मंगलवार, 4 जुलाई 2023

क्या है शांघाइ कोओपरेशन ओर्गेनाइजेशन (एससीओ, SCO)




शांघाई कोओपरेशन ओर्गेनाइजेशन अथवा एससीओ (SCO)  राजनीति, अर्थशास्त्र, विकास और सेना के मुद्दों पर केंद्रित एक अंतर सरकारी संगठन है। इसकी शुरुआत 1996 में चीन, रूस, कजाकिस्तान, ताजिकिस्तान और किर्गिस्तान के नेताओं द्वारा 'शंघाई फाइव' के रूप में हुई थी। 2001 में sco यानी शांघाइ कोऑपरेशन ओर्गेनाइजेशन की रचना 2001 में हुई, आरंभ में इस संगठन में रशिया, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, उजबेकिस्तान और चीन को मिलाकर कुल 6 सदस्य देश थे। 2017 में भारत और पाकिस्तान के जुड़ने से स्थायी सदस्य देशों की संख्या 8 हुई आर्मेनिया, अजरबेजान, कम्बोडिया, नेपाल, श्रीलंका और तुर्कीये यह 6 देश SCO के डायलॉग पार्टनर है और अफ़गानिस्तान, बेलारूस, इरान और मंगोलिया इसके निरिक्षक देश है नवंबर 2021 में अब तक निरिक्षक रहे इरान को स्थायी सदस्य के रूप में जोडने की प्रक्रिया शुरु की गई थी। आम तौर पर एससीओ को उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (NATO) के पूर्वी समकक्ष के रूप में देखा जाता है। अपने भौगोलिक महत्व के कारण एशिया में एससीओ की रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण भूमिका है - यह उसे मध्य एशिया को नियंत्रित करने और क्षेत्र में अमेरिकी प्रभाव को सीमित करने में सक्षम बनाता है। वर्तमान में संगठन के आठ सदस्य देश शामिल हैं। 2005 में कज़ाकस्तान के अस्ताना में हुए सम्मेलन में भारत, ईरान, मंगोलिया और पाकिस्तान के प्रतिनिधियों ने भी पहली बार हिस्सा लिया इन देशों की सूची में भारत, पाकिस्तान और उज्बेकिस्तान सहित चार पर्यवेक्षक देश और छह संवाद भागीदार देश शामिल थे भारत और पाकिस्तान 2017 में स्थायी सदस्य बने एससीओ में वैश्विक आबादी का 40%, वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 20% और दुनिया की 22% भूमि शामिल है। एससीओ ने संयुक्त राष्ट्र से भी संबंध स्थापित किए हैं और यह महासभा में पर्यवेक्षक है. एससीओ ने यूरोपीय संघ, आसियान, कॉमनवेल्थ और इस्लामिक सहयोग संगठन से भी संबंध स्थापित किए हैं.

2001 में संगठन का नाम बदलकर एससीओ कर दिया गया। इसका मुख्य उद्देश्य क्षेत्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करना सीमा मुद्दों को हल करना, आतंकवाद और धार्मिक अतिवाद का समाधान करना और क्षेत्रीय विकास को बढ़ाना है। यह संगठन देशों की राजनीति, अर्थव्यवस्था, विकास और सेना से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करने के साथ उनका समाधान करने की रणनीति बनाता है. संगठन का लक्ष्य आतंकवाद को रोकना, व्यापार और अर्थव्यवस्था को बढ़ाने के लिए जरूरी मुद्दों पर चर्चा करना है. हालांकि कोई भी कदम उठाने से पहले संगठन के सभी सदस्य देशों की मंजूरी लेना अनिवार्य है. इसके अलावा यह संगठन सदस्य देशों के बीच कारोबार के साथ टेक्नोलॉजी, कल्चर और रिसर्च को साझा करते हैं.

ईरान एससीओ का नया सदस्य है, जिसे उज्बेकिस्तान में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन के 2022 शिखर सम्मेलन में स्थायी सदस्य देशों में जोड़ा गया था। आठ एससीओ सदस्य देशों ने ईरान की स्थिति को पर्यवेक्षक से पूर्ण सदस्य तक उन्नत करने के लिए अपनी सहमति दी। ईरान ने 2008 में पूर्ण सदस्य के रूप में संगठन में शामिल होने के लिए आवेदन किया था। यह 15 वर्षों से अधिक समय तक पर्यवेक्षक सदस्य था। समरकंद शिखर सम्मेलन में ईरान को एससीओ के स्थायी सदस्य के रूप में शामिल किया गया है। ईरान 2023 में भारत द्वारा आयोजित होने वाले शिखर सम्मेलन से पूर्ण सदस्य के रूप में एससीओ में भाग लेगा।

 




कैसे चलता है SCO ?

 

SCO का मुख्यालय बैजिंग चीन में है, SCO की आधिकारिक भाषा चीनी और रशियन है। एससीओ में सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था राज्य परिषद (एचएससी) के प्रमुख हैं। एचएससी वर्ष में एक बार बैठक करती है और एससीओ के सभी महत्वपूर्ण मामलों पर दिशानिर्देश और निर्णय अपनाती है। वर्तमान महत्वपूर्ण आर्थिक और अन्य सहयोग मुद्दों को हल करने के लिए संगठन की बहुपक्षीय सहयोग रणनीति और प्राथमिकता वाले क्षेत्रों पर चर्चा करने के लिए एससीओ शासनाध्यक्ष परिषद (एचजीसी) वर्ष में एक बार बैठक करती है। संगठन के दो स्थायी निकाय हैं - पहला ताशकंद स्थित क्षेत्रीय आतंकवाद विरोधी संरचना (आरएटीएस) की कार्यकारी समिति है और दूसरा बीजिंग स्थित एससीओ सचिवालय है। एससीओ आरएटीएस की कार्यकारी समिति के निदेशक और एससीओ महासचिव को 3 साल की अवधि के लिए राज्य प्रमुखों की परिषद द्वारा नियुक्त किया जाता है।

बुधवार, 24 मई 2023

सेंगोल : भारत का राजदंड







भारत का नया संसद भवन के निर्माण का कार्य करीब समाप्त हो गया है और अगले कुछ दिनो में नये संसद भवन का उद्घाटन भी किया जायेगाउद्घाटन प्रधानमंत्री को करना चाहिए या राष्ट्रपति को इस बात पर सत्ता पक्ष और विपक्ष में विवाद चल रहा है. अब यह जानकारी प्राप्त हो रही है कि भारत के नये संसद भवन में स्पीकर के पास 'सेंगोल' रखा जायेगा.  जब से यह खबर आइ है कि भारत के नये संसद भवन में सेंगोल को स्थापित किया जाएगा तभी से यह चर्चा का आरंभ हो गया है कि आखिर सेंगोल है क्या ? 'सेंगोल'  वैसे कोइ नया नहीं है भारत के लिये, सेंगोल भारत की स्वतंत्रता और भारत के स्वर्णिम इतिहास के साथ जुडा हुआ है

'सेंगोल' शब्द का उद्भव और इतिहास

 कहा जाता है कि सेंगोल शब्द की उत्पत्ति संस्कृत शब्द "संकु" से लिया गया है, जिसका अर्थ होता है "शंख"। और ऐसा भी कहा जाता है कि  सेंगोल यह शब्द तमिल भाषा के शब्द 'सेम्मई' से निकला हुआ शब्द है। इसका अर्थ होता है धर्म, सच्चाई और निष्ठा। सेंगोल राजदंड भारतीय सम्राट की शक्ति और अधिकार का प्रतीक हुआ करता था। हिंदू मान्यताओं और सनातन धर्म  में शंख को बहुत पवित्र माना गया है। सेंगोल शब्द्प्रयोग यह चोला साम्राज्य से जुड़ा हुआ है। पुरातन काल में सेंगोल को सम्राटों की शक्ति और अधिकार का प्रतीक माना जाता था। इसे राजदंड भी कहा जाता था। 1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ तो इसी सेंगोल को अंग्रेजों से सत्ता मिलने का प्रतीक माना गया। अब नए संसद भवन में सेंगोल को स्थापित किया जाएगा। अब तक इस सेंगोल को प्रयागराज के संग्रहालय में रखा गया था। 

भारत के लोगों के पास शासन एक आध्यात्मिक परंपरा से आया. सेंगोल शब्द का अर्थ और भाव नीति पालन से है. ये पवित्र है, और इस पर नंदी विराजमान हैं. ये आठवीं शताब्दी से चली आ रही सभ्यतागत प्रथा है. चोल साम्राज्य से चली आ रही है.

सेंगोल का तमिल चोल साम्राज्य से संबंध 

चोल साम्राज्य दक्षिण भारत का सब से बडा साम्राज्य रहा है और चोल राजवंश के इतिहास को देखे तो पता चलता है कि चोल साम्राज्य के राजा और राजवंश साहित्य, कला, वास्तुकला एवं संस्कृति के संरक्षण में अपने असाधारण योगदान के लिए इतिहास प्रसिद्ध था। सेंगोल चोल राजाओं शासनकाल के दौरान उनकी सच्चाई, शक्ति और संप्रभुता  के प्रतिष्ठित प्रतीक के रूप में प्रसिद्ध हुआ और इतिहास में अपनी अमर कहानी लिखी है।

चोल साम्राज्य के उस सुवर्णकाल के दौरान राजाओं के राज्याभिषेक समारोह होते थे तब उस समारोह में सेंगोल का अत्यधिक महत्व हुआ करता था। 'सेंगोल'  एक ध्वजदंड या भाले के स्वरूप में कार्य करता था, 'सेंगोल' में अद्भुत नयनरम्य और विलक्षण उत्कीर्णन, नक्काशी और जटिल सजावट होती थी। 'सेंगोल' को अधिकार एवं शक्ति का एक पावन प्रतीक माना जाता था, जो एक शासक के द्वारा दूसरे शासक को सत्ता के हस्तांतरण के स्वरूप में सौंपा जाता था। 

समकालीन समय में अगर देखा जाये तो सेंगोल को अत्यधिक सन्मानित किया जाता है,आदर दिया जाता है। सेंगोल आज के समय में भी गहरा सांस्कृतिक महत्व रखता है। सेंगोल भारत की पुरातन, स्वर्णिम और ऐतिहासिक विरासत एवं परंपरा के प्रतीक के रूप में अत्यंत प्रतिष्ठित है, जो विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों, त्योहारों और महत्वपूर्ण समारोहों के अभिन्न अंग के स्वरूप में कार्य करता है।

'सेंगोल' और भारत की स्वतंत्रता 
भारत के अंतिम ब्रिटिश वायसराय लार्ड माउंटबेटन अपने कार्यकाल के बहुत मत्वपुर्ण और अंतिम टास्क की तैयारी कर रहे थे, यह टास्क था भारत को सत्ता हस्तांतरित करने का। भारत को सत्ता का हस्तांतरण का कागजी कार्य पूरा हो चुका था, परंतु ये प्रश्न था कि आखिर भारत की स्वतंत्रता और सत्ता हस्तांतरित करने का प्रतिक क्या होगा? लार्ड माउंटबेटन के इस प्रश्न का उत्तर उस समय किसी के पास नहीं था यह प्रश्न लोर्ड माउंट्बेटन ने जवाहरलाल नेहरु से भी पुछा जवाहरलाल नेहरु के पास इस प्रश्न का उत्तर नही था तब जवाहर लाल नेहरू गए तमिलनाडु से संबंध रखने वाले पूर्व गर्वनर जनरल सी. राज गोपालाचारी के पास और सी. राजगोपालाचारी (राजाजी) से सत्ता के हस्तांतरण के प्रतीकात्मक समारोह के विषय में सलाह मांगी। सी. राज गोपालाचारी भारत के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को समझते थे, उन्होंने बहुत विचार करके जवाहरलाल नेहरुने मांगी सलाह का प्रत्युत्तर देते हुए चोल राजवंश के सत्ता हस्तांतरण के मॉडल से प्रेरणा लेने का सुचन कीया और सेंगोल का नाम सुझाया। इतिहास बताता है की चोल वंश में एक राजा से दूसरे राजा को सत्ता सौंपते समय शीर्ष पुजारियों के आशीर्वाद लिए जाते थे। राजाजी ने बताया, चोल राजवंश के काल में एक राजा से उसके उत्तराधिकारी को सत्ता का हस्तांतरण सेंगोल के द्वारा प्रतीकात्मक रुप से किया जाता था। सेंगोल को तत्कालिन समय में और आज भी अधिकार और शक्ति के प्रतीक माना गया है।
भारत के ऐतिहासिक धरोहर को जानने वाले राजाजीने इस चर्चा के बाद तमिलनाडु के तंजौर जिले में स्थित सब से पुराने एक धार्मिक मठ, थिरुववदुथुराई अधीनम से संपर्क किया। अधीनम मठ से जुड़े संस्थान भगवान शिव की शिक्षाओं और परंपराओं का अनुपालन एवं अनुसरण करते हैं। करीब 500 से अधिक वर्षों से सातत्यपुर्ण रुप से कार्य कर रहे थिरुववदुथुरै अधीनम का अधीमों के बीच एक महत्वपूर्ण और सन्माननीय स्थान है। राजाजी ने थिरुवावदुथुराई के 20वें गुरुमहा महासन्निधानम श्रीलाश्री अंबलवाण देसिगर स्वामी से संपर्क किया, वह उस समय बीमार थे, परंतु उन्होंने इसका दायित्व स्वीकार किया उन्होंने प्रसिद्ध जौहरी वुम्मिडी बंगारू कोसेंगोल बनाने के लिए कहा अंतत: सोने का सेंगेाल तैयार कराया गया, जिसकी लंबाई लगभग पांच फीट थी। विशेष रूप से,जिसके शीर्ष पर नंदी को विराजमान किया गया जो न्याय और निष्पक्षता को दर्शाता है। मठ की ओर से ही एक दल को विशेष विमान से नई दिल्ली भेजा गया, ताकि सेंगोल को लार्ड माउंटबेटन तक पहुंचाया जा सके। सेंगोल के निर्माण में शामिल और वुम्मिदी परिवार के दो सदस्य वुम्मिदी एथिराजुलु (96 वर्ष) और वुम्मिदी सुधाकर (88 वर्ष) आज भी जीवित हैं।
 

 

रविवार, 21 मई 2023

गंगा : भारत की प्रथम क्लोन गिर गाय की बछड़ी


समग्र ब्रह्मांड में प्राकृतिक प्रकार से हुआ जन्म एक विशेष प्रसंग हैं, चाहे वो  धरती पर किसी जीव का बच्चा हो या आकाशगंगा में अथवा आकाशगंगा के बाहर अन्य आकाशगंगा में  किसी  तारे का जन्म हो। मानव जाति प्रतिदिन विज्ञान के पथ पर आगे बढ रही है और इसी  पथ पर आज मानव जाति विज्ञान के उस छोर पर पहुंच गई है जहां उसने जन्म की प्राकृतिक व्यवस्था को चुनौति देकर प्रकृति को अपने हाथ में लेने का प्रयास किया है।  ऐसी  एक प्रयास का परिणाम है गंगा बछडी, क्लोनिंग पद्धति से जन्मा गिर गाय का मादा बछडा गंगा भारत के क्लोनिंग विज्ञान की दिशा में मील का पत्थर गिना जा रहा है।  हरियाणा के करनाल स्थिति राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान ने यह इतिहास रचा है।  2021 में उत्तराखंड लाइव स्टॉक डेवलपमेंट बोर्ड देहरादून के सहयोग से राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान करनाल ने भारत में पाइ जानेवाली गिर, साहीवाल और रेड-सिंधी जैसी देशी गायों के क्लोनिंग का कार्य शुरू किया था। इसी परियोजना के तहत 16 मार्च 2023 को गिर नस्ल की एक क्लोन बछडी का जन्म हुआ. इसका नाम गंगा रखा गया। जन्म के समय इसका वजन 32 किलोग्राम था औऱ यह बछड़ी स्वस्थ है. गिर गाय भारत के देशी गाय की एक प्रसिद्ध नस्ल है. जो मूलत: गुजरात में पाई जाती है. हरियाणा के करनाल में राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (एनडीआरआई) में गंगा का जन्म करवाने वाले वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि क्लोनिंग से देशी गायों के प्रजनन को बढ़ावा मिलेगा, जिनकी संख्या क्रॉस-ब्रीडिंग, उच्च उपज वाली विदेशी नस्लों और निर्यात को अपनाने से घट गई है।

जिसके तहत एनडीआरआई कार्य करता है ऐसे भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के महानिदेशक डॉ. हिमांशु पाठक का मानना है की “गिर गाय जैसे देशी जानवर रोग प्रतिरोधी हैं और देश की गर्म और आर्द्र जलवायु के अनुकूल हैं। क्लोनिंग तकनीक में भारत में पशुपालन के द्वारा दूध से आमदनी करनेवाले वकिसानों के लिए अधिक दूध देने वाले स्वदेशी मवेशियों की आवश्यकता को पूरा करने की क्षमता है," 



गिर गाय ही क्यों ?

हरित क्रांति के बाद, कृषि के बढ़ते मशीनीकरण ने इन गायों की भारतीय नस्लों को आर्थिक रुप से कम लाभदायक बना दिया था, इसलिए किसानों ने ज्यादा दूध उत्पादन के लिए क्रॉस-ब्रीडिंग का प्रयोग करने का प्रयास कीया, परंतु लम्पी त्वचा रोग जैसी बीमारियों के लिए संकर नस्ले अधिक संवेदनशील निकले और यह प्रयास असफल और नुकसानदायक दिखाई देने लगा। ऐसे समय पर राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान करनाल ने देसी गायों के सरंक्षण और संख्या वृद्धि के लिए पशु क्लोनिंग तकनीक विकसित करने का आरंभ किया। प्रश्न यह था कि किस नस्ल का क्लोनिंग किया जाय तब यह ध्यान किया गया कि पारंपरिक भारतीय गाय की नस्लें जैसे गिर, साहीवाल और रेड सिंधी मुख्य रूप से अपेक्षाकृत ज्यादा दूध देने वाले जानवर हैं। 

     इस काम के लिए गिर नस्ल का चुनाव इसलिए किया गया क्योंकि ये गाय अन्य नस्लों की अपेक्षा, बहुत अधिक सहनशील होती है। यह अत्यधिक तापमान व ठंड को आसानी से सहन कर लेती है. इनके अंदर अन्य गायों के मुकाबले रोग प्रतिरोधक क्षमता भी ज्यादा होती है एवं विभिन्न ऊष्ण कटिबन्ध रोगों के प्रति रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए जानी जाती है. इसी कारण, भारत की देशी गायों की ब्राजील, अमेरिका, मैक्सिको, और वेनेजुएला में बहुत मांग हैं. 

डॉ. सोलकर बताते है "जब हम सबसे बेहतर नस्ल की पहचान करने बैठे, तो गिर नस्ल की गाय को निस्संदेह चैंपियन पाया। यह एक मजबूत नस्ल है और कभी भारत में बहुतायत से पाई जाती थी।  यह कठोर मौसम का सामना कर सकती है।  इन सबसे ऊपर, यह एक अधिक दूध देने वाली नस्ल है।  इस कारण इसे ब्राजील ले जाया गया जहां इसने श्वेत क्रांति लाई,” डॉ. सेलोकरने आगे कहा।  “गिर और साहीवाल गायों में दुग्ध उत्पादन को 2-3 गुना तक बढ़ाने की क्षमता होती है।  एक सामान्य भारतीय गाय एक दिन में औसतन 4-5 लीटर देती है, वहां यह नस्लें एक दिन में 15-20 लीटर उत्पादन कर सकती हैं।"

फोटो सौजन्य: द क्विंट


कैसे हुआ गिर गाय का क्लोनिंग 

इस प्रोजेक्ट से संलग्न वैज्ञानिक के अनुसार ‘भैंस की अपेक्षा गाय से सेल और अंडे निकालना काफी मुश्किल था. साथ ही हमारे पास गाय की क्लोनिंग की टेक्नीक भी मौजूद नहीं थी. ऐसे में हमें काफी रिसर्च करनी पड़ी इस तकनीक को विकसित करना काफी चुनौतीपूर्ण रहा है. हम 2021 से ही इसकी कोशिश में जुटे थे यह पूरी प्रक्रिया में करीब 2 वर्ष का समय लगा और अब आकर हमें सफलता मिली है.’ 

गाय के इस बछड़े को पैदा करने के लिए वैज्ञानिकों ने तीन जानवरों का इस्तेमाल किया। अंडाणु को साहीवाल नस्ल से लिया गया था, दैहिक कोशिका गिर नस्ल से ली गई थी और एक सरोगेट पशु एक संकर नस्ल था। गिर गाय के क्लोनिंग की संपूर्ण प्रक्रीया का विवरण एनडीआरआई के वैज्ञानिक ने ऐसे किया....

एनडीआरआई करनाल के वैज्ञानिक डॉ नरेश सेलोकर के अनुसार क्लोनिंग में स्पर्म का नहीं, किन्तु सोमेटिक सेल या कोशिकाओं का उपयोग होता है। सोमेटिक सेल या कोशिकाओं को जिस नस्ल का बच्चा चाहिए उस नस्ल के जानवर के शरीर से निकालकर प्रयोगशाला में 'कल्चर' किया जाता है और साथ ही अंडक (ओसाइट्स) को सूइयो की सहायता से अलग कर दिया जाता है। इस प्रकीया के बाद दोनो को मिलाकर भ्रूण तैयार किया जाता है, इस प्रक्रीया में 7-8 दिन का समय लगता है। बाद में भ्रूण (ब्लास्टोसिस्ट) को  सरोगेट माता (गाय) के अंदर प्रस्थापित किया जाता है। यह प्रक्रीया से क्लोन तैयार होता है। इसके 9 महीने बाद क्लोन पशु के बच्चे का जन्म होता है। गंगा की क्लोनिंग के लिए गिर नस्ल का सेल लिया गया. और साहीवाल किस्म का अंडा लिया गया, जिसका DNA निकाल दिया गया था, इससे भ्रूण तैयार किया गया, इस भ्रूण को जर्सी गाय के अंदर स्थानांतरित किया गया.' 

भारतीय वैज्ञानिको के द्वारा क्लोनिंग तकनीक के प्रयोग का इतिहास 

एनडीआरआई करनाल क्लोनिंग तकनीक से भैंस की क्लोनिंग करने में सफलता हासिल कर चुका है। फरवरी 6, 2009 में इस टेक्निक के द्वारा विश्व के सर्वप्रथम भेंस का क्लोनिंग सफलतापूर्वक किया गया था। भैंस के बच्चे को पैदा किया गया था, उसका नाम समरुपा  रखा गया दुर्भाग्यवश इस बछडे के फेफड़े में संक्रमण हो गया और पांच-छह दिन में उसकी मृत्यु हो गई। इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना से वैज्ञानिक निराश नहीं हुए और इसी वर्ष 6 जून 2009 को उनका प्रयास फलीभूत हुआ, और एक मादा क्लोन बछड़ा गरिमा पैदा हुई, जन्म समय गरिमा का वजन 43 किग्रा था, गरिमा दो वर्ष से अधिक समय तक जीवित रही. गरिमा का जन्म भारत में डेयरी अनुसंधान के इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाता है।  बाद में  22 अगस्त 2010 को गरिमा-2 का जन्म क्लोनिंग से किया गया, जिससे अब तक सात सामान्य बछड़े पैदा हो चुके हैं।वैज्ञानिकों ने 26 अगस्त, 2010 को पहला नर बछड़ा श्रेष्ठ भी पैदा किया, जिसके वीर्य का उपयोग अच्छे जननद्रव्य के गुणन के लिए किया जा रहा है। क्लोन भैंस गरिमा ने 2013 में मादा बछड़ा को जन्म दिया जिसका नाम महिमार खा गया, उसके बाद 2014 में एक और मादा बछड़े को जन्म दिया उस बछडे का नाम करिश्मा रखा गया। यह बछडे क्लोन भैंस से पैदा हुए विश्व के पहले बछड़े हैं। वर्ष 2017 में CIRB ने पहले क्लोन असमिया भैंस नर बछड़े का जन्म करवाया,  उस नर असमिया नर भेंस बछडे का नामांकन सच-गौरव किया गया। 2021 का गणतंत्र दिवस एनडीआरआई के इतिहास में सर्वदा स्मरण किया जायेगा उस दिन  एक क्लोन नर भैंस बछड़े का जन्म करवाया गया और गणतंत्र दिवस पर जन्म हुआ था इस दिन को याद रखने के लिए उसका नाम गणतंत्र रखा गया। 

वर्ष 2012 में एनडीआरआई और शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय ने कश्मीर में नूरी नामक विश्व की पहली पश्मीना भेड के क्लोन का जन्म करवाया। 

बुधवार, 26 अप्रैल 2023

विश्व में कितनी भाषाएं बोली जाती है ?




 विश्व में कितनी भाषाएं हैं, कितनी भाषाएं बोली जाती है वैसे इसका सटीक  उत्तर देना संभव नहीं है परंतु  एक अनुमान के अनुसार विश्व में कुल भाषाओं की संख्या करीब 7000 से ज्यादा है । दुर्भाग्यवश संचार के माध्यमों में लगातार वृद्धि होने के साथ कई ऐसी छोटी छोटी भाषाएं है जो लुप्तप्राय है और कई ऐसी भाषाएं है जो लुप्त होने के कगार पर आ गई है। जब कोइ भाषा लुप्त होती है तो उस भाषा के लुप्त होने के साथ ही उसे बोलने वालों की संस्कृति भी समाप्त हो जाती है। आज के समय में अगर मोटे तौर पर देखे तो विश्व की आधी से अधिक जनसंख्या के द्वारा केवल 23 भाषाएँ हैं जिनका विशेष प्रयोग किया जाता है।

विश्व में सब से ज्यादा बोली जानेवाली भाषा कौन सी है ?

जब किसी भी विषय की तुलनात्मक बात होती है तो सदैव हम यह सोचते है के विश्व में सब से आगे उस विषय में कौन होगा ठीक ऐसे ही जब भाषा की बात करते है तो हमें स्वाभाविक ही प्रश्न होता है की विश्व में सब से ज्यादा किस भाषा का प्रयोग किया जाता है ? कौन सी भाषा सब से ज्यादा बोली जाती है और हमारी हिंदी भाषा का नंबर किस पायदान पर आता है ? 

विश्व में सर्वाधिक बोली जानेवाली भाषा

विश्व में सबसे ज्यादा बोली जानेवाली भाषा मैंडरिन है जो चीन में बोली जानेवाली प्रमुख भाषा है जिसे चीनी भाषा भी कहा जाता है। विश्व में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में प्रथम स्थान लगभग 89.8 करोड़ लोगों द्वारा बोली जानेवाली इस सी भाषा मैंडरिन को प्राप्त है। 

विश्व में सर्वाधिक बोली जानेवाली द्वितिय भाषा

दुसरे नंबर पर विश्व में 43.7 करोड़ लोगों द्वारा जिस भाषा को बोला जाता है ऐसी स्पेनिश भाषा को जाता हैस्पेनिश भाषा स्पेन, चिली, मेक्सिको, पनामा, अर्जेन्टीना, पराग्वे, पेरु, बोलीविया, कोस्टा रीका, अल सेल्वाडोर, क्यूबा, उरुग्वे, वेनेजुएला आदि देशों में बोली जाती है। विश्व में सब से ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में तीसरे नंबर उस देश की भाषा है जिसके लिये कहा जाता था की उसका सुरज कभी डुबता नही है, हाँ तीसरे नंबर पर है अंग्रेजी भाषा, विश्वभर में अंग्रेजी बोलने वाले लोगो की संख्या करीब 37.2 करोड़ है और यह भाशा जिस देशों में बोली जाती है वह सारे देश कभी ना कभी ब्रिटिश उपनिवेशक देश रहे है । वर्तमान समय में अंग्रेजी भाषा विज्ञान, कंप्यूटर, साहित्य, राजनीति और उच्च शिक्षा की मुख्य भाषा है। इसके अलावा यह दुनिया के कई देशों की राजभाषा भी है। इसे दुनिया की पहली अंतरराष्ट्रीय भाषा माना जाता है। 

विश्व में सब से ज्यादा बोली जानेवाली तृतिय की भाषा

विश्व में करीब 29.5 करोड़ लोगों द्वारा बोली जाती और सब से ज्यादा बोली जानेवाली तीसरे नंबर की भाषा एक धर्म विशेष की भाषा भी कही जाती है और यह भाषा अरब के कई देशों की राजभाषा है। इस भाषा को सऊदी अरब, सीरिया, यमन, मिस्र, जॉर्डन, इराक, अल्जीरिया, लीबिया, सूडान, कतर, ट्यूनिशिया, मोरक्को और माली आदि में बोला जाता है। इसी भाषा में पवित्र कुरान-ए-शरीफ लिखी गई है । यह भाषा इस्लाम धर्म की धर्मभाषा कही जाती है और वो है अरबी भाषा 

विश्व में सब से ज्यादा बोली जानेवाली चौथे नंबर की भाषा

 अब आता है नंबर हमारी अपनी भाषा का अर्थात हिंदी भाषा का, यह विश्व की प्रमुख भाषा है तथा भारत की राजभाषा भी। हिंदी भाषा पुरे विश्वभर में करीब 26 करोड़ लोगों द्वारा बोली जाती है। न्यूजीलैंड में हिंदी चौथी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है, हिंदी भाषा नेपाल, मॉरिशस, फिजी, गयाना, सूरीनाम में बोली जाती है। इसके अतिरिक्त हिंदी भाषा अमेरिका, जर्मनी, सिंगापुर में भी बोली जाती है। हिंदी भाषा भारत की सबसे अधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है।

विश्व में सब से ज्यादा बोली जानेवाली पांचवे नंबर की भाषा 

विश्व में सब से ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में भारत की दो भाषाएं शामिल है, चौथे नंबर पर है हिंदी और पांचवे स्थान पर है बंगाली भाषा, बंगाली भाषा विश्व में करीब 24.2 करोड़ लोगों द्वारा बोली जाती है। भारत में बंगाली भाषा पश्चिमी बंगाल और उत्तर पूर्वी भारत के असम, त्रिपुरा में बोली जाने वाली प्रमुख भाषा है। बंगाली भाषा भारत के अतिरिकत बांग्लादेश और विश्व के अन्य देशों में भी बोली जाती है।



 

सोमवार, 17 अप्रैल 2023

राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा और चुनाव आयोग के नियम ?



भारत के संविधान के अनुसार भारत में संघीय व्यवस्था है, भारत लोकतांत्रिक देश है जिस में नयी दिल्ली में केन्द्र सरकार तथा विभिन्न राज्यों व केन्द्र शासित राज्यों के लिए राज्य सरकार है। इसीलिए, भारत में राष्ट्रीय व राज्य (क्षेत्रीय), राजनीतिक दलों का वर्गीकरण उनके क्षेत्र में उनके प्रभाव के अनुसार किया जाता है। भारत में बहु-दलीय पार्टी व्यवस्था है जिसमें छोटे क्षेत्रीय दल अधिक प्रबल हैं। राष्ट्रीय पार्टियां वे हैं जो चार या अधिक राज्यों में मान्यता प्राप्त हैं। उन्हें यह अधिकार भारत के चुनाव आयोग द्वारा दिया जाता है, जो विभिन्न राज्यों में समय समय पर चुनाव परिणामों की समीक्षा करता है। इस मान्यता की सहायता से राजनीतिक दल कुछ पहचानों पर अपनी स्थिति की अगली समीक्षा तक विशिष्ट दर्जे का दावा कर सकते हैं जैसे की पार्टी चिह्न। इलेक्शन कमीशन द्वारा पार्टियों को राष्ट्रीय पार्टी का मान्यता देने का प्रावधान संविधान में 1968 में जोड़ा गया। इसे 'दी इलेक्शन सिंबल(रिजर्वेशन एंड एलॉटमेंट) ऑर्डर, 1968' कहा जाता है।भारत में चुनावो में अनेको दल चुनाव लडते है, जिसमें कुछ दल प्रादेशिक दल कहे जाते है और कुछ दल राष्ट्रीय दल कहे जाते है  सभी दलो को राष्ट्रीय दल या पार्टी का दर्जा नही मिलता है अगर किसी दल या पार्टी को राष्ट्रीय दल/पार्टी का दर्जा पाना है तो उस दल या पार्टी को भारत के चुनाव आयोग द्वारा तय किये गये नियमो का पालन करना होता है और तय किये गये मानदंडो को प्राप्त करना होता है तब जाके कोइ भी पार्टी राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा प्राप्त कर सकती है  किसी भी पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल करने के लिए कुछ प्रमुख शर्तों को पूरा करना होता है। अगर कोई भी पार्टी उन शर्तों को पूरा करती है तो इलेक्शन कमीशन (EC) उसे राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा देता है।

भारत में कितनी पार्टीयां है ?

भारत में पॉलिटिकल पार्टी को चुनाव आयोग में रजिस्टर्ड कराना पड़ता है। भारत में कोई भी चुनाव लड़ सकता है और अपनी पॉलिटिकल पार्टी बना सकता है। भारत में कुल 2,858 पार्टियां हैं। इनकी 3 कैटेगरी है…1. गैर मान्यता प्राप्त पार्टी, 2. क्षेत्रीय पार्टी और 3. राष्ट्रीय पार्टी  

गैर मान्यता प्राप्त पार्टीः ऐसी पार्टियां वो पार्टीयां होती है जो चुनाव आयोग में रजिस्टर्ड तो होती हैं, लेकिन इन्हें मान्यता नहीं मिली होती। क्योंकि या तो ये बहुत नई होती हैं या इन्होंने इतने वोट प्राप्त नहीं किए होते कि क्षेत्रीय पार्टी का दर्जा मिल सके। भारत में ऐसी करीब 2,796 पार्टियां हैं।

क्षेत्रीय पार्टी: जिन्हें चुनाव आयोग से राज्य स्तर की पार्टी का दर्जा मिला है। भारत में ऐसी 35 पार्टियां हैं।

राष्ट्रीय पार्टी : जिन्हें चुनाव आयोग ने नेशनल पार्टी का दर्जा दिया है। भारत में ऐसी 6 पार्टियां हैं।

भारत में वर्तमान में करीब 35 पार्टीयां ऐसी है जो राज्य स्तर/ प्रादेशिक स्तर की मान्यता प्राप्त है। इसके साथ साथ कुल 6 पार्टीयां है जिनको राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा प्राप्त है। जिन पार्टीओं को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा प्राप्त है वो है वो है भारतीय जनता पार्टी (भाजपा, BJP), भारतीय राष्ट्रीय कोंग्रेस (भाराको, Congress), बहुजन समाज पार्टी (बसपा, BSP), कोम्युनिस्ट पार्टी ओफ इंडिया (सीपीआइ (मार्क्सवादी), CPI (M), नेशनल पिपल्स पार्टी (एनपीपी, NPP), आम आदमी पार्टी (आप, AAP)। निर्वाचन आयोग ने सोमवार (10 अप्रैल) को आम आदमी पार्टी (आप) को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा दिया. साथ ही तृणमूल कांग्रेस (TMC), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) का राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा वापस ले लिया है. आप (AAP) को चार राज्यों- दिल्ली, गोवा, पंजाब और गुजरात में उसके चुनावी प्रदर्शन के आधार पर राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिला है. चुनाव आयोग ने कहा एनसीपी और तृणमूल कांग्रेस को हाल में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में उनके प्रदर्शन के आधार पर क्रमशः नगालैंड और मेघालय में राज्य स्तर के दलों के रूप में मान्यता दी जाएगी. इसके अलावा उत्तर प्रदेश में रालोद, आंध्र प्रदेश में बीआरएस, मणिपुर में पीडीए, पुडुचेरी में पीएमके, पश्चिम बंगाल में आरएसपी और मिजोरम में एमपीसी को दिया गया राज्य स्तर की पार्टी का दर्जा भी खत्म कर दिया गया है. 

राज्य स्तर या प्रादेशिक स्तर की पार्टी का दर्जा कैसे मिलता है

1. चुनाव आयोग के द्वारा मान्यता प्राप्त दल/पार्टी को प्रादेशिक (क्षेत्रीय दल) या स्टेट पार्टी का दर्जा प्राप्त करने के लिए आठ प्रतिशत वोटों की आवश्यकता होती है। संबंधित राज्य में लोकसभा या विधानसभा चुनाव में 8 प्रतिशत वोट पाने की आवश्यकता होती है।

2. यदि चुनाव आयोग के द्वारा मान्यता प्राप्त किसी दल/पार्टी को विधानसभा चुनाव में छह प्रतिशत वोट और दो सीटें मिलती है तो उसे प्रादेशिक पार्टी का दर्जा प्राप्त हो जाता है।

3. प्रादेशिक दल का दर्जा प्राप्त करने का एक और रास्ता भी है कि संबंधित राज्य में विधानसभा में कम से कम तीन सीटें मिल जाएं भले ही वोटों की हिस्सेदारी कुछ भी हो।

चुनाव आयोग के द्वारा  राष्ट्रीय पार्टी के दर्जे के लिये क्या कुछ नियम और मानदंड तय किये है ? 

राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल करने के लिए कुछ नियम और मापदंड चुनाव आयोग ने तय किये है और अगर कोई भी पार्टी इन नियमों का पालन करती है और तय किये गये मापदंड को पूरा करती है तो निर्वाचन आयोग उसे राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा देता है। राष्ट्रीय पार्टी बनने के लिए कई प्रकार की शर्तें होती हैं। जिसमें से कम से कम एक शर्त को पूरा करना अनिवार्य होता है।  राष्ट्रीय पार्टी बनने के लिए क्या-क्या शर्तें होती हैं,,,,,,,, 

राष्ट्रीय पार्टी बनने की प्रमुख नियम........ 


राष्ट्रीय पार्टी बनने के लिये जो नियम और मानदंड चुनाव आयोग ने तय किये है वो कुछ इस प्रकार है ....

  • अगर किसी दल को 4 राज्यों में क्षेत्रीय दल का दर्जा प्राप्त है तो उसे राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिल जाता है।
  • अगर कोई दल 3 राज्यों को मिलाकर लोकसभा की 3 फीसदी सीटें जीतती है तो उसे राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिल जाता है।
  • अगर कोई पार्टी 4 लोकसभा सीटों के अलावा लोकसभा चुनाव या विधानसभा चुनाव में 4 राज्यों में 6 फीसदी वोट हासिल करती है तो उसे राष्ट्रीय पार्टी माना जाता है।
  • अगर कोई भी पार्टी इन तीनों शर्तों में से किसी एक शर्त को पूरा करती है तो उसे राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिल जाता है।      
राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा प्राप्त करने से क्या फायदे होते है किसी भी दल/पार्टी/पक्ष  को  ?
  • राष्ट्रीय पार्टियां अपना सिंबल या चुनाव चिन्ह देश भर में सुरक्षित कर सकती हैं।
  • राष्ट्रीय पार्टियां चुनाव प्रचार में अधिकतम 40 स्टार प्रचारक रख सकती हैं साथ ही इनके यात्रा खर्च को उम्मीदवार के चुनाव खर्च में नहीं रखा जाता है।
  •  राजधानी दिल्ली में राष्ट्रीय पार्टियों को सब्सिडी दर पर पार्टी अध्यक्ष और पार्टी कार्यालय के लिए एक सरकारी बंगला किराए पर मिलता है।
  • आम चुनावों के दौरान राष्ट्रीय पार्टियों को आकाशवाणी पर प्रसारण के लिए ब्रॉडकास्ट और टेलीकास्ट बैंड्स मिलते हैं। यानी राष्ट्रीय पार्टियों को सरकारी चैनलों पर दिखाए जाने का समय तय होता है।
  • राष्ट्रीय पार्टियों को नामांकन दाखिल करने के लिए केवल एक प्रस्तावक की जरूरत होती है। अन्य पार्टियों को 2 प्रस्तावक चाहिए। अनरिकग्नाइज्ड पार्टियों और निर्दलीयों को 5 प्रस्तावकों की जरूरत होती है।
  • राष्ट्रीय पार्टियों को मतदाता सूची के दो सेट मुफ्त में दिए जाते हैं। साथ ही इनके उम्मीदवारों को आम चुनावों के दौरान एक प्रति मुफ्त मिलती है


मंगलवार, 11 अप्रैल 2023

1971 : जब राख हो गया था कराची बंदरगाह


 


वर्ष 1971 के भारत-पाक युद्ध में पड़ोसी मुल्क को मुंह की खानी पड़ी थी। पाक के दो टुकड़े कर बांग्लादेश बनाने में नौसेना ने एक बड़ी भूमिका निभाई थी। लेकिन इस जंग में आज का दिन यानी 4 दिसंबर नौसेना के लिए काफी अहम है। देशभर में आज नौसेना दिवस मनाया जाता है, जिसके चलते आज नौसेना की ओर से कई वीडियो भी जारी किए गए। बता दें कि इसी दिन नौसेना ने पाकिस्तान के कराची बंदरगाह में सर्जिकल स्ट्राइक की थी। इस स्ट्राइक को 'ऑपरेशन ट्राइडेंट' के रूप में भी जाना जाता है।

हिंदुओं के नरसंहार से शुरू हुई थी जंग की दास्तां

1971 में बांग्लादेश जो पहले पूर्वी पाकिस्तान के नाम से जाना जाता था, वहां हिंदुओं के खिलाफ एकाएक अत्याचार की घटनाए बढ़ने लगी थी। कई रिपोर्टों के अनुसार वहां लाखों लोग मारे गए थे और महिलाओं से दुष्कर्म आदि के मामलों में बड़ा इजाफा देखने को मिला था। इन्हीं सब को देखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई का फैसला किया। इस बीच पाकिस्तान में बांग्लादेश की आजादी की आवाज तेज हो जाती है भारत के इसमें कूदते ही पाक खुद ही जंग छेड़ देता है और 3 दिसंबर 1971 को भारत में हवाई हमले करता है। जिसके जवाब में 4 दिसंबर की रात भारतीय नौसेना कराची बंदरगाह पर सर्जिकल स्ट्राइक कर उसे तबाह कर देती है। इस अभियान को ‘आपरेशन ट्राइडेंट’ के नाम से जाना जाता है।

1965 का लिया बदला


भारतीय नौसेना 1965 में हुए भारत पाक युद्ध में पाकिस्तान ने अपनी नौसेना और युद्धपोत का इस्तेमाल कर गुजरात में हमला किया था। हालांकि, इसमें भारत को ज्यादा नुकसान नहीं हुआ। लेकिन पाक को मुंहतोड़ जवाब देने से उस समय नौसेना चूक गई क्योंकि उसे इसमें भाग ही नहीं लेने दिया गया। तब उसे रणनीति के तहत भारतीय सीमा के बाहर कोई कार्रवाई न करने का आदेश दिया गया था। इसी को देखते हुए 1971 की लड़ाई में नेवी चीफ एडमिरल एसएम नंदा ने पहले ही इंदिरा गांधी से छूट मांग ली थी, जिसके मिलते ही कराची बंदरगाह धुंआ-धुंआ हो गया।

इस जंग में पाक ने अपनी सबसे शक्तिशाली सबमरीन गाजी को दो मोर्चों को संभालने का जिमा सौंपा था। जिसमें विशाखापट्टनम पर हमला कर उस पर कब्‍जा करना और आईएनएस विक्रांत को नष्‍ट करना शामिल था। लेकिन भारतीय नौसेना को इसकी जानकारी जैसे ही मिली उनसे धावा बोल दिया और 7 दिनों तक कराची बंदरगाह जलता रहा।

4 दिसंबर की रात कराची बंदरगाह पर भारत की बमबारी

3 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान वायुसेना भारत के कई सैनिक अड्‌डों पर हमले करती है, जिसके बाद भारत युद्ध का ऐलान करता है। 4 दिसंबर 1971 की रात को नौसेना की 3 मिसाइल बोट INS निपात, INS निर्घट और INS वीर कराची बंदरगाह पर हमला बोल देती है जिससे वो तबाह हो जाता है। हमले के बाद कई किमी तक बंदरगाह से निकलता धुंआ दिखाई देता है।

आपरेशन ट्रांइडेंट की याद में मनाया जाता है नौसेना दिवस

नौसेना द्वारा तकरीबन 5 दिनों तक चले इस अभियान को आपरेशन ट्रांइडेंट का नाम दिया गया था। इसमें पाकिस्तान को काफी नुकसान हुआ था और भारत को कोई नुकसान नहीं हुआ था। 4 दिसंबर को नौसेना द्वारा शुरू किए गए इस अभियान के कारण ही इस दिन नौसेना दिवस मनाया जाता है।

विश्व मातृभाषा दिन

 प्रति वर्ष 21 फरवरी को ‘अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस’ (International Mother Language Day 2023) मनाया जाता है। दुनियाभर की भाषाओं और संस्कृति का सम्मान हो और इसके प्रति लोगों में प्रेम एवं गौरव बना रहे इस द्रष्टि से समग्र विश्व में 21 फरवरी के दिन अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया जाता है। अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस को मनाने का सबसे बड़ा उद्देश्य विश्वभर में अपनी भाषा-संस्कृति के प्रति लोगों में जागरुकता फैलाना है। 

सर्व प्रथम मातृभाषा दिवस कब और कहां मनाया गया ?

मातृभाषा पर जिनको ममत्व है और जिस भाषाने रवीन्द्रनाथ ठाकुर जैसे नोबेल पुरस्कार विजेता गुरुवर दिये है ऐसे बांग्ला भाषा बोलने वाले और अपनी मातृभाषा पर गौरव का अनुभव करने वाले और विभाजन के पश्चात पाकिस्तान का हिस्सा बन जाने वाले पूर्व पाकिस्तान के ऐसे बांग्लाभाषी विद्यार्थियों और कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपनी मातृभाषा का अस्तित्व बनाए रखने के लिए  1952 में ढाका विश्वविद्यालय के एक विरोध प्रदर्शन किया था। यह विरोध प्रदर्शन बहुत जल्द एक नरसंहार में बदल गया जब तत्कालीन पाकिस्तान सरकार की पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियां बरसा दी। इस घटना में 16 लोगों की जान गई थी।


भाषा के इस बड़े आंदोलन में शहीद हुए लोगों की याद में 1999 में यूनेस्को (United Nation) ने पहली बार अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाने की घोषणा की थी। कह सकते हैं कि बांग्ला भाषा बोलने वालों के मातृभाषा के लिए प्यार की वजह से ही आज विश्व में अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया जाता है।

महंगाई के अनमोल फायदे: ज़रा दूसरा पहलू भी देखिए!

आजकल जहां देखो वहां एक ही राग सुनाई देता है—“महंगाई बढ़ गई, महंगाई ने जीना मुश्किल कर दिया!” लेकिन क्या आपने कभी सिक्के का दूसरा पहलू देखने ...