार करने की आवश्यकता, स्थानीय अर्थव्यवस्था में अर्थव्यवस्था की स्थिरता बनाए रखने की आवश्यकता और इसके लिए व्यवस्था का चयन और उनके लिए कानून के विवेकपूर्ण नियम…।
डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर अपने समय के सर्वश्रेष्ठ अर्थशास्त्री थे। वे पैसे और सोने के मानक को जोड़ने के विचार से सहमत थे।
भारत का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है? डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर ने 1920 के दशक के मध्य से लगभग अर्थशास्त्र को छोड़ दिया। अन्यथा, उनका प्रारंभिक पत्र 1918 में प्रकाशित हुए "भारत के कृषि क्षेत्र में छोटे भूमि धारकों की समस्या" जिसमे पीछे से भारत में विकास के विभिन्न क्षेत्रों की उम्मीदों के सामने भविष्यवाणियाँ हुईं। भारत के कृषि क्षेत्र में छिपे हुए बेरोजगारी या अधिशेष जनशक्ति के उपयोग के कारण कृषि के शोषण के सवाल का जवाब था। उनका स्पष्ट मानना था कि भारतीय कृषि क्षेत्र अपनी क्षमता से अधिक लोगों को रोजगार प्रदान करता है, जिससे कि कृषि क्षेत्र दबाव में आ गया है और इस अधिशेष जनशक्ति का उपयोग राष्ट्र के विकास के लिए किया जाना चाहिए। इस अधिशेष जनशक्ति को सही अर्थों में रोजगार प्रदान करने के लिए, औद्योगीकरण सबसे आवश्यक और सबसे अच्छा तरीका है, और इसलिए कृषि क्षेत्र के विकास को बहुत तेज गति मिलेगी।

अनुवादकर्ता : प्रार्थना देवेन्द्रकुमार

सोमवार, 11 फ़रवरी 2019

तिलका मांझी उर्फ जबरा पहाडीया

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लड़ाकू सेनानी और प्रथम शहीद “तिलका मांझी जिन्हें “जबरा पहाड़िया” के नाम से भी जाना जाता है। तिलका मांझी वह व्यक्तित्व है जिन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध सर्व प्रथम सशस्त्र आवाज उठाई थी, उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध लंबी लड़ाई छेड़ी थी । अंग्रेजी गुलामी के विरुद्ध, अंग्रेजों की बर्बरतापूर्ण सरकार के विरुद्ध तिलका मांझी ने गगनभेदी आवाज उठाई थी। स्वतंत्रता देवी के पूजारी इस वीर स्वाधिनता सैनिक को 1785 में अंग्रेजों ने फांसी दे दी। तिलका मांझी के प्राणों की आहुति ने स्वतंत्रता संग्राम की आग को लगातार जलाए रखा जिसकी आंच 1957 संपूर्ण भारत में लगी और स्वाधिनता की यज्ञवेदी की ज्वालाने अंग्रेजों और अंग्रेजी सरकार की जड़ों को जलाना शुरू कर दिया।
पहाड़िया भाषा में “तिलका” का अर्थ होता है गुस्सैल और लाल आंखों वाला व्यक्ति और ग्राम प्रधान को “मांझी” कहा जाता है, जबरा पहाड़िया ग्राम प्रधान थे इसलिए उन्हें मांझी कहा जाता है। यह एक कारण है कि हिल रैंजर्स के सरदार जौराह उर्फ जबरा पहाडीया, जबरा मांझी या तिलका मांझी के नाम से विख्यात हो गए। अंग्रेज काल के दस्तावेजों में भी तिलका मांझी नाम का उल्लेख नहीं है परंतु जबरा पहाड़िया के नाम से उल्लेख है। उनका मुल नाम जबरा पहाड़िया ही था किन्तु अंग्रेजों ने उन्हें खुंखार डाकु और गुस्सैल (तिलका) मांझी ( समुदाय प्रमुख) नाम दिया।
जन्म
तिलका मांझी उर्फ जबरा पहाडीया के बारे में कहा जाता है कि उनका जन्म 11 फरवरी 1750 में आज के बिहार के सुल्तानगंज में तिलकपूर नामक गांव में एक आदिवासी परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम सुदरा मुर्मु था। कहा जाता है कि तिलका मांझी उर्फ जबरा पहाडीया मुर्मु गोत्र के थे। तिलका मांझी को जबरा पहाड़िया के नाम से भी जाना जाता है। आदिवासी परिवार में जन्मे तिलका मांझी बचपन से ही अपने संस्कृति और सभ्यता की छत्रछाया में धनुष-बाण चलाना, जंगली जानवरों का शिकार करना, घने जंगलों में नीडर होकर घुमना सिखा । कुश्ती करना, ऊंचे पहाड़ व पेड़ों पर आसानी से चढ़ना-उतरना, घने जंगलों, बीहड़ों, घाटी ओं में घुमना उनके लिए दैनंदिन जीवन का हिस्सा बन चुके थे। इसी जीवन ने उन्हें बहादुर, वीर, साहसी, पराक्रमी और निर्भय एवं योद्धा बना दिया था।
अंग्रेजों का दमन और विद्रोह करता मन
तिलका मांझी उर्फ जबरा पहाड़िया ने बाल्यकाल से ही अंग्रेजों के द्वारा उनके समूहों के उपर हो रहे अत्याचार और दमन देखा था और मन ही मन गुस्सा करते हुए कैसे अपने समूहों को अंग्रेजी सरकार के अत्याचारों और दमन से छुटकारा मिल सके यह सोचते रहते थे। बाल्यकाल से ही मस्तिष्क में अंग्रेजों के विरुद्ध उठता ज्वार किशोरावस्था में तुफान बन गया था। निर्दोष, भोले और गरीब आदिवासियों की जमीन, खेती, जंगल के वृक्षों पर अंग्रेजों ने अपने अंकुश में ले लिया था। इन भोले आदिवासी परिवारों के बुढे, बच्चे और महिलाओं को अंग्रेजी सरकार अनेक प्रकार से प्रताड़ित किया करती थी। आदिवासिओं के अंचल के इलाकों में पहाड़ी जनजाति का शासन हुआ करता था परंतु वहां के सरदार भी अपनी भूमि, खेती और जंगल को बचाने के लिए अंग्रेजों से संघर्ष करते थे। जब यह आदिवासी समुदाय अंग्रेजों से संघर्ष कर रहे थे तब पहाड़ियों के इर्द-गिर्द रहते जमीनदारों में अंग्रेजों की भक्ति छाई हुई थी। जब जब आदिवासी समुदाय की लडाई अंग्रेजों से आमने-सामने हो जाती थी तब तब वो पर्वतीय भारतीय जमीनदार अंग्रेजों के समर्थन में उतर आते थे और अंग्रेजी सरकार को खुलकर साथ देते थे।
विद्रोह
बाल्यकाल से ही पनप रही विद्रोह की चिंगारी किशोरावस्था में अंग्रेजों के अत्याचारों को देख ज्वाला का स्वरुप धारण कर रही थी। अंततः एक दिन इस विद्रोह की ज्वाला ने आग का वेश ले लिया और तिलका मांझी ने “बनैचारी जोर” नामक स्थान से अंग्रेजों और अंग्रेजी सरकार, गुलामी के विरुद्ध विद्रोह शुरू कर दिया। बहादुर तिलका मांझी के नेतृत्व में आदिवासी वीरों की टुकड़ी ने अपने कदमों को सुल्तानगंज, भागलपुर और दुर सुदुर के जंगल के क्षेत्रों में पसारा। तिलका मांझी की अगुवाई में आदिवासी वीरों की टुकड़ी आगे बढती जा रही थी। राजमहल के क्षेत्रों में इन आदिवासी वीरों की भिड़ंत अंग्रेजी सैनिकों से हो गई, वीरों की टुकड़ी की बहादुरी के सामने अंग्रेजों के सैनिक हार रहे थे, स्थिति का जायजा लेने के बाद अंग्रेजों ने अपने चालाक और फूट डालो और राज करो की नीति पर चलने वाले अधिकारी क्लिवलेंड को मैजिस्ट्रेट नियुक्त किया और संपूर्ण सत्ता के साथ राजमहल भेजा। तिलका मांझी अंग्रेजों की फूट डालकर शासन करने की योजना को समज गये और अंग्रेजी सरकार को खुलकर ललकारा और स्वतंत्रता की लडाई ओर तेज कर दी।
गुरिल्ला युद्ध और क्लीवलैंड की हत्या
अब तिलका मांझी और उनके रणबांकुरों की लडाई क्लीवलैंड की अंग्रेजी सेना और स्वयं क्लीवलैंड से हो रहा था। सुल्तानगंज, भागलपुर से लड़ते हुए तिलका मांझी और उनके रणबांकुरो की सेना अब जंगलों, तराई, गंगा, ब्रह्मपुत्रा आदि नदियों की घाटीओं से होकर मुंगेर, भागलपुर और संथाल परगना के इलाकों में आ चुके थे। संथाल परगना के पर्वतीय क्षेत्रों में तिलका मांझी और उनके वीर, साहसी, पराक्रमी आदिवासी स्वतंत्रता सैनिक छत्रपति शिवाजी महाराज की युद्ध कला गुरिल्ला युद्ध का प्रयोग कर रहे थे। क्लीवलैंड और आयर कुट की अगुवाई वाली अंग्रेजी सेना को तिलका मांझी और उनके वीरों ने जमकर चुनौती दी, तिलका मांझी के सैनिक छुप छुप कर अंग्रेजों की सेना पर हमला करने लगे थे, अंग्रेजी सेना से कई स्थानों पर जमकर लड़ाई होती रही परंतु तिलका मांझी के सैनिक हार नहीं मान रहे थे। तभी तिलका मांझी उर्फ जबरा पहाडीया के सैनिक लड़ते लड़ते भागलपुर की ओर आगे बढ़ने लगे, आगे बढ़ते बढ़ते वीर साहसी आदिवासी योद्धाओं ने अंग्रेजी सेना पर जमकर, छीप छीपकर अस्त्र शस्त्र प्रहार करते रहे। क्लीवलैंड की अंग्रेजी सेना तिलका मांझी का पीछा कर रही थी, उसी समय मौका पाकर तिलका मांझी उर्फ जबरा पहाडीया एक ऊंचे ताड के वृक्ष पर चढ गए, ठीक उसी समय अपने घोड़े पर सवार क्लीवलैंड उसी ताड के वृक्ष की ओर आया। दक्ष और चौकन्ने तिलका मांझी उर्फ जबरा पहाडीया ने समय और मौके का फायदा उठाकर अपने धनुष से क्लीवलैंड पर बाणों की बौछार कर दी और उस आततायी, अत्याचारी, अंग्रेजी सरकार के अफ़सर को मार गिराया। 13 जनवरी 1784 के दिन तिलका मांझी ने क्लीवलैंड को मार गिराया, इस घटना का समाचार सुनकर अंग्रेजी सरकार में जैसे भुकंप आ गया, डांवाडोल हो गई, अंग्रेजी अफसरों में तिलका मांझी और उनके रणबांकुरों का भय व्याप्त हो गया।
साथी सरदार का द्रोह और धरपकड़
भारतीय परतंत्रता का इतिहास द्रोहियों के बिना नहीं लिखा जा सकता, ऐसे अनेक राष्ट्र द्रोहियों के कारण ही भारत विदेशी आक्रमणों का शिकार हुआ और गुलाम बना। तिलका मांझी और उनके वीरों के बीच में भी एक ऐसा ही गद्दार पनप रहा था। अविराम युद्ध कर रहे तिलका मांझी उर्फ जबरा पहाडीया और उनके वीरों की टुकड़ी एक पर्वतीय क्षेत्र में रात्रि के समय स्थानिक उत्सव में शामिल थे, आदिवासी समुदाय अपने प्रिय सरदार के सामने सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत कर रहा था, तिलका मांझी और उनके सैनिक इस सांस्कृतिक कार्यक्रम में मग्न थे उसी समय एक गद्दार सरदार जाउदाह ने तिलका मांझी और उनके वीरों पर आक्रमण कर दिया, बहादुर वीर तिलका मांझी बच गए, उनके सैनिक उन्हें बचाने में सफल हो गए परंतु अनेक राष्ट्रभक्त वीर शहीद हुए, काफी देशभक्त नायकों को पकड़ लिया गया और उन पर तिलका मांझी के ठिकानों को जानने के लिए अमानवीय अत्याचार कीए गए। तिलका मांझी बचकर सुल्तानगंज के पर्वतीय अंचल क्षेत्रों में शरण ली, परंतु अंग्रेजी सेना ने तिलका मांझी को पकड़ने के लिए आकाश पाताल एक कर रही थी। भागलपुर से लेकर सुल्तानगंज और वो सभी क्षेत्र जहां तिलका मांझी के होने की संभावना अंग्रेजी सरकार को था वहां तिलका मांझी को पकड़ने के लिए जाल बिछाया गया था।
अंग्रेजी सरकार ने तिलका मांझी उर्फ जबरा पहाडीया के समर्थकों को ढुंढ ढुंढ कर पकड़ना शुरू कर दिया था और इस कार्य के लिए तिलका मांझी के सैनिक में फूट डालने की कोशिशें की जा रही थी। समर्थकों के पकड़े जाने के कारण अब तिलका मांझी और उनके वीरों के लिए पर्वतीय अंचल क्षेत्रों में छुप-छुपकर संघर्ष करना कठिन हो रहा था, तिलका मांझी की सेना के पास अब अन्न उपलब्ध नहीं हो पा रहा था। कठिन परिस्थितियों को देखते हुए तिलका मांझी और उनके वीरों ने अंग्रेजी सेना पर छापामार कार्रवाई करनी शुरू कर दी। एक बार तिलका मांझी और उनके आदिवासी वीरों की टुकड़ी ने अंग्रेजी सेना पर प्रत्यक्ष रूप से हमला किया, दोनों सेनाओं की ओर युद्ध हुआ, तिलका मांझी के सैनिक हार मानने को तैयार नहीं थे, वीरता का परिचय जैसे प्रतिक्षण हो रहा था, परंतु आखिर अंग्रेजों ने तिलका मांझी और उनके वीरों को घेर लिया, तिलका मांझी के लिए अब बचकर निकल जाना और अपने अपने सैनिकों को बचाना मुश्किल हो गया था। आखिर अंग्रेजों की सेना कामयाब हुई और वीर तिलका मांझी उर्फ जबरा पहाडीया को बंधक बना लिया गया।
तिलका मांझी उर्फ जबरा पहाडीया को बंधक बनाने के बाद अंग्रेजों की बर्बरतापूर्ण सरकार का अमानवीय चहेरा सामने आया कहते हैं कि जबरा पहाडीया उर्फ तिलका मांझी को चार घोड़ों के पीछे बांधकर मीलों तक घसीटते हुए भागलपुर लाया गया।
1771 से 1784 तक तिलका मांझी उर्फ जबरा पहाड़िया ने ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध लंबा संघर्ष किया. उन्होंने कभी भी समर्पण नहीं किया, न कभी झुके न,डरे. उन्होंने स्थानीय सूदखोरों-ज़मींदारों (दिकुओं) एवं अंग्रेज़ी शासकों को जीते जी कभी चैन की नींद सोने नहीं दिया, मीलों तक घसीटने के बावजूद भारत मां का यह वीर, साहसी, पराक्रमी योद्धा जिवीत था। स्वतंत्रता के संग्राम में लड़ते हुए रक्त स्नान कीए देह को देखकर भी अंग्रेज़ों में डर देखा जा सकता था। तिलका मांझी की गुस्सैल लाल लाल आंखें अंग्रेजी सरकार को जैसे डरा रही थी। भयभीत अंग्रेजों ने तिलका मांझी को भागलपुर के चौराहे पर खड़े एक विशाल वृक्ष पर सरेआम उनकी निर्मम, अमानवीय हत्या कर दी। हजारों लोगों की उपस्थिति में जबरा पहाडीया उर्फ तिलका मांझी हंसते हंसते फांसी पर झुल गए। तिलका मांझी को जिस दिन फांसी दी वह तारीख संभवतः 15 जनवरी 1785 थी। इस घटना के बाद तिलका मांझी उर्फ जबरा पहाडीया का अनुसरण करते स्वतंत्रता के लड़ाके “हांसी हांसी, चढबो फांसी”गीत गाते गाते फांसी पर चढ गए।

मंगलवार, 1 जनवरी 2019

नये भारत की नई ट्रेन - ट्रेन 18 : पार्ट 2

भारतीय रेलवे की सर्व प्रथम इंजनलेस ट्रेन, ट्रेन 18 अब भारत की सबसे तेज ट्रेन बन गई जब पीछले दिनों इस ट्रेन ने कोटा – सवाई माधोपुर के बीच हुए परिक्षण में 180 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ़्तार हासिल कर लिया और गतिमान एक्सप्रेस का 160 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ़्तार का किर्तिमान तोड़कर अपने नाम कर लिया। इस समय ICF के आधिकारिक सूत्रों का मानना है कि सिग्नल सिस्टम, रेलवे ट्रैक वगैरह सही हो तो यह ट्रेन अपनी महत्तम रफ्तार 200 किलोमीटर प्रतिघंटा पा सकती है।
वैसे भारतीय रेलवे की ईस सबसे तेज ट्रेन के विषय में बहुत कुछ लिखा और दिखाया गया है ही परन्तु इस ट्रेन के विषय में जानने की उत्सुकता थम नहीं रही है।
ट्रेन 18 के विषय में जानने से पहले हमारे पास भारतीय रेलवे की तुलनात्मक जानकारी अति आवश्यक है। भारतीय रेलवे और चाइनीज रेलवे के विकास की समीक्षाकरने का प्रयास इस श्रेणी के प्रथम भाग में किया गया था।
ट्रेन 18 को प्रधानमंत्री की महात्वाकांक्षी प्रोजेक्ट मेक इन इंडिया के अंतर्गत इंटीग्रल कोच फेक्ट्री, चेन्नई ने विकसित किया है। इस ट्रेन को डिजाइन करने, विकसित करने और बनाने में इंटीग्रल कोच फैक्ट्री चेन्नई को केवल 18 महिनों का कम समय लगा है। भारत की इस सेमी हाई स्पीड ट्रेन T 18 के एक रैक की लागत केवल ₹100 करोड़ आई है जो कि इसी प्रकार की युरोपीयन ट्रेन से करीब 40% कम है, बताया जाता है कि जैसे जैसे इसका उत्पादन बढ़ेगा किमत ओर कम हो जायेगी। वर्तमान में इंटीग्रल कोच फैक्ट्री चेन्नई ने 1 युनिट बनाकर भारतीय रेलवे को समर्पित कर दिया है जबकि भारतीय रेलवे ने 2 ओर ट्रेन बनाने का प्रस्ताव रखा है। भारतीय रेलवे को इंटीग्रल कोच फैक्ट्री मार्च 2019 तक दुसरी ट्रेन 18 की रैक सुपर्द करेंगी। ट्रेन 18 शताब्दी एक्सप्रेस की जगह लेने की योजना बनाई गई है।
इस ट्रेन को वर्ष 2018 में ही 29 दिसंबर के दिन प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी हरी झंडी दिखाकर शुभारंभ करने की योजना बनाई गई थी जो अब मुख्य रेलवे सुरक्षा आयुक्त (CCRS) की रिपोर्ट को बोर्ड द्वारा अनुमोदित करने के बाद जनवरी 2019 में होने की संभावना है। जानकारों के अनुसार इस रिपोर्ट में कुछ शर्तें और कुछ सुझाव दिए गए हैं, ट्रेन को 130 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से दौड़ने से पहले उस सुझावों पर अमल करना होगा। गौरतलब है की 160-200 किलोमीटर प्रतिघंटा रफ्तार से दौड़ने में सक्षम इस ट्रेन ने ट्रायल के दौरान 180 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार हासिल कर दिखाया है, सीसीआरएस ने इस ट्रेन को 160 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से दौड़ाने की सशर्त अनुमति दे दी है, सीसीआरएस ने जो शर्तें रखी है उनमें बाड़बंदी प्रमुख एक है। सुरक्षा के लिहाज से इस ट्रेन को 130 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से दौड़ाने के लिए रेलवे ट्रैक के दोनों तरफ बाड़बंदी की आवश्यकता महसूस की जा रही है ताकि हादसों से बचा जा सके। जैसे कि पहले बताया कि यह ट्रेन शताब्दी एक्सप्रेस की जगह लेगी साथ ही यह खबर है कि इस ट्रेन को सबसे पहले दिल्ली – वाराणसी के बीच में चलाने का प्रस्ताव है।
ट्रेन 18 की विशेषताएं
  • इस ट्रेन को मेक इन इंडिया के अंतर्गत बनाया गया है।
  • ट्रेन 18 की डिजाइन एयरोडायनामिक इसे बुलैट ट्रेन जैसा लूक देता है।
  • ट्रेन 18 की कल्पना, डिजाइन और निर्माण भारत में ही इंटीग्रल कोच फैक्ट्री चेन्नई ने किया है।
  • ट्रेन 18 की कल्पना, डिजाइन और निर्माण संपूर्ण रुप से भारतीय तकनीक से किया गया हैं।
  • इस ट्रेन के एक रेक का खर्च केवल ₹100 करोड़ है जो उत्पादन बढ़ने से कम होता जाएगा।
  • इस ट्रेन को रेकोर्ड 18 महिनों में विकसित किया गया है जो कीसी विकसित देशों की तुलना में करीब आधा है।
  • इस ट्रेन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें इंजन नहीं है, सेल्फ प्रोपेल्ड है।
  • ट्रेन 18 के दोनों अंतिमो पर लोको पायलट, ट्रेन चालक की केबिन है।
  • इस ट्रेन में कुल मिलाकर संपूर्ण रुप से वातानुकूलित 16 कोच होंगे।
  • मुंबई – अमदावाद, चैन्नाई – बेंगलुरु, दिल्ली – भोपाल जैसे शताब्दी एक्सप्रेस के रुट पर क्विक इन्ट्रा डे के लिए खास है।
  • परंपरागत ट्रेनों की तुलना में ट्रेन 18 में 50% ज्यादा बिजली के कारण अच्छा एस्कलेरेशन होगा।
  • अन्य ट्रेनों की तुलना में 10% – 15% कम ट्रावेल समय लगेगा।
  • ट्रेन 18 में 16 संपूर्ण वातानुकूलित कोच होंगे, प्रत्येक 14 कोच में 78 सीट्स और 2 एक्जीक्यूटिव चेर कार में 52 सीट्स होंगी।
  • दिव्यांग प्रवासीओं के लिए 2 विशेष शौचालय और शिशुओं के देखरेख के लिए अलग व्यवस्था की गई है।
  • इस सेमी हाई स्पीड ट्रेन में प्रवासीओं के लिए वाई-फाई, जीपीएस, बायो वेक्युम सिस्टम और इन्फोटैनमेन्ट है।
  • एक्जीक्यूटिव चेर कार की सीट्स रोटेटिंग टेक्नोलॉजी से लैस होने से 360° घुमाकर प्रवासी बाहर के नज़ारों का आनंद ले सकते हैं।
  • ट्रेन 18 में स्मार्ट ब्रेकिंग सिस्टम और इलेक्ट्रॉ-न्युमेटिक ब्रेकिंग सिस्टम है।
  • स्पेशल पेन्ट्री युनिट होगा।
  • प्रत्येक कोच में इमरजेंसी स्विच दिया गया है।
  • यात्रीओं की सुरक्षा के लिए प्रत्येक कोच में 6 सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं और एक सीसीटीवी कैमरा ट्रेन चालक की केबिन के बाहर लगा है।
  • यात्रीओं को सुचना हेतु प्रत्येक कोच को एलईडी स्क्रीन से लैस किया गया है।
  • ट्रेन की दोनों तरफ ओटोमेटिक स्लाइडींग दरवाज़ें होंगे।
  • भारत की यह पहली ऐसी ट्रेन है जहां यात्री लोको पायलट (ट्रेन चालक) की कैबिन के दरवाजे तक जाकर ट्रेन की संचालन पैनल देख सकता है।
विडियो सौजन्य - भारतीय रेलवे

महंगाई के अनमोल फायदे: ज़रा दूसरा पहलू भी देखिए!

आजकल जहां देखो वहां एक ही राग सुनाई देता है—“महंगाई बढ़ गई, महंगाई ने जीना मुश्किल कर दिया!” लेकिन क्या आपने कभी सिक्के का दूसरा पहलू देखने ...