मंगलवार, 30 जुलाई 2024

संसद में क्यों नही ले सकते अडानी-अंबानी का नाम?

प्रतिकात्मक चित्र

सदन में बजट 2024 पर बहस चल रही है, इस बहस में राहुल गांधी ने अपने भाषण में केंद्र सरकार पर जमकर निशाना साधते हुए चक्रव्यूह का उल्लेख करते हुए छ: लोगों के नाम लिए जिनमें अंबानी और अडानी के नाम भी शामिल थे. राहुल गांधी को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने उन्हें टोकते हुए याद दिलाया कि आप उसका नाम नहीं ले सकते हैं जो फिलहाल सदन का सदस्य नहीं है.

अब प्रश्न यह उठता है कि आखिर राहुल गांधी के सदन में अंबानी -अडानी या किसी और का नाम लेने पर आपत्ति क्यों ? संसद में  किसका नाम नहीं ले सकते ? क्या कहता है नियम ?

क्यों नहीं ले सकते उनके नाम जो सदन के सदस्य नहीं है ?

नियम 380: लोकसभा के प्रक्रिया और  कार्य संचालन के नियम 380 (निष्कासन) के अनुसार अगर अध्यक्ष का मानना है कि बहस के दौरान कुछ ऐसे शब्दों या नाम के इस्तेमाल हुआ जो अशोभनीय या अपमानजनक या असंसदीय हैं तो अध्यक्ष अपने विवेक के अनुसार उन शब्दों को सदन की कार्यवाही से निकालने का आदेश दे सकता है. इस प्रक्रिया को एक्सपंक्शन कहते हैं.

इसके अलावा भारतीय संसद के सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) में भाषण के दौरान किसी बाहर के व्यक्ति का नाम लेने पर पाबंदी होती है. यह पाबंदी संसदीय नियमों और प्रक्रियाओं के तहत लगाई गई है.

नियम 352: "लोकसभा की प्रक्रिया और कार्य संचालन नियमावली" के नियम 352 में कहा गया है कि कोई भी सदस्य किसी व्यक्ति का नाम तब तक नहीं ले सकता है जब तक वह व्यक्ति संसद की कार्यवाही का हिस्सा नहीं हो. ठीक इसी तरह, राज्यसभा की प्रक्रिया और कार्य संचालन नियमावली के तहत भी इस प्रकार के प्रावधान होते हैं. है. इसके अलावा उस सदस्य का नाम भी तब ही लिया जा सकता है जब उससे जुड़ी जानकारी प्रमाणित और सत्यापित हो.  

ऐसे में अगर किसी व्यक्ति का नाम बिना किसी प्रमाण या तथ्य के लिया जाता हैं तो यह संसद के नियमों का उल्लंघन माना जाएगा. इन नियमों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि संसद की कार्यवाही मर्यादित और उद्देश्यपूर्ण रहे, और बाहर के व्यक्तियों का नाम लेकर बहस को अनावश्यक विवादों से दूर रखा जाएगा. 

नियम 353: संसद में अगर किसी सांसद को भाषण के दौरान किसी व्यक्ति पर आरोप लगाना है भी "लोकसभा की प्रक्रिया और कार्य संचालन नियमावली" के नियम 353 के तहत सभापति या अध्यक्ष को उस व्यक्ति के बारे में पहले से ही सूचना देनी होती है और अगर सभापति या अध्यक्ष इसकी अनुमति देते है तभी उन पर आरोप लगाया जा सकता है. 

संसद में भाषण देते समय सदस्य को किस नियमों को ध्यान में रखना चाहिए?

लोकसभा की रूल बुक में नियम 349 से लेकर नियम 356 तक इस बात का विस्तार में जिक्र है कि संसद में भाषण के दौरान किन बातों का ध्यान रखना है, या किन बातों का जिक्र नहीं किया जाना चाहिये है.

नियम 349(1): इस नियम के अनुसार सदन में भाषण देते हुए किसी भी ऐसे किताब, अखबार या पत्र को पढ़ा या इसका जिक्र नहीं किया जा सकता , जिसका सदन की कार्यवाही से कोई लेना देना न हो. 

नियम 349(2): इस नियम के तहत किसी भी सदस्य के भाषण के वक्त शोर- शराबा या किसी भी तरीके से बाधा नहीं डाली जा सकती.

नियम 349(12): यह नियम कहता है कि कोई भी सदस्य स्पीकर की कुर्सी की तरफ पीठ करके न बैठ सकता है और न ही खड़ा हो सकता है. 

नियम 349(16): इसी रूल बुक का यह कहता है कि सदन में कोई भी सदस्य किसी भी झंडा, प्रतीक प्रदर्शित नहीं करेगा. राहुल गांधी की तरफ से हाल ही में भगवान शिव की तस्वीर दिखाने पर स्पीकर ओम बिरला ने इसी नियम का हवाला दिया था.

यह सारे नियम है जिसको ध्यान में रखकर सदन के दोनों सदस्यो को अपना भाषण देना होता है.  यह वो नियम है जिसके तहत कोइ भी सदस्य ऐसे व्यक्तो या व्यक्तोयों के नाम नही ले सक्ते जो सदन के सदस्य नही है. 

मंगलवार, 16 जुलाई 2024

भारतीय विदेश नीति : अर्थ,उद्देश्य,विशेषताएं


 विदेश नीति का अर्थ

विदेश नीति एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जहां विभिन्न कारक (विभिन्न देश) विभिन्न स्थितियों में अलग-अलग प्रकार से एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। प्रत्येक देश की सरकार अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए, अन्य राज्यों से संबंध स्थापित करने व अंतर्राष्ट्रीय प्रश्नों पर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करने के लिए कुछ निश्चित उद्देश्य के आधार पर जो नीति निर्धारित करता है, वह उस देश की विदेश नीति कहलाती है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

किसी भी देश की विदेश नीति एक विशेष आंतरिक एवं बाहरी वातावरण के स्वरूप द्वारा काफी हद तक निर्धारित होती है। इसके अतिरिक्त उसका इतिहास, विरासत, व्यक्तित्व, विचारधाराएं, विभिन्न संरचना आदि का प्रभाव उस पर स्पष्ट रूप से पड़ता है। भारतीय विदेश नीति के प्रमुख लक्ष्यों के निर्धारण एवं सिद्धांतों के प्रतिपादन में भी इन्हीं बहुमुखी तत्वों का योगदान रहा है।
भारत की विदेश नीति की समझ एवं आकलन हेतु भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एवं स्वाधीनता संग्राम के इतिहास पर प्रकाश डालना अति आवश्यक है। इस काल में होने वाले घटनाक्रमों के आधार पर ही स्वतंत्र भारत की विदेश नीति का विकास हुआ है। स्वतंत्र भारत की विदेश नीति की जड़े उन प्रस्तावों व नीतियों में ढूंढी जा सकती हैं, जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपनी स्थापना के पश्चात् के 62 वर्षों (1885-1947) में महत्वपूर्ण विदेश नीति के विषयों पर अपनाई थी। यह सत्य है कि पराधीन भारत की विदेश नीति का निर्माण 1885 में स्थापित इंडिया हाउस, लंदन में होता था। अंग्रेज अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करते थे। लेकिन फिर भी भारत अंतर्राष्ट्रीय कानून के रूप में अंतर्राष्ट्रीय व्यक्ति का दर्जा प्राप्त कर चुका था तथा कई विषयों पर कांग्रेस की प्रतिक्रियाओं के न केवल सकारात्मक परिणाम निकले, बल्कि स्वतंत्र भारत की नीतियों हेतु ठोस आधार भी तैयार हो गया था। इसी आधार पर पराधीन भारत को अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में भागीदारी प्राप्त होने लगी। इसके परिणाम स्वरूप ही भारत संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्था का 1945 में प्रारंभिक सदस्य बन सका।

भारतीय विदेश नीति के उद्देश्य

प्रत्येक राष्ट्र अपने राष्ट्रीय हितों की पूर्ति हेतु विदेश नीति के उद्देश्य तय करते हैं। भारत की विदेश नीति ने भी अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप विभिन्न उद्देश निर्धारित किए हैं। इन उद्देश्यों का विवरण निम्नलिखित है –
1) अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए प्रत्येक संभव प्रयत्न करना।
2) अंतर्राष्ट्रीय विवादों को मध्यस्थता द्वारा निपटाए जाने की नीति को प्रोत्साहन देना।
3) सभी राज्य और राष्ट्रों के बीच परस्पर सम्मानपूर्ण संबंध बनाए रखना।
4) अंतरराष्ट्रीय कानूनों के प्रति और विभिन्न राष्ट्रों के पारस्परिक संबंधों में संधियों के पालन के प्रति आस्था बनाए रखना।
5) सैनिक गुटबंदिओं और सैनिक समझौतों से अपने आप को पृथक रखना तथा ऐसे गुटबंदिओं को प्रोत्साहन न देना।
6) उपनिवेशवाद का कठोर विरोध करना, चाहे वह किसी भी रूप में हो।
7) सभी प्रकार की साम्राज्यवादी भावना का विरोध करना।
8) उन देशों के जनता की सक्रिय सहायता करना जो उपनिवेशवाद, जातिवाद और साम्राज्यवाद से पीड़ित हों।

भारतीय विदेश नीति के निर्धारक तत्व

(1) भूगोल : नेपोलियन बोनापार्ट का यह वाक्य महत्वपूर्ण है कि “किसी देश की विदेश नीति उसके भूगोल द्वारा निर्धारित होती है।” भारत के संबंध में यह तत्व पूर्णतया सत्य है। क्योंकि प्रकृति ने भारत को एशिया महाद्वीप के दक्षिण में हिंद महासागर पर अरब प्रायद्वीप और हिंद चीन प्रायद्वीप के मध्य केंद्रीय स्थिति प्रदान की है। इसकी सीमाएं सभी दक्षिण एशियाई देश तथा पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार एवं मालद्वीप से जुड़ी है। यह स्थिति सामरिक एवं व्यवहारिक स्थिति से महत्वपूर्ण है। इसकी उत्तर सीमा से रूस, चीन, पाकिस्तान और अफगानिस्तान नजदीक है। अतः भारत को दोनों साम्यवादी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखना आवश्यक है। पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति अमेरिका के लिए सैनिक दृष्टि से अनुकूल है। अतः अमेरिका का पाकिस्तान की तरफ एकतरफा झुकाव न हो और एशिया में पाकिस्तान भारत के बीच शक्ति संतुलन बना रहे, इसके लिए भारत को अमेरिका से अच्छे संबंध बनाये रखना है।

(2) ऐतिहासिक अनुभव, परंपराएं एवं संस्कृति : आधारभूत रूप से किसी देश की विदेश नीति उसके तत्कालीन ऐतिहासिक अनुभवों, परंपराओं, और संस्कृति से निर्धारित होती है। भारत की विदेश नीति में इन अनुभवों और परंपराओं के साथ-साथ भारतीय दर्शन के अनुसार भारतीय परंपराओं में राजनीतिक शक्ति का एक आदर्शात्मक स्वरुप उजागर होता है, जिसमें शांति सहयोग और वसुधैव कुटुंबकम् रूपी अंतरराष्ट्रीय वाद का आदर्श रूप दिखाई पड़ता है। भारतीय संस्कृति साम्राज्यवाद और जातिवाद के घोर विरोधी ‘जियो और जीने दो’ के शांति के विचारों का समन्वित रूप विदेशनीति में विरासत के रुप में सम्मिलित है।

(3) राष्ट्रीय हित – प्रत्येक देश की विदेश नीति राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखकर निर्धारित की जाती है। राष्ट्रीय हित में इन सभी बातों का योग होता है, जो किसी राष्ट्र की संस्कृति, सुरक्षा और भौतिक कल्याण की अधिकतम गारंटी पर बल देता है। यह सत्य है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति सदा चलायमान रही है, उसमें कोई स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होते। यह सभी राष्ट्रीय हित को देखते हुए बनते और बिगड़ते रहते हैं। स्थायी तत्व के्वल राष्ट्रीय हित होता है, जिसके लिए ही विभिन्न प्रकार का राजनीतिक ताना-बाना बुना जाता है।

(4) राष्ट्रीय सुरक्षा – प्रत्येक देश की विदेश नीति का लक्ष्य देश की सुरक्षा और विकास होता है। सैनिक दृष्टि से दुर्बल राष्ट्र भी अधिक समय तक अपनी स्वतंत्रता नहीं बनाए रख सकता है। भारत के संदर्भ में यह सत्य सटीक बैठता है। भारत के सैनिक दुर्बलता और राज्यों के बीच वैमनस्यता के कारण ही उसे मंगोलो, सिकंदर और अंग्रेजों की सैनिक शक्ति के सामने अपनी स्वतंत्रता को गिरवी रखना पड़ा था। स्वतंत्रता के बाद भी भारत सैनिक दृष्टि से सफल राष्ट्र नहीं था। इसीलिए भारत की विदेश नीति में सभी राष्ट्रों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखने और अपनी स्वतंत्रता और स्वाभिमान की रक्षा के लिए असंलग्नता की नीति को अपनाया है। अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में शीत युद्ध के चलते नित्य बदलते राजनीतिक समीकरण और गुटबंदियों के चलते भारतीय विदेश नीति अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता, सुरक्षा के लिए समयानुसार अंतरराष्ट्रीय संबंधों में पुनः निर्धारण की प्रक्रिया अपनाती रहती है। जैसे पहले अमेरिका से संबंध बहुत खराब थे, किंतु अब मधुर संबंध बन गए हैं, और वह आण्विक सहयोग भी देने को तैयार है।

(5) आर्थिक विकास – आधुनिक समय में राष्ट्रीय आर्थिक विकास राष्ट्रों के जीवन का महत्वपूर्ण पहलू बन गया है। हर राष्ट्र की आंतरिक नीति आर्थिक जीवन स्तर को ऊंचा उठाते हुए उसके माध्यम से समृद्ध राष्ट्र बनाना रहता है। प्राकृतिक संसाधनों का उचित उपयोग उद्योग, उत्पादन, निर्यात पर है, इसके लिए अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व तकनीकी सहयोग की आवश्यकता पड़ती है, ऐसी स्थिति में संपन्न और पूंजीवादी राष्ट्र इस तरह के सहयोग के बहाने देश की आंतरिक एवं विदेश नीति को प्रभावित करने हेतु सहायता के मुख्य द्वार खोलने को तैयार रहते हैं।

(6) अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सद्भाव को बढ़ावा – भारतीय संस्कृति एवं परंपराऐं सदैव वसुधैव कुटुंबकम के भेद वाक्य को आधार बनाकर अपनी विदेश नीति को विश्व शांति सुरक्षा और सद्भाव को लक्ष्य लेकर चलती हैं। मार्च 1953 में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने यही कहा था कि “हम विश्व शांति के पक्षधर हैं और शांति की स्थापना के लिए यदि भारत कुछ कर सके तो उसे करने का हम भरसक प्रयत्न करते रहेंगे।” इस नीति के द्वारा भारत का सदैव यह प्रयास रहा है कि विश्व राष्ट्रों के मध्य ऐसी स्थितियां न पैदा हो जायें, जिससे अंतरराष्ट्रीय तनाव और अशांति का वातावरण बने और सारा विश्व तनाव ग्रस्त हो जाये। इसीलिए भारत अपनी नीति में आचरण के पांच नैतिक सिद्धांत पंचशील को प्रमुख आधार बनाते हुए शांतिपूर्ण सह अस्तित्व को अपनाने के लिए विश्व राष्ट्र का सम्मान करता आ रहा है।

(7) आधुनिक तकनीकी प्रभाव – हम वैज्ञानिक युग में जी रहे हैं, जहां तकनीकी ज्ञान के निरंतर विकास ने हमारी सोंच और गतिविधियों को प्रभावित कर दिया है। प्रत्येक राष्ट्र अपने आर्थिक विकास के लिए अत्याधुनिक तकनीक अपनाना चाहता है। अर्धविकसित और विकासशील राष्ट्र विश्व के विकसित देशों पर निर्भर होते जा रहे हैं। फलस्वरूप ऑटोमेटिक इलेक्ट्रिक पावर, रेडियो एक्टिव आइसोटोप, कंप्यूटर सॉफ्टवेयर, स्पीकर के आधुनिक उपकरण उपग्रह प्रणाली पर एकाधिकार रखने वाले देश इन जानकारियों को स्थानांतरण व प्रयोग की अनुमति के लिए शर्त रख कर अन्य विकसित और विकासशील देशों की विदेश नीति को प्रभावित कर रहे हैं।

प्रचार और प्रसारण के माध्यम से व्यक्ति और समाज दोनों के चिंतन और राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय संबंध घटनाओं पर जनमत तैयार करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। इनके द्वारा किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति का विश्लेषण राष्ट्रों के मध्य संबंधों को बिगाड़ने और सुधारने का रहता है। आज विदेश नीति के ऊपर इनका प्रभाव बढ़ता जा रहा है।

 

भारतीय विदेश नीति की प्रमुख विशेषताएं या सिद्धांत

1) गुटनिरपेक्षता की नीति : गुटनिरपेक्षता की नीति भारत की विदेश नीति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू एवं केंद्र बिंदु है। इसकी घोषणा स्वतंत्रता से पूर्व ही अंतरिम सरकार के उपाध्यक्ष के रूप में जवाहरलाल नेहरू ने अपने प्रथम रेडियो भाषण के रूप में 7 सितंबर 1946 को ही कर दी थी।
गुटनिरपेक्षता क्या है ? इसका अर्थ है कि भारत वर्तमान विश्व राजनीति के दोनों गुटों में से किसी गुट में भी शामिल नहीं होगा, किंतु गुटों से अलग रहते हुए भी उनसे मैत्री संबंध कायम रखने की चेष्टा करेगा और उनकी बिना शर्त सहायता से अपने विकास में तत्पर रहेगा। इसका उद्देश्य किसी दूसरे गुट का निर्माण करना नहीं वरन् दो विरोधी गुटों के बीच संतुलन का निर्माण करना है। असंलग्नता की यह नीति सैनिक गुटों से अपने आप को दूर रखती है, किंतु पड़ोसी व अन्य राष्ट्रों के बीच अन्य सब प्रकार के सहयोग को प्रोत्साहन देती है। यह गुटनिरपेक्षता नकारात्मक तटस्थता, अप्रगतिशीलता अथवा उपदेशात्मक नीति नहीं है। इसका अर्थ सकारात्मक है अर्थात् जो सही और न्याय संगत है उसकी सहायता और समर्थन करना तथा जो अनीतिपूर्ण एवं अन्याय संगत है उसकी आलोचना एवं निंदा करना। अमेरिकी सीनेट में बोलते हुए नेहरू ने स्पष्ट कहा था कि “यदि स्वतंत्रता का हनन होगा, न्याय की हत्या होगी अथवा कहीं आक्रमण होगा, तो वहां हम न तो आज तटस्थ रह सकते हैं और न भविष्य में तटस्थ रहेंगे।”

गुटनिरपेक्ष नीति अपनाने के कारण:

1. किसी भी गुट में शामिल होकर अकारण ही भारत विश्व में तनाव की स्थिति पैदा करना उपयुक्त नहीं मानता।
2. भारत अपने विचार प्रकट करने की स्वाधीनता को बनाए रखना चाहता है। उसने किसी गुट विशेष को अपना लिया तो उसे गुट के नेताओं का दृष्टिकोण अपनाना पड़ेगा।
3. भारत अपने आर्थिक विकास के कार्यक्रमों को और अपनी योजनाओं की सिद्धि के लिए विदेशी सहायता पर बहुत कुछ निर्भर है। गुटनिरपेक्षता की नीति से सोवियत रूस और अमेरिका दोनों से एक ही साथ सहायता मिल पा रही है।
4. भारत की भौगोलिक स्थिति गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाने को बाध्य करती है। साम्यवादी देशों से हमारी सीमाएं टकराती हैं। अतः पश्चिमी देशों के साथ गुटबंदी करना विवेक सम्मत नहीं। पश्चिमी देशों से विशाल आर्थिक सहायता मिलती है। अतः साम्यवादी गुट में सम्मिलित होना भी बुद्धिमानी नहीं।

2) पंचशील को अपनाना : पंचशील के पांच सिद्धांत का प्रतिपादन भी भारत की शांति का द्योतक है। 1954 के बाद से भारत की नीति को पंचशील के सिद्धांतों ने एक नई दिशा प्रदान की है। पंचशील से अभिप्राय आचरण के पांच सिद्धांत। जिस प्रकार बौद्ध धर्म में यह व्रत एक व्यक्ति के लिए होते हैं, उसी प्रकार आधुनिक पंचशील के सिद्धांतों द्वारा राष्ट्रों के लिए दूसरे के साथ आचरण के संबंध निश्चित किए गए। यह सिद्धांत निम्नलिखित हैं-
1. एक दूसरे की अखंडता और संप्रभुता का सम्मान करना।
2. एक दूसरे पर आक्रमण न करना।
3. एक दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना।
4. परस्पर सहयोग और लाभ को प्रोत्साहित करना।
5. शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की नीति का पालन करना।

3) मैत्री और सह-अस्तित्व की नीति : भारत की विदेश नीति मैत्री और सह-अस्तित्व पर जोर देती है। भारत की धारणा रही है कि विश्व में परस्पर विरोधी विचारधारा में सह-अस्तित्व की भावना पैदा हो। यदि सह-अस्तित्व को स्वीकार नहीं किया जाता तो आणविक शास्त्रों से समूची दुनिया का ही विनाश हो जाएगा। इसी कारण भारत ने अधिक से अधिक देशों के साथ मैत्री संधि और व्यापारिक समझौते किए। इन संधियों में भारत-नेपाल संधि, भारत-इराक मैत्री संधि, भारत-जापान शांति संधि, भारत-मिश्र शांति संधि, भारत रूस मैत्री संधि, भारत-बांग्लादेश मैत्री संधि उल्लेखनीय है।

4) साधनों की पवित्रता की नीति : भारत की नीति अवसरवादी और अनैतिक नहीं रही है। भारत साधनों की पवित्रता में विश्वास करता रहा है। भारत की विदेश नीति महात्मा गांधी के इस मत से बहुत प्रभावित है कि न केवल उद्देश्य बल्कि उसकी प्राप्ति के साधन भी पवित्र होने चाहिए। यद्यपि उनके सत्य और अहिंसा के साधनों को पूरी तरह नहीं अपनाया जा सकता है फिर भी भारत निरंतर इस बात का प्रयत्न करता रहा है कि अंतरराष्ट्रीय विवादों का समाधान शांतिपूर्ण उपायों से किए जाए हिंसात्मक साधनों से नहीं।

5) साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का विरोध : भारत ने उपनिवेशवाद के विरुद्ध अपना संघर्ष अति गंभीर रूप से लिया। भारत ने इसे केवल अपने देश की स्वतंत्रता तक ही सीमित न रख कर संपूर्ण उपनिवेशवादी तत्वों के विरुद्ध तथा सभी अधीन देश के प्रति सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण के रूप में लिया है। इस संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण लड़ाई भारत ने इंडोनेशिया के स्वतंत्रता के रूप में लड़ी। भारत ने संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से ही नहीं, बल्कि नई दिल्ली में 1949 में एशियाई देशों का सम्मेलन बुलाकर इंडोनेशिया की आजादी हेतू व्यापक प्रयास किया। जिसके परिणामस्वरूप अंततः इंडोनेशिया को पूर्ण स्वतंत्र राज्य घोषित कराने में सफलता प्राप्त हुआ।

6) रंगभेद का विरोध : रंगभेद की नीतियों के विरुद्ध भी भारत ने भरसक प्रयत्न किये। दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद की नीतियों का विरोध महात्मा गांधी से लेकर स्वतंत्र भारत में भी बहुत सशक्त रूप से हुआ। भारत ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन एवं अन्य अंतर्राष्ट्रीय मंच के माध्यम से इस नीति को समाप्त करने की बात बहुत ही सशक्त रूप से पेश की। यद्यपि इस रंगभेद के विरुद्ध भारत की लड़ाई में अमेरिका व इंग्लैंड का पूर्ण सहयोग प्राप्त न होने के कारण कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, परंतु फिर भी भारत जनमत को इसके विरुद्ध करने में सफल रहा। भारत के निरंतर प्रयासों के कारण सुरक्षा परिषद ने दक्षिण अफ्रीका की सरकार के विरुद्ध अनेक प्रतिबंधों की घोषणा की। इस प्रकार भारत की सक्रिय भूमिका के साथ-साथ अन्य एशियाई और अफ्रीकी देशों के समर्थन से जिंबाब्वे, नामीबिया आदि की स्वतंत्रता के साथ-साथ दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद रहित सरकार की स्थापना हुई।

7) निःशस्त्रीकरण का समर्थन : भारत ने सदैव विश्व में सामान्य एवं व्यापक निःशस्त्रीकरण हेतु प्रयास किए हैं। इस संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र एवं उसके बाहर भी सभी मंचों पर निःशस्त्रीकरण की प्रबल वकालत करने वाले राष्ट्रों में हमेशा भारत का अग्रणी स्थान रहा है। भारत ने सदैव संयुक्त राष्ट्र द्वारा पारित प्रस्ताव का समर्थन किया है तथा अपने ज्ञापनों एवं संशोधनों के माध्यम से इस प्रक्रिया को सुदृढ़ बनाया है। इस दिशा में नेहरू सबसे पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने परमाणु शस्त्रों से मुक्त विश्व स्थापित करने हेतु 2 अप्रैल 1954 में संयुक्त राष्ट्र में स्टैंडस्टील रिजोल्यूशन प्रस्तुत किया था। परंतु जब 1959 तक भारत के बार-बार दोहराने के बाद भी कोई कार्यवाही नहीं हुई तब भारत की पहल पर 1961 में महासभा ने निःशस्त्रीकरण समिति के रूप में एक स्थायी समिति की स्थापना पर सहमति व्यक्त की। इन प्रयासों के फलस्वरूप 1963 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा आंशिक परमाणु प्रतिबंध संधि पर सहमति हुई। इसे पांच परमाणु शक्तियों एवं भारत सहित कई अन्य राज्यों ने स्वीकृति प्रदान की।

8) संयुक्त राष्ट्र संघ में आस्था : भारत संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना करने वाला एक संस्थापक सदस्य है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ के विभिन्न अंगों और विशेष अभिकरणों में सक्रिय रूप से भाग लेकर महत्वपूर्ण कार्य किया है। भारत ने कभी भी अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन नहीं किया और संयुक्त राष्ट्र संघ के आदेशों का यथोचित सम्मान किया है। कोरिया और हिंद चीन में शांति स्थापित करने के लिए भारत ने राष्ट्र संघ की सहायता की। भारत ने संयुक्त राष्ट्र के अनुरोध पर कांगो में शांति स्थापना हेतु अपनी सेनाएं भेजी, जिन्होंने उस देश की एकता को सुरक्षित किया। संयुक्त राष्ट्र संघ का समर्थन करने में भारत ने जितना सहयोग किया है, उतना दुनिया के बहुत कम देशों ने किया है। आज भी संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का अटूट विश्वास है और उसकी यह नीति है कि दुनिया के अंतरराष्ट्रीय विवादों को सुलझाने में विश्व संस्था का अधिकाधिक प्रयोग किया जाये।

बुधवार, 20 दिसंबर 2023

भीतरगांव का 1500 साल पुराना ईंटों का मंदिर : एक चमत्कार



कानपुर शहर से हमीरपुर की ओर 30 किलोमीटर दूर, एक हलचल भरे शहर के बीच में, संकरी गलियों से घिरे पक्के घरों के समूह में, भीतरगाँव का मंदिर है। गेट पर एक बिलबोर्ड में उल्लेख है: 'गुप्त-युग मंदिर'। एएसआई अधीक्षण पुरातत्वविद्, लखनऊ सर्कल द्वारा मंदिर में लगाई गई एक पट्टिका में उल्लेख है कि मंदिर 5वीं शताब्दी का है और इसमें कुछ वास्तुशिल्प विशेषताओं का विवरण है।

गूगल मैप के जमाने में आज भी इसकी लोकेशन पता करना मुश्किल है। जैसे ही कोई इतिहास के पन्ने पलटता है, पता चलता है कि हमेशा से यही स्थिति थी। यह मंदिर हमेशा से ही साधकों के लिए एक आकर्षण रहा है। स्थानीय निवासियों को प्राचीन संरचना के शैक्षिक महत्व के बारे में कोई जानकारी नहीं है, न ही कोई रुचि है क्योंकि मंदिर में कोई देवता नहीं है।

बड़े पैमाने पर पुनर्निर्मित, बाहरी दीवार पर कुछ टेराकोटा आकृतियाँ, एक बंद गर्भगृह और एक शिखर वाला यह ईंटो का मंदिर, जो 175 साल पहले ढह गया था। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि यहां बहुत हि कम प्रवासी आते हैं। एएसआई द्वारा यहां तैनात एक बुजुर्ग केयरटेकर के पास करने के लिए ज्यादा कुछ नहीं है। वह लॉन में एक बेंच पर प्रवासी रजिस्टर के साथ बैठता है जिसमें व्यस्त दिन में भी एक दर्जन से अधिक नाम नहीं देखे जाते हैं।

लेकिन यह सब एक अप्रशिक्षित आंख के लिए है। जानकार लोगों के लिए, यह एक ऐसी संरचना है जो समय के थपेड़ों को झेलती हुई, महमूद के लालच, या सिकंदर लोदी की कट्टरता और औरंगजेब के आतंक के "मूर्ति-भंजन काल" से बची रही या कहे बच गई।

एक कठिन यात्रा और ईस मंदिर की खोज

1875 में, ब्रिटिश भारत में काम करने वाले और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को रिपोर्ट करने वाले एक अर्मेनियाई-भारतीय इंजीनियर, पुरातत्वविद् और फोटोग्राफर जोसेफ डेविड बेगलर ने भीतरगांव का दौरा किया और एक मंदिर पाया जिसके बारे में स्थानीय लोगों का मानना ​​था कि यह प्राचीन था। यह मंदिर जीर्ण-शीर्ण हो चुका था और इसके तत्काल संरक्षण की आवश्यकता थी। बेगलर, जो एएसआई के संस्थापक अलेक्जेंडर कनिंघम के सहायक थे, कलकत्ता वापस गए और कनिंघम को अपनी तस्वीरें दिखाईं, कनिंघम को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ की ऐसा चमत्कार जैसा मंदिर अस्तित्व में है क्योंग कि कनिंघम के पुराने मित्र और प्रसिद्ध भारतीय विद्वान, भाषाविद् और इतिहासकार राजा शिवप्रसाद ने भी उन्हें उसी मंदिर के बारे में पहले लिखा था, जिसमें उल्लेख किया गया था कि इसमें "उत्कृष्ट प्रकार की मूर्तिकला टेराकोटा है"।

कनिंघम उस समय 64 वर्ष के थे, अपने व्यस्त कार्यक्रम और उन दिनों लंबी दूरी की कठिन यात्रा व्यवस्था के बावजूद उन्होंने कठिन यात्रा की - कलकत्ता से कानपुर तक नाव में यात्रा की और फिर इस गांव तक पहुंचने के लिए एक घोड़ा गाड़ी ली। लेकिन उनके अपने शब्दों में, वर्ष 1877 का वो नवंबर महिना था और कनिंघम जिसे पूरे भारत में ईंटों से बना सबसे पुराना मंदिर मानते थे उस चमत्कार समान मंदिर के ठीक सामने खडे थे। उसके बाद कनिंघमने फरवरी 1878 में फिर से इस संरचना का प्रवास किया।

पुरात्त्विय और स्थापत्य अजुबा 

कनिंघम ने निष्कर्ष निकाला कि गुप्त वास्तुकला की विशिष्ट विशेषताओं वाला यह मंदिर 7वीं या 8वीं शताब्दी के बाद का या उससे भी पुराना है। उन्होंने लिखा, "भीतरगांव देवल (उस समय स्थानीय रूप से मंदिर को संदर्भित किया जाता था) एक प्राचीन ईंटो के मंदिर का एकमात्र नमूना है और ऐसा प्रतीत होता है कि निर्माण की यह शैली कई शताब्दियों तक बड़े पैमाने पर प्रचलित रही होगी..." उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि भीतरगांव मंदिर प्राचीन शहर फूलपुर का हिस्सा रहा होगा। उस समय स्थानीय लोगों को मंदिर में किसी प्रार्थना के आयोजन की कोई स्मृति नहीं थी। हालाँकि वे देवल को "प्राचीन" कहते थे और उन्होंने अपने पूर्वजों से सुना था कि इसके गुंबद पर "1857 के विद्रोह से 2-4 साल पहले" बिजली गिरी थी। इसकी बाहरी दीवार पर बनी टेराकोटा आकृतियों से उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि यह एक विष्णु मंदिर था।

जिन्होंने 1901 से 1914 तक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के साथ काम किया ऐसे एक डच संस्कृतविद् और पुरालेखविद् जीन फिलिप वोगेलने 1907 में मंदिर का सर्वेक्षण किया और इसे कनिंघम के अनुमान से कम से कम तीन शताब्दी पहले का निर्माण बताया। उन्होंने लिखा, भीतरगांव के मंदिर की सजावट कसिया के निर्वाण मंदिर की सजावट के समान है, जो गुप्त काल के बाद की नहीं हो सकती। इसकी वास्तुकला, भित्तिस्तंभों और अन्य विशेषताओं के आधार पर जेसी हार्ले और पर्सी ब्राउन दोनों ने मंदिर को 450-460 ईस्वी के आसपास स्थापित किया था।



हार्ले ने लिखा, "देवगढ़ में दावात्रा मंदिर, जिसकी अधिरचना काफी हद तक अनुमानित है, और कानपुर के पास भितरगांव मंदिर, असंख्य ईंट मंदिरों में  से एकमात्र उप्लब्ध है जो गुप्त काल के दौरान मध्यदेव में बनाया गया होगा, लगभग निश्चित रूप से ऊंचे घुमावदार इखारे थे ।” उनके अनुसार, बडी बडी ईंटें - मूल ईंटें अभी भी पुनर्निर्मित मंदिर के आंतरिक कक्ष में रखी हुई हैं, वर्तमान पीढ़ी के लिए कुछ भी देखने के लिए बहुत बड़ी हैं - "इस मंदिर की गुप्त तिथि स्थापित करेगी और 450 ई.पू. नवीनतम प्रतीत होता है”। मोटे तौर पर यह जिसने नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना की थी उस कुमारगुप्त प्रथम (415-455 ई.) का शासनकाल होगा।

जब से कनिंघम द्वारा इस प्राचीन इंटों के मंदिर की खोज की गई, तब से इसने दुनिया भर के विद्वानों को यह मंदिर आकर्षित करता रहा है। ब्रिटिश पुरातत्वविद् और कला इतिहासकार अल्बर्ट हेनरी लॉन्गहर्स्ट ने 1909 में इस मंदिर का दौरा किया और उसने इस मंदिर को बहुत हि जीर्ण-शीर्ण पाया। कनिंघम की रिपोर्ट के ब्रिटिश अकादमिक हलकों में काफी खलबली  मचने के बाद, PWD ने 1884-85 में मंदिर का संरक्षण शुरू किया परंतु धन की कमी के कारण रुक गया।

1909 के बाद संरक्षण के दूसरे दौर का प्रयास किया गया। तब से, जैसे कि बाहरी दीवार पर टेराकोटा की आकृतियों को बहाल करने के लिए कई प्रयास किए गए हैं ऐसे ही प्रयास  किये गये परंतु अब वो दिवार तुटने के कगार पर हैं। चूंकि मंदिर में कम से कम 170 वर्षों में कोई प्रार्थना नहीं हुई है, इसलिए मंदिर के अधिपति देवता के बारे में संभ्रम में है।

इतिहासकार मोहम्मद जहीरने अपनी 1980 की किताब ''द टेम्पल ऑफ भीतरगांव''का मंदिर एक विष्णु मंदिर है ऐसे कनिंघम के इस दावे से असहमत होने के लिए प्रतीकात्मक साक्ष्य के विश्लेषण पर भरोसा किया है कि । इतिहासकार मोहम्मद जहीरने कहा कि चूंकि दक्षिण में भद्रा में गणेशजी  मौजूद हैं इसलिए यह मंदिर शिवमंदिर भी हो सकता है। 

"मंदिर के टेराकोटा पैनलों में कई शैव प्रसंग भी पाए जाते हैं। गणेश दक्षिण में भद्र क्षेत्र में एक प्रमुख स्थान पर विराजमान हैं। शिवजी गजासुर-संहार-मूर्ति के रूप में एक पैनल में दिखाई देते हैं। हालांकि इस पैनल की विशेषताएं बहुत अधिक लुप्त हो गई हैं, उन्होंने लिखा, ''पैनल पर हाथी को पकड़े हुए उनके फैले हुए हाथ बहुत स्पष्ट हैं। एक अन्य पैनल में, शिव को पार्वती के साथ बैठे दिखाया गया है, जो शायद पासे का खेल खेल रहे हैं।''

ज़हीर ने मंदिर से संबंधित कुल 143 टेराकोटा पैनलों की गिनती की: 128 पैनल यथास्थान पर है, 2 भारतीय संग्रहालय कोलकाता में, 12 पैनल राज्य संग्रहालय लखनऊ में, और कनिंघम द्वारा खींचे गए फोटोग्राफ में दिखनेवाली एक पैनल का अब तक पता नहीं चल पाया है।



ईंटों से बना हुआ चमत्कार

मंदिर कैसा रहा होगा, इसके बारे में एकरूपता नहीं है हालाँकि अटकलें प्रचुर मात्रा में हैं। भीतरगांव देवल से लगभग 500 फीट की दूरी पर, कनिंघम ने ईंटों और टूटी हुई आकृतियों से ढके खंडहरों का एक पुराना टीला खोजा था, जिसे स्थानीय लोग 'झिझी नाग का मंदिर' कहते थे। उन्होंने उन्हें देवल जितना ही प्राचीन पाया और दावा किया कि भीतरगांव का मंदिर एक बड़े मंदिर परिसर का हिस्सा हो सकता है जो एक समय पर उन्नत रहा होगा।

2023 में, जब ज़हीरने इस स्थान का दौरा किया, तो स्थानीय निवासियों को 'झिझी नाग' के बारे में कुछ भी पता नहीं था और किसी भी खंडहर का कोई निशान नहीं मिला। कनिघम ने जो दावा किया था कि भीतरगांव से 5 किलोमीटर दूर बेहटा के मंदिर के खंभे है वहां से खंभे हटा दिए गए थे। 

उत्तम मंदिर कला के उदाहरण इस मंदिर में मिलते है यहाँ एक पैनल में भगवान श्रीकृष्ण को वृषभासुर का वध करते हुए दिखाया गया है और दूसरे में भगवान श्रीकृष्ण राक्षस हाथी कुवलयापीड को वश में कर रहे हैं ऐसा दिखाई देता है। एक अन्य पैनल में, उन्हें अपने बड़े भाई बलराम के साथ बैठे हुए दिखाया गया है, बलराम को उनके सिर के ऊपर एक सर्प के फण के साथ दिखाया गया है। यहां देवी गंगा, यमुना, पार्वती की आकृतियां हैं जो शिव के साथ बैठकर पासे का खेल खेल रही है ऐसा लगता है और एक अन्य आकृति में माता दुर्गा राक्षसों का वध कर रही हो ऐसा दिखता है।

इंटो से बना एक मात्र बचा हुआ स्थापत्य

एक प्रश्न जिसने इतिहासकारों को सदैव परेशान किया है कि यह मंदिर, समय की मार, स्थानीय लोगों से लूटपाट और मध्ययुगीन युग के घूमने वाले लुटेरों और डेढ़ सहस्राब्दी से अधिक समय तक विधर्मी आक्रमणकारियों के हमले, इतनी सारी बाधाओं से कैसे बच गया ? 

कनिंघम ने कहा, "यह अजीब लगता है कि भीतरगांव मंदिर अपनी असंख्य टेराकोटा मूर्तियों के साथ इस्लामिक  मूर्तिभंजको से कैसे बच गया।" उनके पास एक दिलचस्प सिद्धांत था. उनका मानना ​​था कि मंदिर हमेशा अपने सुदूर स्थान के कारण बचा हुआ है। 

कनिंघम ने 1880 में लिखा, "पेड़ों के घने झुरमुटों के बीच बना और अरिंद नदी की घुमावदार धाराओं से संरक्षित, मंदिर इस तरह से छिपा हुआ है कि मैं अपनी दूसरी यात्रा में जब तक गांव के एक मील के भीतर नहीं गया तब तक इसका वर्णन करने में विफल रहा"।

आक्रंताओ के मूर्ति-भंजन काल के दौरान, जब कानपुर अज्ञात था, और लखनऊ एक देहाती शहर था, सड़क की मुख्य लाइनें भीतरगांव से कई मील की दूरी तक सभी तरफ से गुजरती थीं शायद इस मंदिर का बचना केवल इसकी यह भाग्यशाली स्थिति के कारण हो सकता है' उन्होंने लिखा।

कनिंघम ने निष्कर्ष निकाला, "अगर यह थानेसर या मथुरा जैसा तीर्थ स्थान होता, तो यह महमूद के लोभ या सिकंदर लोदी की कट्टरता से बच नहीं पाता।" उनका मानना ​​था कि मंदिर "विशेष प्रसिद्धि वाले किसी निजी व्यक्ति" का हो सकता है और इसका विवरण आसपास के बड़े शहरों में लोगों के लिए अज्ञात था परिणामस्वरूप, यह आक्रमणकारियों की नज़रों से बच गया। 

इतिहासकारों का यह भी मानना ​​है कि यह मंदिर किसी "विशेषरुप से प्रसिद्ध व्यक्ति" का हो सकता है और इसका विवरण आसपास के बड़े शहरों में लोगों के लिए अज्ञात था।

शुक्रवार, 25 अगस्त 2023

भारत का मिशन सुर्य : आदित्य L-1

 

चंद्र के बाद अब इसरो सूरज के लिए मिशन जल्द ही शुरू हो सकता है इसरो चिफ श्री एस. सोमनथन ने चंद्रयान-3 की सफलता के बाद कहा की ईसरो कई प्रोजेक्ट्स पर कार्य कर रहा है आनेवाले तीन महिनों में ईसरो गगनयान और आदित्य L1 समेत कई महत्वपुर्ण मिशन लोंच करने जा रहा है इसरो के इस सोलर मिशन का नाम आदित्य L1 होगा यह भारत का पहला अंतरिक्ष अभियान होगा जो सूर्य के अध्ययन के लिए भेजा जाएगा। इसके लिए सारी तैयारीयां पुरी की जा चुकी है। इसरो 2 सितम्बर को सूर्य के वातावरण की अभ्यास करने के लिए सतिश धवन स्पेस सेंटर से पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल यानी LMV M3 रॉकेट पर अपना Aditya L1 लॉन्च करने जा रहा है आदित्य L1 का एसेम्बलिंग किया जा चुका है और Aditya L1 रोकेट से जोडने का कार्य पुर्ण गति से चल रहा है 

क्या है L1 का अर्थ?

सेटेलाइट इस एल1 कक्षा के आगे नहीं जा सकता है, क्योंकि अगर इसे पार किया तो सूयॅ की गरमी से जल जायेगा इसलिए इसी बिंदु पर रहकर ADITYA-L1 सुर्य का अभ्यास, अध्ययन करेगा L1 एक ऐसी कक्षा है, जो सूरज और पृथ्वी के बीच की ऐसी दूरी होती है, जहां दोनों का गुरुत्वाकर्षण शून्य रहता है. अर्थात यहाँ न तो सूरज की ग्रैविटी उसे अपनी तरफ खींच सकती है, न तो पृथ्वी की... L1 को लैंग्रेजियन प्वाइंट कहा जाता है ऐसे पांच प्वाइंट हैं, लेकिन L1 एक ऐसी जगह है जहां से सुर्य का सरलता से अध्ययन, संशोधन किया जा सकता है जहां दोनों ग्रहों की ग्रैविटी खत्म हो जाती है. इस प्वाइंट की पृथ्वी से कुल दूरी करीब 15 लाख (1.5 मिलियन) किमी है लॉन्च किए जाने के पूरे चार महीने बाद सूरज-पृथ्वी के सिस्टम में लैगरेंज पॉइंट-1 तक पहुंचेगा अंतरिक्ष में इसी स्थान से अमेरिका की अंतरिक्ष संस्था नासा और युरोपीयन अंतरिक्ष संस्था का सोहो उपग्रह वर्ष1996 से सुर्य का अभ्यास कर रहा है, भारत का आदित्य L1 सुर्य के बारे में विषेश जानकरी प्राप्त करेगा इस खास बिंदु लैग्रेंज प्वाइंट 1 (L1) की विशेषता यह है कि यहां वेधशाला के संचालन के लिए ज्यादा ऊर्जा की आवश्यकता नहीं होगी इसीलिए इस मिशन को आदित्य L-1 नाम दिया गया है आदित्य L-1 मिशन की सफलता के पश्चात इसरो उन स्पेस एजेंसी के समूह में शामिल हो जाएगा जिन्होंने सूर्य के लिए एक खास यान प्रक्षेपित किया है 

आदित्य L1 में कौन कौन से उपकरण होंगे? 

आदित्य L1 को कुल मिलाकर 7 पेलोड (उपकरणों) के साथ लॉन्च किया जाना है यह सात पेलोड में शामिल है: सौर पराबैंगनी इमेजिंग टेलीस्कोप (SUIT), सोलर लो एनर्जी एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर (SoLEXS), आदित्य सोलर विंड पार्टिकल एक्सपेरिमेंट (ASPEX), हाई एनर्जी L1 ऑर्बिटिंग एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर (HEL1OS), आदित्य के लिये प्लाज़्मा विश्लेषक पैकेज (PAPA), उन्नत त्रि-अक्षीय उच्च रिज़ॉल्यूशन डिजिटल मैग्नेटोमीटर। यह सातों उपकरण विविध रुप से सुर्य का अभ्यास करेंगेआदित्य L1 5 वर्ष तक सुर्य का अभ्यास करेगा।आदित्य L1 सूर्य के कोरोनल मास इजेक्शन का अभ्यास करेगा



आदित्य L1 सुर्य का क्या अभ्यास करेगा?

जैसे उपर बताया आदित्य-L1 में कुल मिलाकर अलग-अलग सात पेलोड होंगे इसमें हाई डेफिनेशन कैमरे भी लगे होंगे आदित्य L-1 में लगे कुल सात पेलोद में से चार पेलोड सुर्य की रिमोट सेंसिंग करेंगे और बाकी के तीन इन पेलोद -सीटू ऑब्जर्वेशन का कार्य करनेवाले है आदित्य-L1 से सूर्य के फोटोस्फेयर, क्रोमोस्फेयर और सबसे बाहरी परत 'कोरोना' पर नजर रखी जाएगी। इसके लिए इलेक्ट्रोमैग्नेटिक, पार्टिकल और मैग्नेटिक फील्ड डिटेक्टरों का इस्तेमाल किया जाएगा। इनमें से चार पेलोड्स सीधे सूरज पर नजरें रखेंगे। बाकी तीन आसपास के क्षेत्र में मौजूद पार्टिकल और अन्य चीजों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियां जुटाकर देंगे। इसरो को उम्मीद है कि आदित्य एल 1 पर लगे पेलोड्स की मदद से कोरोनल हीटिंग, कोरोनल मास इजेक्शन, सौर धधक से पहले और बाद की गतिविधियों, उनकी विशेषताओं, अंतरिक्ष के मौसम की गतिशीलता आदि के बारे में काफी महत्वपूर्ण वैज्ञानिक जानकारियां प्राप्त की जा सकेंगी।

https://devenzvoice.blogspot.com/2023/08/isro.html 

अब तक किस किस देशों के कितने मिशन सुर्य के संशोधन के लिए हुए है? 

सुर्य के विशिष्ट संशोधन के लिए अब तक अमेरिका, जर्मनी, जापान, चीन और युरोपीय देशों के द्वारा अकेले अथवा संयुक्त रुप से 25 मिशन भेजे जा चुके है। इन 25 मिशनों में से सात मिशन आज भी सक्रीय रुप से कार्य कर रहे है। सुर्य के संशोधन के लिए सब से ज्यादा मिशन अब तक अमेरिकाने भेजे है जबकि जापान और चीनने एक एक मिशन भेजा है और युरोपीय युनियन और जर्मनीने अमेरिका की अंतरिक्ष संस्था नासा के साथ मिलकर संयुक्त रुप से मिशन भेजे है। वर्तमान में नासा और युरोपीय स्पेस एजंसी का सोहो मिशन L-1 बिंदु से ही सुर्य का संशोधन कर रहा है, भारत का आदित्य L-1 मिशन भी इसी बिंदु से सुर्य का अभ्यास करनेवाला है।  

 

विज्ञान के उद्देश्य:

आदित्य-एल1 मिशन के प्रमुख विज्ञान उद्देश्य हैं:

  • सौर ऊपरी वायुमंडलीय (क्रोमोस्फीयर और कोरोना) गतिकी का अध्ययन।
  • क्रोमोस्फेरिक और कोरोनल तापन, आंशिक रूप से आयनित प्लाज्मा की भौतिकी, कोरोनल मास
  • इजेक्शन की शुरुआत, और फ्लेयर्स का अध्ययन
  • सूर्य से कण की गतिशीलता के अध्ययन के लिए डेटा प्रदान करने वाले यथावस्थित कण और प्लाज्मा
  • वातावरण का प्रेक्षण
  • सौर कोरोना की भौतिकी और इसका ताप तंत्र।
  • कोरोनल और कोरोनल लूप प्लाज्मा का निदान: तापमान, वेग और घनत्व।
  • सी.एम.ई. का विकास, गतिशीलता और उत्पत्ति।
  • उन प्रक्रियाओं के क्रम की पहचान करें जो कई परतों (क्रोमोस्फीयर, बेस और विस्तारित कोरोना) में होती हैं जो अंततः सौर विस्फोट की घटनाओं की ओर ले जाती हैं।
  • कोरोना में चुंबकीय क्षेत्र टोपोलॉजी और चुंबकीय क्षेत्र माप।
  • हवा की उत्पत्ति, संरचना और गतिशीलता।

 


रविवार, 20 अगस्त 2023

आदित्य L1 के बाद गगनयान ISRO की अंतरिक्ष में बडी छलांग

 


अंतरिक्ष में अपने पहले मानव मिशन गगनयान को लॉन् करने की दिशा में 20 जुलाई को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) को एक बहुत बड़ी सफलता मिली थी गगनयान मिशन के सर्विस मॉड्यूल प्रोपल्शन सिस्टम (SMPS) का 20 जुलाई को सफलतापूर्वक परीक्षण किया गया सर्विस मॉड्यूल प्रोपल्शन सिस्टम गगनयान ऑर्बिटल मॉड्यूल की आवश्यकताओं को पूरा करता है हॉट टेस्ट के अंतिम कॉन्फिग्रेशन का आयोजन इसरो के तमिलनाडु में महेंद्रगिरी स्थित प्रोपल्शन कॉम्प्लेक् में किया गया था गगनयान मिशन को अगले वर्ष लॉन् किया जाना है, जिसे लेकर इसरो के वैज्ञानिकों और कर्मचारीओं में अत्यांतिक उत्तेजना और रोमांच है और सभी इस मिशन की तैयारी पूरी कर रहे है 

गगनयान मिशन के लिए केंद्र सरकारने इसरो को 10 हजार करोड़ की राशि दे चुकी है. गगनयान भारत का अंतरिक्ष में पहला मानव मिशन है। इस मिशन की गंभीरता ध्यान में रखते हुए इसरो काफी सावधानी बरत रहा है और सभी परिक्षण बारीकी से कर रहा है। मिशन गगनयान मानव को अंतरिक्ष में भेजने का ISRO का महत्वाकांक्षी आयोजन है, इस मिशन के अंतर्गत अंतरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी से करीब 400 किलोमीटर ऊपर स्पेस में भेजा जायेगा. इस संबंध में भारतीय वायुसेना की मदद भी ली जा रही है। वायुसेना से अंतरिक्ष यात्री चुनने के लिए कहा गया है।

गगनयान इसरो के तीन अंतरिक्ष मिशन का एक ग्रुप है। गगनयान इसरो द्वारा बनाया गया एक स्पेसक्राफ्ट है. इसमें दो अभियान मानव रहित होंगे जबकि तीसरे में मानव को अंतरिक्ष में भेजा जाना है. बताया जा रहा है कि इस मिशन में तीन अंतरिक्ष यात्री को अंतरिक्ष में भेजे जाएंगे, जिसमें एक महिला रोबोट समेत दो पुरुष और एक महिला होंगी. इसरो की योजना पृथ्वी की सबसे करीबी कक्षा (लोअर ऑर्बिट) में मानव यान भेजने की है। गगनयान 5-7 दिनों के लिए पृथ्वी के ऊपर 300-400 किमी की ऊंचाई पर एक लो अर्थ ऑर्बिट में पृथ्वी का चक्कर लगाएगा और वापस लौटेगा। भारत का गगनयान मिशन सफल रहा तो अमेरिका, रूस और चीन जैसे चुनिन्दा देशों की क्लब में भारत भी शामिल हो जाएगा।

इस अंतरिक्ष मिशन की घोषणा पहली बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2018 में राष्ट्र के नाम अपने स्वतंत्रता दिवस के संबोधन में की थी। मानवयुक्त मिशन से पहले, इसरो ने गगनयान मिशन के हिस्से के रूप में अंतरिक्ष में दो मानव रहित मिशन भेजने की भी योजना बनाई है। पहला मानव रहित मिशन दिसंबर 2020 में भेजा जाना था और दूसरा मिशन जून 2021 के लिए निर्धारित किया गया था। हालांकि, कोरोना वायरस महामारी के कारण इसरो के काम और संचालन में व्यवधान के कारण पहले मानवरहित मिशन में देरी हुई है। अब इस मिशन के साल 2023-2024 में लॉन्च किया जाएगा। इंडिया के इस स्पेस कार्यक्रम की कुल लागत 10000 करोड़ रुपये से कम होने की उम्मीद है।

गगनयान कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य मानव को भारतीय प्रक्षेपण यान पर पृथ्वी की निचली कक्षा में भेजने और उन्हें सुरक्षित रूप से पृथ्वी पर वापस लाने की क्षमता को प्रदर्शित करना है। गगनयान प्रोजेक्ट में 3 सदस्यों के चालक दल को 400 किमी की कक्षा में 3 दिनों के मिशन के लिए लॉन्च करके और सुरक्षित रूप से पृथ्वी पर वापस लाने के उन्हें भारतीय समुद्री जल में उतारकर, भारत द्वारा मानव अंतरिक्ष उड़ान क्षमता के प्रदर्शन की परिकल्पना की गई है। भारतीय इसरो जिस अंतरिक्ष यान को विकसित कर रहा है उसमें रूस अंतरिक्ष यात्रियों के प्रशिक्षण में हमारी मदद कर रहा है। एचएसएफसी मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम के तहत गगनयान की पहली विकास उड़ान को लागू करने के लिए मौजूदा इसरो केंद्रों का समर्थन लेगा। अंतरिक्ष यात्रियों के बैठने वाली जगह क्रू मॉड्यूल का निर्माण पूरा हो चुका है। गगनयान के पहले चालक दल के मिशन (क्रू मिशन) को मूल रूप से दिसंबर 2021 में इसरो के LVM3 पर लॉन्च करने की योजना थी, लेकिन इसमें 2024 से पहले लॉकडाउन के कारण देरी हुई है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) अपने पहले मानव अंतरिक्ष यान (गगनयान) की तैयारी में लगा हुआ है।

गगनयान कार्यक्रम का उद्देश्य मानव को भारतीय लॉन्च वाहन पर पृथ्वी की निचली कक्षा (LEO) में भेजने और उन्हें सुरक्षित रूप से पृथ्वी पर वापस लाने की क्षमता प्रदर्शित करना है। COVID प्रतिबंधों के कारण भारत के गगनयान कार्यक्रम में थोड़ी देरी हुई, लेकिन अब 2023-24 तक मिशन को हासिल करने की तैयारी जोरों पर है।

गगनयान परियोजना के तहत 3 सदस्यों के चालक दल को 400 किमी की कक्षा (ऑर्बिट) में 3 दिनों के मिशन के लिए लॉन्च करके और मिशन पूरा होने के बाद उन्हें भारतीय समुद्री जल में सुरक्षित और सफल लैंडिंग करवाना है। अतः इस गगनयान कार्यक्रम का उद्देश्य भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को मिशन पूरा होने पर सुरक्षित रूप से पृथ्वी पर वापस लाकर इसरो द्वारा भारत की मानव अंतरिक्ष उड़ान क्षमता के प्रदर्शन को साबित करना है।


महंगाई के अनमोल फायदे: ज़रा दूसरा पहलू भी देखिए!

आजकल जहां देखो वहां एक ही राग सुनाई देता है—“महंगाई बढ़ गई, महंगाई ने जीना मुश्किल कर दिया!” लेकिन क्या आपने कभी सिक्के का दूसरा पहलू देखने ...