शनिवार, 29 सितंबर 2018

सबरीमाला मंदिर फैसला - प्रतिक्रियाओं की मीमांसा

कल माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक जजमेंट में 800 वर्ष से चली आ रही सबरीमाला मंदिर की परंपरा को असंवैधानिक करार दिया जिसकी प्रतिक्रियाएं काफी मिली-जुली आ रही थी परंतु सायं काल के पश्चात अचानक ही प्रतिक्रियाओं की धार नुकुली होने लगी और कुछ लोगों ने तो इस जजमेंट को हीन्दु धर्म के लिए ख़तरे की घंटी के समान बताया।
कल रात से काफी प्रतिक्रियाओं की धार और कहीं कहीं धार्मिक ग्रंथों का प्रमाण देकर विरोध करने वाले को देख कर मन में प्रश्न उठा,
  • क्या सनातन धर्म की जड़ें इतनी कमजोर है कि कीसी एक या कुछ और परंपराओं को बंद करने से धर्म खतरे में आ जाएगा ?
इतिहास साक्षी है कि सनातन धर्म की जड़ें इतनी गहरी और मजबूत है कि इसे मिटाना तो दूर की बात है इसे हिलाना भी असंभव है। और तो और सनातन धर्म ने अपने आप ही अनेकों प्रकार की परंपरा को ध्वस्त किया है, यहां जगद्गुरू श्रीकृष्ण को याद करना अनिवार्य है, बाल कृष्ण ने जब इन्द्र पूजा की परंपरा को तोड़कर गोवर्धन पूजा का आव्हान किया था और वृंदावन के सभी ने उस आव्हान का स्वीकार कर इन्द्र पूजा की परंपरा को त्याग दिया था। धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में भी एक ओर परंपरा को भगवान श्री कृष्ण ने ध्वस्त कर दिया था। सत्य बोलना यह एक परंपरा एवं सनातन धर्म का प्राण है, कदाचित इसीलिए धर्मं चर से पहले सत्यं वद कहा गया है परंतु धमक्षेत्र कुरुक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण सत्यवादी युधिष्ठिर से “अश्वत्थामा हत:, नरो वा कुंजरो” जैसे अर्द्धसत्य का उच्चारण करवाते हैं। चलिए धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र न जाएं और पीछले वर्षों के प्रति द्रष्टी करें तो एक ओर परंपरा को सकारात्मक दिशा में बदलते हुए देखा होगा आपने, श्रावण माह में कईं शिव मंदिरों के व्यवस्थापकों और पूजारीओं ने ही शिवलिंग पर अभिषेक के लिए चढ़ाएं जानेवाले दूध को इकट्ठा कर गरीब बच्चों को बांटने की शुरुआत की है। इतना दूर नहीं जाना है तो पंद्रह दिन पहले ही जातें हैं, सार्वजनिक गणेशोत्सव में POP की मूर्तियों का चलन कम हुआ है तथा मिट्टी की मूर्तियों की प्रतिष्ठा का प्रमाण बढ़ा है, और ईस वर्ष नदियों में विसर्जन भी नहीं कीया गया, काफी लोग ऐसे भी देखने को मिले जिन्होंने अपने घर आये भगवान गणपति बाप्पा की मिट्टी की मूर्ति का विसर्जन अपने घर पर ही किया और उस मिट्टी का इस्तेमाल पौंधा लगाकर कीया।
यहां चिंता की बात यह नहीं है कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को सनातन धर्म के लिए ख़तरे की घंटी कहा जा रहा है परन्तु चिंता उस विषय की है कि विशाल, परिवर्तनशील, इश्वरप्रिय सनातन धर्म को संकुचित, कट्टर सोचवाले धर्म की श्रेणी में ले जाने वाली सोच की है, जो कि सनातन धर्म का संपूर्णत: गलत और विपरीत चित्र खड़ा करती है।
साथ ही साथ यह बात भी इतनी ही सत्य है कि सनातन धर्म की आस्थाओं, परंपराओं, मान्यताओं और धार्मिक भावनाओं के उपर आघात करने की कोशिशें और कोशिशें करने वालों की संख्या में वृद्धि हुई है। खासकर सोश्यल मिडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, मनोरंजन, फिल्में, एडवरटाइजमेंट, किताबें जैसे हथियारों का खुबी पूर्वक इस्तेमाल किया जा रहा है, और इस माध्यमों से योजनापूर्वक युवा पीढ़ी को निशाना बनाया जा रहा है और यह षड्यंत्र जिस किसी के ध्यान में आया है सभी ने यथायोग्य, पर्याप्त, प्रमाणभूत जानकारी के साथ ज़वाब देकर ईसे नाकाम करने में पुरी ताकत लगा दी है। कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने केवल सनातन धर्म पर कीए जाने वाले आघातों को ज़वाब देने हेतु ही धर्म ग्रंथों का अध्ययन करने लगे हैं जो कि एक अच्छा बदलाव है।
जहां तक सबरीमाला मंदिर में सभी आयु की महिलाओं के प्रवेश के फैसले के विरोध करने का प्रश्न है हमें यह ध्यान होना चाहिए कि हमारे देश की महिलाएं माता गार्गी, माता मैत्रेयी, माता सीता, माता अहल्या, माता कौशल्या जैसी विदुषी नारी ओं प्रतिकृति है और अपनी बुद्धि से परंपराओं को आगे बढ़ाना अच्छी तरह से जानती है उन्हें कम न आंका जाएं। वैसे भी सामान्य महिला ओं में से भी 95% से 98% महिलाएं मासिक धर्म के दौरान मंदिर में प्रवेश करती ही नहीं है, सार्वजनिक मंदिर ही नहीं बल्कि अपने घर के मंदिर में भी प्रवेश नहीं करती है और बाकी 2% से 5% महिलाएं मंदिर में जाती ही नहीं है परंतु अगर फिर भी कीसी अनिवार्य कारणों से जाना पड़ता है तो यह महिलाएं भी इस बात का ध्यान रखती ही है, अगर फिर भी विश्वास नहीं आता तो कृपया एक बार शनि शिंगणापुर जरूर जाना चाहिए क्यों कि उस मंदिर में भी महिलाओं का प्रवेश निषेध था परंपरा एवं धार्मिक मान्यता के अनुसार, कुछ समय पहले ऐसे ही एक फैसले से न्यायालय ने उस परंपरा को खत्म कर दिया था परन्तु सुना है कि आज भी भारत की बुद्धिमान महिलाओं ने परंपरा को बनाए रखा है ।
अंत में इतना जरूर लगता है कि सनातन धर्म की जड़ें इतनी गहरी और मजबूत है कि इसे मिटाना असंभव है। अपने आप पर विश्वास बनाए रखने की आवश्यकता है, अपनी माताओं एवं बहनों पर श्रद्धा और विश्वास बनाए रखने की आवश्यकता है।

शुक्रवार, 28 सितंबर 2018

सबरीमाला मंदिर - सर्वोच्च न्यायालय का फैसला, संविधान सर्वोपरि है

पीछले तीन दिन से माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने जो फैसले दिए हैं वह यह साबित कर दिया है कि देश संविधान से चलने वाला है ।
दो दिन पहले माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने आधार को अपना आधार दिया, फिर नमाज के लिए मस्जिद अनिवार्य नहीं है, और आज केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 वर्ष से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश निषेध को समानता के आधार पर खारिज कर दिया।
आज माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने केरल के सुप्रसिद्ध, पवित्र सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश निषेध के विरुद्ध ऐतिहासिक फैसला देते हुए कहा कि लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता और सभी उम्र की महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश करने के निर्देश दिए हैं।
केरल स्थित विश्व प्रसिद्ध एवं पवित्र भगवान अय्यप्पा सबरीमाला मंदिर में करीब 800 वर्षों से परंपरा है जिसके तहत मंदिर में 10 वर्ष से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं का मंदिर में प्रवेश निषेध माना जाता है। यह मंदिर केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम से 175 किलोमीटर दूर, पथानामथीट्टा जिले में पूर्व ओर सबरी हिल्स नाम से विख्यात 18 पहाड़ीयों के बीच में स्थित है। मंदिर जैसे 18 पहाड़ीयों के बीच है उसी तरह मंदिर के आंगन तक पहुंचने के लिए 18 सीढ़ीयां पार करनी पड़ती है। मंदिर का उल्लेख कंब रामायण, महाभारत के आंठवे स्कंध और स्कंद पुराण के असूर कांड में आता है । ऐसा माना जाता है कि स्कंद पुराण में जिस शिशु शास्ता का जो उल्लेख है सबरीमाला मंदिर स्थित भगवान अय्यप्पा उन्हीं के अवतार हैं। एक मान्यता ऐसी भी हैं कि स्वयं भगवान परशुराम जी ने अय्यपन की पूजा के लिए सबरीमाला मंदिर में मूर्ति स्थापित की थी, एक मान्यता के अनुसार इस मंदिर का संबंध माता शबरी से भी बताया जाता है, कइ मान्यता में से एक मान्यता के अनुसार भगवान अय्यपन प्रभु विष्णु एवं शिव की संतान हैं, कदाचित इसीलिए भगवान अय्यपन हरिहर नाम से भी जाना जाता है, साथ ही मकरसंक्रांति के दिन कतामाला पर्वत के ऊपर एक दिव्य ज्योतिपूंज प्रकट हुआ था तब से यह स्थान सबरीमाला मंदिर के रूप में प्रगट हुआ। मंदिर में भगवान अय्यपन के साथ साथ गणेश जी, मलिकापूरत अम्मा और नागराज जैसे उप देवताओं की मूर्तियों को भी स्थापित किया गया है और उनकी पूजा होती है।
इस मंदिर में प्रमुख रूप से दो उत्सव मनाये जातें हैं । एक मकरसंक्रांति और दुसरा उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र के संयोग के दिन, पांचवीं तिथि और वृश्चिक लग्न के संयोग के समय ही भगवान अय्यपन का जन्मदिन मनाया जाता है। यह मंदिर सभी मंदिरों की तरह पुरे वर्ष खुला नहीं रहता परन्तु मलयालम पंचांग के अनुसार प्रत्येक महीने के पहले पांच दिन ही खुला रहता है और विशेष पूजा एवं उत्सव पर खुलता है।
सबरीमाला मंदिर में मंडला पूजा का महत्व बहुत है। यह मंडला पूजा पूरे 41 दिन चलती है जिसमें सबसे पहले गणेशजी का आव्हान किया जाता है। इस पूजा के दौरान भजन कीर्तन एवं दक्षिण भारत के सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। मंडला पूजा में शामिल होने वाले भक्त भगवान अय्यपन को अधिक प्रिय तुलसी माला एवं रुद्राक्ष की माला धारण करते हैं।
सबरीमाला मंदिर अपनी एक परंपरा के कारण आजकल चर्चा में आया है। यह परंपरा भगवान अय्यपन ब्रह्मचारी थे इसलिए इस मंदिर में 10 वर्ष से अधिक और 50 वर्ष की आयु वाली महिलाओं का मंदिर प्रवेश वर्जित हैं, हालांकि 10 वर्ष से कम और 50 वर्ष से अधिक आयु वाली महिलाओं को मंदिर प्रवेश के लिए कीसी भी प्रकार के प्रतिबंध नहीं है।
“द इंडियन यंग लोयर्स एसोसिएशन” ने इस परंपरा को न्यायालय में चुनौती देती याचिका दाखिल की थी। इस याचिका में केरल सरकार, द त्रावणकोर देवस्यम बोर्ड, सबरीमाला मंदिर के पूजारी और डीएम को 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति देने की मांग की थी। पीछले वर्ष 7 नवंबर 2016 में केरल सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को सूचित किया था कि वह सबरीमाला मंदिर में सभी आयु की महिलाओं के मंदिर प्रवेश के पक्ष में हैं।
पिछले वर्ष 13 अक्टूबर को सर्वोच्च न्यायालय की तीन जजों की पीठ ने अनुच्छेद-14 में दिए गए समानता के अधिकार, अनुच्छेद-15 में धर्म और जाति के आधार पर भेदभाव रोकने, अनुच्छेद-17 में छुआछूत को समाप्त करने जैसे सवालों सहित चार मुद्दों पर पूरे मामले की सुनवाई पांच जजों की संविधान पीठ को सुपुर्द किया था।
आज सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ ने सबरीमाला मंदिर में खास आयु वाली महिलाओं के प्रवेश निषेध को गैरकानूनी घोषित कर दिया। अब सबरीमाला मंदिर में सभी आयु वाली महिलाओं को मंदिर प्रवेश मिलेगा ।

गुरुवार, 27 सितंबर 2018

आधार - माननीय सर्वोच्च न्यायालय का फैसला

कल माननीय सर्वोच्च न्यायालय की पांच न्यायाधीशों की संविधानिक बैंच ने आधार से जुडती सभी असमंजसों को दूर करते हुए एक ऐतिहासिक जजमेंट दिया।
इस केस की पृष्ठभूमि देखें तो माननीय सर्वोच्च न्यायालय में आधार कार्ड की संवैधानिकता को चुनौती देती हुई 31 याचिका ओं को लेकर कुल मिलाकर 38 दिनों तक सुनवाई चली । न्यायालय में आधार कार्ड की संवैधानिकता मान्यता को चुनौती दी गई थी, याचिका दायर करने वालों में एक उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश श्री के. एस. पट्टास्वामी भी शामिल थे।
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अपने जजमेंट से सभी भारतीयों के लिए 12 अंकों के आधार नंबर को संवैधानिक मान्यता बरकरार रखने के साथ-साथ अपने फैसले में आधार उपर के प्रत्येक हमले को संविधान के विरुद्ध बताया है।
आधार कार्ड 12 अंकों का बायोमेट्रिक कार्ड है जिसमें प्रत्येक कार्ड धारक का फोटोग्राफ, दोनों हाथों की दसों उंगलियों के निशान (फिंगर प्रिंट) और दोनों आंखों की रैटिना की निशानी है। इस तरह से भारत का आधार कार्ड विश्व के देशों के ऐसे ही अन्य पहचान पत्रों के मुकाबले काफी अलग और अनूठा है। आइये विश्व के दूसरे देशों में ऐसे पहचान पत्रों के बारे में जानते हैं। विश्व में सबसे स्वीकृत पहचान पत्र के रूप में ड्राइविंग लाइसेंस सबसे आगे हैं। विश्व में सबसे पहले फ्रांस ने 1804 में अपने नागरिकों को पहचान पत्र दिए थे, इससे पहले फ्रांस में ही नेपोलियन के समय में पहचान पत्र दिए गए थे परन्तु उसका उद्देश्य केवल कामगारों की हरकतों पर नजर रखना ही था। दुसरे विश्व युद्ध की शुरुआत में 1938 में इंग्लैंड और जर्मनी ने अपने नागरिकों के लिए पहचान पत्र आवश्यक कर दिए थे। जर्मनी का उद्देश्य यहुदियों की पहचान कर उनको अलग-थलग करना था।
अंतरराष्ट्रीय निजता संगठन (Privacy International) के 1996 के रिपोर्ट के मुताबिक विश्व में करीब 100 राष्ट्रों में पहचान पत्र को आवश्यक यानी कंपल्सरी माना गया है, वहीं कुछ ऐसे भी देश है जहां कोई राष्ट्रीय पहचान पत्र नहीं है और कुछ देशों में एक से अधिक पहचान पत्रों को मान्यता मिली हुई है।
भारत में सर्व प्रथम नैशनल आइडेंटिटी कार्ड जैसा कार्ड होना चाहिए ऐसा विचार सर्व प्रथम 2009-10 में तत्कालीन सरकार ने रख्खा, मंत्रीओं के एक ग्रुप ने ऐसा विचार किया कि देश के प्रत्येक नागरिक के पास एक नैशनल आइडेंटिटी कार्ड होना चाहिए। इस योजना को कार्यान्वित करने हेतु 28 जनवरी 2009 में तत्कालीन योजना आयोग ने एक नोटिफिकेशन जारी किया, 2010 में नैशनल आइडेंटिफिकेशन ओथोरीटी ओफ इंडिया (UIDAI) बिल लोकसभा में लाया गया जिसे 2016 में वर्तमान सरकार ने पास किया। विश्व प्रसिद्ध इन्फोसिस कंपनी के श्री नंदन नीलेकणी इसके प्रथम अध्यक्ष बने। 2011 तक देश के करीब 10 करोड़ लोगों ने अपना आधार कार्ड बनवा लिया था, तभी दिसंबर में UIDAI बिल पर स्टैन्डींग कमीटी ने “नागरिकों की नीजी और संवेदनशील जानकारी ओं की सुरक्षा कैसे होगी ?” एसा कहकर आधार के लिए एकत्रित की गई जानकारियों की सुरक्षा पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया, और 2013 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि कुछ सरकारी विभागों ने आधार कार्ड को आवश्यक करने का सरक्युलर जारी किया है परन्तु यह निश्चित किया जाए कि जिन्होंने आधार कार्ड अब तक बनवाया हो उनको नुकसान न पहुंचे। 15अक्तुबर 2015 में न्यायालय ने कहा आधार कार्ड स्वैच्छिक है और जब तक न्यायालय अंतिम आदेश नहीं देता तब तक आधार कार्ड को अनिवार्य नहीं बना सकते।
3 मार्च 2016 में वर्तमान श्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने आधार बिल लोकसभा के पटल पर रखा बाद में इस बिल को फीनान्शियल बिल के तौर पर पास किया गया। 25 मार्च 2016 में राष्ट्रप्रमुख ने इस बिल को मंजूरी दे दी, और 10 मइ 2016 में ही कोंग्रेस के नेता जयराम रमेश आधार बिल को फीनान्शियल बिल के तौर पर पारित कराने के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में गये और याचिका दाखिल की। इस से पहले 30 नवंबर 2013 में कर्णाटक उच्च न्यायालय के निवृत्त न्यायाधीश श्री के. एस. पट्टास्वामी भी आधार के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय पहुंचे थे अपनी पीआईएल को लेकर जिसमें उन्होंने आधार कार्ड के लिए लिए जाने वाले बायोमेट्रिक डेटा को नागरिकों की निजता के अधिकार का भंग होने की दलील दी थी।
आधार कार्ड के विषय पर फैसला देने से पहले माननीय सर्वोच्च न्यायालय के सामने कुछ प्रश्न ऐसे थे ।
– संसद में मनी बिल के तौर पर पारित किया गया आधार एक्ट संविधानिक रुप से उचित है ?
– क्या आधार नागरिकों की निजता के अधिकार का भंग करता है ?
– सरकारी सेवाओं का लाभ उठाने के लिए आधार एक मात्र सबूत कैसे हो सकता है ?
– अगर सरकार आधार के डेटा का उपयोग सामुहिक जासूसी के लिए करें तो क्या ?
दिनांक 26 सितंबर को हुई सुनवाई में कुछ बातें सामने आई। आधार के विरुद्ध अर्जी करने वालों ने क्या कहा और उनके सामने सरकार की ओर से क्या जवाब दिया गया।
अर्जी कर्ता ओं की कुछ दलीलें
  • UIDAI का डेटा एकत्रित कर रही एजेंसियों के साथ कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है, जो संदेहास्पद है ।
  • किसी का आधार डिएक्टिवेट करना नागरिक को मारने के जैसा है।
  • संविधान राज्य को अधिकार नहीं देता किन्तु राज्य के अधिकारियों की सीमाएं तय करता है।
  • बायोमेट्रिक और व्यक्तिगत जानकारियां आज के डिजिटल विश्व में एक बार बाहर चलीं गईं तो उसे वापस नहीं लिया जा सकता।
सरकार की ओर से दलीलें और स्पष्टताएं
  • आधार एक्ट ऐसा है जो कीसी की भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का कम से कम भंग करता है
  • आधार के डेटा को एक ही जगह सेंट्रलाइज्ड तरीके से स्टोर किया जाता है। उसके लिए 2048 के एन्क्रीप्शन का इस्तेमाल किया गया है।
  • कोई भी और किसी का भी अधिकार निरंकुश नहीं है हितों की रक्षा के लिए अधिकारों पर रोक लगाई जा सकती है।
  • बैंक फ्रोड, मनी लोंन्डरींग, आर्थिक धोखाधड़ी की पहचान के लिए बायोमेट्रिक पहचान ज़रुरी है।
माननीय सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश श्री दिपक मिश्रा के नेतृत्व में बनी पांचन्यायाधिशों की बैंचने अपने जजमेंट से सभी बातों को साफ़ और स्पष्ट कर दिया है।
इस केस के जजमेंट के तीन सैट आयें। पहले सेट में जस्टीस दिपक मिश्रा, जस्टीस ए.के. सिकरी और जस्टीस ए.एम. खानविलकर ने अपने जजमेंट में पान कार्ड और आइटी रिटर्न को आधार से जोड़ने के सरकार के निर्णय को उचित ठहराया और बैंक खातों एवं मोबाइल नंबर के साथ जोड़ने को रद्द कर दिया। जजों ने कहा आधार एक्ट की धारा 57 गैरसंवैधानिक है, नीजी, प्राईवेट कंपनीयां आधार की जानकारी नहीं मांग सकती। आधार एक्ट की धारा 33(2) को गैरसंवैधानिक करार देते हुए कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा हेतु कीसीभी नागरिक की पहचान एवं ओथेन्टीकेशन सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। आधार एक्ट की धारा 47 को रद्द कर दिया, विशेष रूप से कहा समाज के पिछड़े वर्ग के लोगों का सशक्तिकरण हो रहा है उनको अधिकारों से वंचित नहीं कर सकते। आधार का उपयोग कर के प्रोफाईलींग नहीं किया जा सकता। UIDAI के द्वारा आधार के डेटा की सुरक्षा के पुख्ता प्रबंध किए गए हैं।
जजमेंट के दुसरे सेट में न्यायमूर्ति अशोकभूषण ने कहा कि आधार नंबर को मोबाइल नंबर के साथ जोड़ने की कोई आवश्यकता नहीं है, सरकार की कल्याणकारी योजनाओं और सब्सीडी के लाभ के लिए आधार एक्ट की धारा 7 को बनाए रखने के लिए सरकार के पास प्रर्याप्त सबूत है।‌ आधार एक्ट जासूसी के लिए ढांचा तैयार नहीं करता है।
जजमेंट के तीसरे सेट में न्यायमूर्ति डी.वाय. चंद्रचूड़ ने अपना जजमेंट रखा। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा कि संपूर्ण आधार एक्ट असंवैधानिक है, और भारत सरकार की सभी योजनाओं के लिए आधार अनिवार्य करने पर भारत में जीना मुश्किल हो जाएगा। आधार एक्ट को मनी बिल के तौर पर पारित करना संविधान के साथ छल है। आधार अंतर्गत जानकारियों के आधार पर जासूसी करना संभव है।
इस जजमेंट की खास बातें जहां आधार अनिवार्य नहीं है
  • बैंक में खाता खोलने के लिए एवं बैकींग सेवाओं के लिए आधार अब अनिवार्य नहीं है
  • मोबाइल नंबर को आधार से लिंक कराना अनिवार्य नहीं है
  • NEET, UGC, CBSE जैसी परीक्षाओं में आधार अनिवार्य नहीं किया जाएगा।
  • मोबाइल कंपनियां, मोबाइल वोलेट कंपनीयां एवं अन्य नीजी, प्राईवेट कंपनीयां आधार नंबर नहीं मांग सकती।
ईस जजमेंट के जहां आधार अनिवार्य अब आधार अनिवार्य होगा
  • PAN के साथ आधार नंबर के साथ जोड़ना अनिवार्य होगा।
  • PAN आवंटन एवं आइटी रिटर्न भरने के लिए आधार नंबर अनिवार्य होगा।
  • सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ उठाने के लिए एवं सब्सीडी पाने के लिए आधार अनिवार्य होगा।
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक जजमेंट में आधार एक्ट की धारा 33(2), 47, और 57 को रद्द कर दिया है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए डेटा साझा करने वाली धारा 33 (2), आधार एक्ट के उल्लंघन के मामले में न्यायिक अधिकार क्षेत्रो को नियंत्रित करने वाली धारा 47 एवं नीजी, प्राईवेट कंपनीयां और व्यक्तिओं को आधार के डेटा साझा करने की अनुमति देने वाली धारा 57 को रद्द कर दिया है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले से अब राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर कीसी भी नागरिक की जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा सकेगी, और नीजी प्राईवेट कंपनीयां भी अब आधार के डेटा का उपयोग नहीं कर पाएंगी।
आज भारत की वर्तमान आबादी के करीब 90% लोगों के पास आधार कार्ड है, देश में हाल में 123 करोड़ लोगों ने अपना आधार कार्ड बनवा लिया है। जीस में करीब 4.4% की आयु 0 से 5 वर्ष है, 23.6% लोगों की उम्र 5 वर्ष से 18 वर्ष तक की है और करीब 72% आधार कार्ड धारक की आयु 18 वर्ष या उससे अधिक है । 
It is better to be 'Unique" than best

मंगलवार, 25 सितंबर 2018

आयुष्मान भारत योजना : कुछ विशेष

23 सितंबर 2018 को रांची में जिस का उद्घाटन भारत के प्रधानमंत्री ने कीया और जो योजना आज से यानी 25 सितंबर 2018 से कुल 10.74 करोड़ लोगों को मिलनी शुरू हो जाएगी वह योजना जिसे विश्व की सबसे बड़ी आरोग्य बीमा योजना बताया गया है ऐसी आयुष्मान भारत योजना क्या है ? और कीसके लिए है ? यह जानकारी होना आवश्यक है, वैसे हमने ईस लेखांक के प्रथम खंड में भारत की वर्तमान स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता, स्थिति की समीक्षा की थी । https://devenzvoice.blogspot.com/2018/09/blog-post_24.html?m=1
आज आयुष्मान भारत योजना को विस्तृत रूप से समजने एवं जानने का प्रयास करते हैं।
आयुष्मान भारत योजना में भारत के कुल 36 राज्य- केन्द्र शासित प्रदेशों में से 29 राज्य – केन्द्र शासित प्रदेश शामिल हो चुके है। ओडिशा ने यह कहकर योजना में शामिल होने से मना कर दिया है कि राज्य में राज्य सरकार द्वारा चलाई जा रही बीजु स्वास्थ्य कल्याण योजना अधिक बेहतर है जबकि दिल्ली के मुख्यमंत्री ने आयुष्मान भारत योजना का नाम मुख्यमंत्री आम आदमी बीमा योजना – आयुष्मान भारत रखने की मांग कर इस योजना में शामिल होने से मना कर दिया है तो कुछ राज्यों ने आने वाले विधानसभा चुनावों के कारण इस योजना में शामिल नहीं होने की बात कही है। दिल्ली, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, केरल और पंजाब जैसे राज्यों ने केन्द्र सरकार के साथ इस योजना से जुड़ने के लिए मेमोरेंडम ओफ अन्डरस्टेन्डींग (MoU) कीया नहीं है यह राज्य सरकारें ऐसी ही अपनी खुद की योजना चाहतें हैं या उनके वहां ऐसी ही कोई योजना चल रही है।
आयुष्मान भारत योजना में लाभार्थियों की सूची को SECC 2011 के आधार पर तय किया है । SECC 2011 के आंकड़ों के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में से D1, D2, D3, D4, D5 और D7 कैटेगरी के नागरिकों को इस योजना में शामिल किया जाएगा वहीं शहरी क्षेत्रों में से कूड़ा उठाने वाले, प्लंबर, कंस्ट्रक्शन साइट पर काम करने वाले, मोची, सडक पर काम करने वाले लोग, मजदूर, सिक्योरिटी गार्ड, वेल्डर, कुली और भार ढोने वाले, फेरी वाले जैसे 11 पूर्व निर्धारित पेशे/कार्य करनेवाले लोग शामिल हो सकते हैं। आंकड़ों की मानें तो करीब 10.74 करोड़ परिवार इसके हकदार होंगे जिसमें से ग्रामीण क्षेत्रों में से 8.03 करोड़ एवं शहरी क्षेत्रों में से 2.33 करोड़ परिवारों की पहचान गरीबों एवं वंचितों के तौर पर की जा चुकी है।
विश्व की सबसे बड़ी आरोग्य बीमा योजना बताया गया है ऐसी इस योजना में पैसा कहां से आयेगा यह सबसे अहम प्रश्न है । इस योजना के लिए केन्द्र सरकार एवं राज्य सरकार दोनों साथ मिलकर आर्थिक खर्च का वहन करेंगे जीस में केन्द्र का हिस्सा 60% रहेगा और राज्य 40% खर्च अपने कंधे पर उठायेंगे। एक अनुमान के मुताबिक प्रति परिवार प्रीमीयम का खर्च ₹1000 से ₹1200 आ सकता हैं । मौजूदा वित्त वर्ष में इस योजना के तहत केन्द्र को करीब ₹3500 करोड़ का बोज आयेगा, केन्द्र ने अपने 2018-19 के बजेट में इस योजना के लिए टोकन के तौर पर ₹2000 करोड़ रुपए का आवंटन पहले ही किया हुआ है।
आयुष्मान भारत योजना के लाभार्थियों को सरकारी एवं नीजी, प्राईवेट अस्पतालों में इलाज उपलब्ध होगा। इस योजना में अब तक करीब 10000 अस्पतालों को चुनागया है, तकरीबन 15500 अस्पतालों के द्वारा इस योजना में जुड़ने के लिए आवेदन किया गया है जिसमें से आधे अस्पताल प्राइवेट है। जिन 10000 अस्पतालों को चुना गया है उनमें सरकारी एवं प्राईवेट अस्पतालें भी शामिल हैं ।
इस योजना में कुल 1354 बिमारियों की सूची बनाई गई है जीसका इलाज कराने के लिए अधिकतम ₹5,00,000 तक की राशि का भुगतान इस योजना के तहत चुकाने की बात है। इन 1354 बिमारियों में दांतों की सर्जरी, कैन्सर की सर्जरी एवं किमोथेरेपी, रेडिएशन थेरेपी, ह्रदय की बायपास सर्जरी, आंखों की सर्जरी, रीढ की सर्जरी, एमआरआई, सीटी स्कैन, न्युरो सर्जरी जैसे इलाज को शामिल किया गया है ।
इस योजना में शुरुआत में 10.74 करोड़ परिवारों के करीब 50 करोड़ को लाभान्वित किया जाएगा जिनकी पहचान गरीबों एवं वंचितों के तहत की जा चुकी है। इन परिवारों को पैनल में शामिल सरकारी एवं प्राईवेट अस्पतालों में प्रतिवर्ष ₹5,00,000 तक का इलाज करवा सकते हैं जो कि संपूर्णत: कैशलैस होगा। आयुष्मान भारत योजना की शुरुआत से ही देश के करीब 10,000 सरकारी एवं प्राईवेट अस्पतालों में 2.65 लाख बैड की सुविधा उपलब्ध करवाई गई है।
आयुष्मान भारत योजना का लाभ उठाने के लिए आधार कार्ड अनिवार्य नहीं किया गया है। अगर कोई भी व्यक्ति इस योजना के लिए पात्र है तो उसे अपनी पहचान स्थापित करनी होंगी जिसके लिए आधार कार्ड, चुनाव पहचान पत्र, राशन कार्ड जैसे पहचान पत्रों की आवश्यकता रहती है।
आयुष्मान भारत योजना के लाभार्थी को इस योजना में शामिल सरकारी या निजी अस्पताल में भर्ती होने के लिए कीसी भी प्रकार का शूल्क नहीं देना होगा । अस्पताल में भर्ती होने से लेकर संपूर्ण इलाज तक का भुगतान अधिकतम ₹5,00,00 तक इस योजना में कवर कीया जाएगा। अस्पताल में भर्ती होने से पहले और बाद के इलाज के खर्च भी कवर कीया जाएगा। इस योजना में शामिल सभी अस्पताल पर एक हैल्प डेस्क होगा, यह हैल्प डेस्क जो दर्दी के दस्तावेज चेक करने, योजना में नामांकन के लिए एवं वेरिफिकेशन में मदद करेगा। हैल्प डेस्क पर आयुष्मान मित्र तैनात किए जाएंगे जो दर्दी को इस योजना के लाभ दिलाने में मदद करेंगे।
कोई भी व्यक्ति इस योजना के लिए बनी अंतिम सूची में अपनी पात्रता खुद ही पता कर सकता है इसके लिए आयुष्मान भारत योजना का संचालन जिस सरकारी एजेंसी को दिया गया है वो नैशनल हेल्थ एजेंसी ने एक वेबसाइट https://mera.pmjay.gov.in/search/loginऔर एक नि:शूल्क हैल्पलाईन नंबर 14555 जारी किया है।

सोमवार, 24 सितंबर 2018

भारत की वर्तमान स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति और आयुष्यमान भारत योजना

कल प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने रांची से एक महात्वाकांक्षी एवं विश्व की सबसे बड़ी आरोग्य बीमा योजना की शुरुआत की आयुष्यमान भारत जो पंडित दीनदयाल उपाध्यायजी की जयंती 25 सितंबर से समग्र राष्ट्र में उपलब्ध हो जाएगी।
ईस योजना की कई विशेषताएं हैं जीसे जानना आवश्यक है और साथ साथ यह भी जानकारी आवश्यक है कि राष्ट्र को ऐसी योजना की आवश्यकता है कि नहीं।
पिछले काफी समय से यह देखा गया है कि देश की आबादी का बड़ा हिस्सा ऐसा है जो कुछ गंभीर बिमारियों का इलाज करवाने के लिए आर्थिक रूप से सक्षम नहीं है । नैशनल सेंपल सर्वे ओर्गेनाईजेशन (NSSO) के हालही में आये आंकड़ों के अनुसार देश के ग्रामीण क्षेत्रों में करीब 85.9% परिवारों और शहरी क्षेत्रों में करीब 82 प्रतिशत परिवारों की पहुंच हेल्थकेयर इन्श्योरेंस तक की नहीं है । देश कुल आबादी की 17% आबादी अपनी कमाई का लगभग 10% हिस्सा केवल अपने और अपने परिवार के सदस्यों की बिमारियों के इलाज के पीछे खर्च करती है । इतना ही नहीं बल्कि हाल ही में ब्रिटीश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित हुए अध्ययन में एक बहुत ही गंभीर बात सामने आई है, ईस अध्ययन के अनुसार भारत के 5.5 करोड़ लोग केवल इसलिए गरीबी रेखा के नीचे आ गये क्योंकी उन्हें अपने या अपने परिवार के सदस्यों की बिमारियों के इलाज के पीछे काफी खर्च करना पडा, इनमें से 3.8 करोड़ लोग केवल दवाओं के खर्च के कारण ही गरीब हो गए हैं ।
यह तो हुई देश के ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की स्थिति इसके सामने अगर हम आरोग्य सेवाओं की उपलब्धता देखें तो चित्र ओर भी चिंतित करनेवाला दिखाई देता है ।
समग्र राष्ट्र में प्रतिवर्ष जितने डॉक्टर्स अपनी पढ़ाई संपूर्ण करने बाद बहार आते हैं उनमें से केवल 5500 डॉक्टर्स‌‌‌ ही सरकारी स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत होते हैं । आज भारत में करीब 14 लाख डॉक्टर्स की कमी है । नैशनल हेल्थ प्रोफाइल के आंकड़ों के अनुसार देश में प्रत्येक 10000 लोगों के सामने एक सरकारी डॉक्टर उपलब्ध है जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन WHO के मानक के अनुसार प्रत्येक 1000 लोगों की आबादी में एक डॉक्टर उपलब्ध होना चाहिए। वर्ष 2016 में श्री प्रणव मुखर्जी ने कहा था कि देश में करीब 24 लाख पैरामेडिकल स्टाफ की कमी है । यह आंकड़े सच में ईस बात की पुष्टि करते हैं कि देश में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने की कोशिश जरुर करनी चाहिए, परंतु यक्षप्रश्न यह आता है कि सरकारी स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत डॉक्टर एवं पैरामेडिकल स्टाफ की कमी को तुरंत भरना अतिदुष्कर कार्य था, डॉक्टर सरकारी स्वास्थ्य विभाग में नहीं जुड़ना चाहते हैं और अपनी नीजी अस्पताल चलाना ज्यादा पसंद करते हैं। यही हाल पैरामेडिकल स्टाफ का भी है।
समग्र राष्ट्र में सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों की क़रीब 35000 के आसपास है और सभी जगह जैसे आगे कहा ऐसे ही या डॉक्टर या पैरामेडिकल स्टाफ की कमी है। इन सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों एवं अस्पताल एक साथ करीब 13 लाख दर्दीओं को दाखिला देकर इलाज करने की क्षमता रखते हैं । यहां चिंता की बात साफ़ दिख रही है कि 130 करोड़ की आबादी वाले देश में एक साथ केवल 13 लाख दर्दीओं को ही दाखिला देकर इलाज करने की क्षमता है जीसे बढ़ाने की आवश्यकता है। यह आंकड़े सरकारी स्वास्थ्य विभाग की क्षमता दिखाते हैं वहां ग्रामीण क्षेत्रों में करीब 60% से 65% लोगों को मजबुर होकर नीजी अस्पताल में इलाज करवाने जाना पड़ता है और शहेरों की 70% से 75% आबादी अपना इलाज करवाने नीजी अस्पतालों में जाती है, और सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के मुकाबले नीजी अस्पतालों में इलाज करवाना आर्थिक रूप से काफी महेंगी होती है।
यह आंकड़े सरकारी बनाम नीजी अस्पतालों एवं स्वास्थ्य सेवाओं के हैं आईए अब सरकार के द्वारा आवंटित राशि का भी अवलोकन कर ही लेते हैं । 2015-16 में स्वास्थ्य राज्यमंत्री अनुप्रिया पटेल ने राज्य सभा में आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट की चर्चा में लिखित उत्तर देते हुए कहा कि केन्द्र सरकार और राज्य सरकार मिलकर हैल्थकेयर के लिए GDP के 1.3% खर्च करते हैं। राज्य स्वास्थ्य मंत्री अनुप्रिया पटेल उन्होंने आगे बताया कि वर्ल्ड हैल्थ स्टेटीस्टीक्स 2015 के अनुसार प्रति कैपिटा हैल्थ केयर के पीछे भारत सरकार का खर्च 60 अमरीकी डॉलर था वहीं अमेरिका 4153 अमरीकी डॉलर खर्च करता था। अर्थात भारत विश्व के दूसरे देशों में होने वाले हैल्थ केयर के लिए खर्च के मुकाबले काफी कम खर्च करता है। 2016 की विश्व स्वास्थ्य संगठन की बेहतरीन हैल्थ केयर सुविधा वाले देशों में भारत क्रमांक 112 पर था और हमारे पड़ोसी देश जैसे बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे देश हमसे आगे थे। विश्व स्वास्थ्य संगठन बेहतर हैल्थ केयर सुविधा की सूची
भारत की स्वास्थ्य सेवाओं का हाल जानने के बाद ऐसा जरूर लगता है कि यहां कुछ ऐसा करने की आवश्यकता है जीससे ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में गरीबों को उत्कृष्ट स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित हो और उसके लिए नागरिक को अपनी आय का भुगतान न करना पड़े और ऐसा करने से राष्ट्र के गरीब लोगों की आय में वृद्धि होने के कारण उनका जीवन स्तर ऊंचा आ सकेगा । स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता के कारण बढ़ी हुई आय का उपयोग गरीब अपने बच्चों की बेहतर पढ़ाई के लिए कर पाएंगे।
ऐसा ही कुछ विचार के साथ एवं राष्ट्र की स्वास्थ्य सेवाओं को गरीबों की पहुंच में लाने के लिए एक योजना बनाई गई है, जीसका कल प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने उद्घाटन किया और जो श्री दिनदयाल उपाध्याय की जयंती 25 सितंबर से शुरू हो जाएगी।
ईस योजना की विस्तृत जानकारी अगले अंक में प्रकाशित की जाएगी।
धन्यवाद
देवेन्द्र कुमार

शनिवार, 1 सितंबर 2018

સામાજિક ન્યાય

26 જાન્યુઆરી 1950 માં સ્વતંત્ર ભારતનું પોતાનું બનીને સ્વિકાર થયેલું સંવિધાન લાગુ કરવામાં આવ્યું અને સ્વતંત્ર ભારત સંવિધાનિક રીતે પ્રજાસત્તાક બન્યું.
સ્વતંત્ર ભારતના સત્તાધીશો સામે અનેક પડકારો હતાં. અલગ અલગ રજવાડાં ઓને એકછત્ર હેઠળ લાવવા, દેશનાં ભાગલા ને કારણે વિસ્થાપિત થયેલા લાખો લોકો નું પુનર્વસન કરવું, દેશમાં ફાટી નિકળેલી હિંસા ને રોકી સૌહાર્દ, શાંતિ નું વાતાવરણ પુનઃસ્થાપિત કરવું, ત્યાં જ જન્મતાં વેંત દુશ્મન બની બેઠેલા પાકિસ્તાને કરેલા કાશ્મીર ઉપર આક્રમણ સામે ઝઝુમવાનુ આવ્યું હજી આ પડકારોને જવાબ આપતાં આપતાં હાંફી ગયાં ત્યાં જ મહાત્મા ગાંધી ની હત્યા થઈ, આવાં અચાનક આવેલાં પડકારો ની સાથે સાથે રાષ્ટ્ર સમક્ષ કેટલાક સદીઓથી જડતાની હદ સુધી ઘર કરી ગયેલાં પડકારો પણ હતાં જ. એમાં સૌથી મોટો, અગત્યનો અને તાત્કાલિક અસરકારક અને દુરોગામી અસર કરે તેવાં પગલાં માંગી લેતો પડકાર હતો હિન્દુઓમાં જાતિ, જ્ઞાતિ વચ્ચે ફેલાયેલાં ઊંચ નીચ નાં ભેદભાવ, જાતિ, જ્ઞાતિ વચ્ચે ઉચ્ચતા નાં આડંબરી અહંકાર, જાતિ જ્ઞાતિ ને ધ્યાનમાં રાખીને માણસને માણસ ન ગણવા જેવી અમાનવીય પ્રથાઓ, રિવાજો જેવી કે જાતિ/જ્ઞાતિ નાં કારણે કરાતી આભડછેટ, મંદિરમાં પ્રવેશ નિષેધ, ગામડાઓમાં સાર્વજનિક કુવા કે પાણી નાં સ્ત્રોતો થી પાણી ન લેવાં દેવું, દલિત ગણાતિ જાતિ/જ્ઞાતિ ઓને કેટલાક પ્રસંગો જેવાકે લગ્ન માં ઢોલ ન વગાડવા દેવો, બેન્ડ ન વગાડવા દેવું, ફટાકડા ન ફોડવા દેવાં, જુલુસ ન કાઢવા દેવાં, માથે સાફા ન બાંધવા આવાં તો અનેકવિધ અમાનવીય વ્યવહારો ધર્મના ઓઠાં હેઠળ અથવા ધર્મ ની જ નિશ્રામાં સદીઓથી ફુલેલા ફાલેલા હતાં.
વિડંબણા એ હતી કે એમાં એટલાં વિરોધાભાસ હતાં પરંતુ કોઈ તે જોવા પણ તૈયાર નહોતું. ઉદાહરણ તરીકે
  • મંદિરોમાં આરતી વખતે નગારું વગાડવું અનિવાર્ય પરંતુ નગારાં માટે ચામડું બનાવનાર માટે મંદિર પ્રવેશ વર્જિત
  • મંદિરોમાં પૂજા કરવા માટે કેવાં વસ્રો પહેરવાં તે નિર્ધારિત પરંતુ એ વસ્ત્રો બનાવનાર ને માટે મંદિર માં પ્રવેશ નિષેધ હતો
  • મંદિરોમાં ભગવાનની મૂર્તિ માટે વાઘા અનિવાર્ય પરંતુ વાઘા બનાવનારા ને મંદિરમાં પ્રવેશ નહીં
  • મંદિરોમાં ધજા આવશ્યક પરંતુ ધજા બનાવનાર ને મંદિરમાં પ્રવેશ નિષેધ
  • મંદિરોમાં ભગવાનની મૂર્તિ સમક્ષ દિવો પ્રગટાવવો અનિવાર્ય પરંતુ દિવેટ બનાવનાર ને મંદિરમાં પ્રવેશ નહીં
  • મંદિરોમાં આરતી વખતે મંજીરા વગાડવા આવશ્યક પરંતુ મંજીરા પકડવાની દોરી બનાવનાર ને મંદિરમાં પ્રવેશ નિષેધ
  • એંઠા મોઢે મંદિર દર્શન નિષેધ પરંતુ દાતણ આપનારા માટે મંદિર માં જવા ઉપર પ્રતિબંધ
મંદિરોમાં કથિત રીતે દલિત સમાજ નો વ્યક્તિ ન જ જવો જોઈએ એની પુરતી તકેદારી રાખવામાં આવે અને જો દલિત સમાજનો વ્યક્તિ મંદિરમાં ભુલે ચુકે’ય જાય તો મંદિર “અપવિત્ર” ગણાઈ જાય અને પછી એને પાછું “પવિત્ર” કરવાં લાખો રૂપિયા નો ધુમાડો કરવામાં આવે અરે…… હજુ પણ આ એકવીસમી સદીમાં’ય આવી અમાનવીય પ્રથાઓ,વર્તનો, વ્યવહારો ઘણાં ગામડાઓમાં પ્રચલિત છે.
સ્વતંત્ર ભારતના ઈતિહાસમાં કોઈ રાજકીય કે આઘ્યાત્મિક/ ધાર્મિક નેતા એ આવી અમાનવીય પ્રથાઓ સામે અવાજ ઉઠાવ્યો હોય તેવું ઉડીને આંખે વળગે તેવું ઉદાહરણ ધ્યાનમાં આવતું નથી, ખાસ કરીને કથિત ઉચ્ચ જાતિ/જ્ઞાતિ માંથી આવી અમાનવીય પ્રથાઓ, રિવાજો સામે કોઈ અવાજ ન ઉઠ્યો. આધુનિક ભારતના પાયામાં વ્યાપ્ત આ ઊધઈ સામે કોઈ આંદોલન ન થયાં….. જમીનદારી વિરૂદ્ધ આંદોલન થયું…… વૃક્ષો બચાવવા માટે ચિપકો આંદોલન થયું…… કટોકટી લાદનાર સરકાર વિરુદ્ધ આંદોલન થયું…… પરંતુ ક્યારેય આ દેશમાં “આભડછેટ હટાવો, દેશ બચાવો” “જાતિગત ભેદભાવ મિટાવો, દેશ બચાવો” જેવાં આંદોલન જોવાં ન મળ્યાં. કદાચ ક્યાંક એકલ દોકલ પ્રયાસ થયો પરંતુ તેને સર્વવ્યાપી સમર્થન ન જ મળ્યું.
ત્યારે આવી પરિસ્થિતિમાં જ્યાં સમાજ નાં મોટા વર્ગ ને ધર્મના નામે સમાન અધિકારો થી સદીઓથી વંચિત રાખવામાં આવ્યો તે વર્ગને સક્ષમ, સશક્ત બનાવવા અને રાષ્ટ્ર ની મુખ્ય ધારામાં પ્રવાહીત કરવાનો સંવિધાનિક પ્રયાસ કરવામાં આવ્યો, સદીઓથી પિડીત, વંચિત, શોષિત રહેલાં વર્ગને સક્ષમ, સશક્ત અને સ્પર્ધાત્મક બનાવવા માટે ની મથામણ, પ્રયાસ નું સંવિધાનિક સ્વરૂપ એટલે “આરક્ષણ”.
જ્યારે આરક્ષણ સંવિધાનિક બન્યું ત્યારે સત્તાધીશો ની એ જવાબદારી હતી કે સમાજ માં આરક્ષણ મુદ્દે સકારાત્મક વિચારો નો પ્રચાર, પ્રસાર કરે. જરૂરી એ હતું કે કથિત ઉચ્ચ જાતિ/જ્ઞાતિ માં એવાં પ્રચાર અને પ્રસાર ની કે આરક્ષણ એ સદીઓથી આપણાં જ હિન્દુ ભાઈઓ ઉપર ધર્મના નામે જે અન્યાય થયો છે તેની ભરપાઈ અથવા પ્રાયશ્ચિત રૂપે આ વ્યવસ્થા ગોઠવવામાં આવી છે.સંવિધાન નિર્માતાઓ દૂરદર્શી હતાં અને આવનારાં પરિણામો ની કલ્પના પણ સૂપેરે હતી જ એટલે જ એમણે આ વ્યવસ્થા ને ઘણી બધી જગ્યાએ સમયાવધિ માં બાંધી હતી. પરંતુ કોઈ પણ કારણસર તત્કાલીન સત્તાધીશો આમ કરવામાં તદ્દન નિષ્ક્રિય અને નિષ્ફળ રહ્યા અને અંગ્રેજો ની જ ” ભાગલા પાડો અને રાજ કરો” ની નીતિ ને બદલીને “ભાગલા પાડો અને તારાજ કરો” માં પડી ગયાં અને આરક્ષણ રૂપી ઉત્તમ વ્યવસ્થા જેનાથી એકસમાન, સક્ષમ, સશક્ત હિન્દુ એકતા અપેક્ષિત હતી, જેમાં સદીઓથી પોતાના જ ભાઈ ને કરવામાં આવેલાં અન્યાયો નાં પ્રાયશ્ચિત ની ભાવના અભિપ્રેત હતી, જેમાં એક જ કુટુંબના સક્ષમ ભાઈ બીજા ભાઈ ને સક્ષમ બનાવવામાં મદદરૂપ થાય એ ભાવના હતી એને બદલે આરક્ષણ પ્રથાને જ એવી રીતે પ્રચારીત, પ્રસારીત થવા દીધી જાણે આરક્ષણ પ્રથા જ અન્યાયી છે અને કથિત ઉચ્ચ જાતિ/જ્ઞાતિ નાં અધિકાર ઉપર તરાપ મારનારી છે. એનું પરિણામ એ આવ્યું કે કથિત ઉચ્ચ જાતિ/જ્ઞાતિઓમાં જે ભાવના દલિત જાતિ/જ્ઞાતિ ઓ માટે હતી “પોતાના કરતાં નીચા” ગણવાની તે હવે વૈમનસ્ય, ધિક્કાર અને ઘૃણા માં ફેરવાતી ગઈ અને આ માન્યતા એટલી જડ રીતે ઘર કરી ગઇ કે આરક્ષણ માટે આંદોલનો થવા લાગ્યા. પરિસ્થિતિ એ એવો ખતરનાક વળાંક લીધો કે હિન્દુ બે ભાગમાં “આરક્ષણ મેળવતાં” અને “આરક્ષણ ન મેળવતાં” એવાં બે નવાં જ વર્ગમાં વહેંચાઈ ગયો, વિભાજિત થઈ ગયો અને આ ભાગલા ને રાજકીય લોકોએ પ્રોત્સાહન આપ્યું અને જાતિગત વોટબેંકો અસ્તિત્વ માં આવી.
સત્તાધીશો જેમ કથિત સવર્ણ સમાજ ને આરક્ષણ વ્યવસ્થા ને સકારાત્મક રીતે સમજાવવામાં નિષ્ફળ, નિષ્ક્રિય રહ્યા તદ્દન એવું જ દલિત સમાજ સાથે પણ થયું. સદીઓથી અન્યાય સહન કરતાં સમાજ ને સક્ષમ, સશક્ત, સ્પર્ધાત્મક બનાવી રાષ્ટ્ર ની મુખ્ય ધારામાં પ્રવાહીત‌‌‌ કરી શકાય તે માટે ની વ્યવસ્થા ને યથાયોગ્ય સ્વરૂપ ન સમજાવવામાં આવ્યું અને જેનો સહારો લઈને સક્ષમ, સશક્ત બનવાનું હતું તે સાધન ન બનતાં સાધ્ય જ બની ગઈ. આરક્ષણ વ્યવસ્થા નું યોગ્ય સંચાલન કરવામાં સરકાર તદ્દન નિષ્ફળ રહી. ઘણી જગ્યાએ યોગ્ય વ્યક્તિ ને લાભ ન મળ્યો.
આપણાં દેશનું એ સૌથી મોટું દુર્ભાગ્ય જ ગણી શકાય કે કથિત ઉચ્ચ જાતિ/જ્ઞાતિઓને સમજાવી શકે એવાં સરદાર પટેલને અને દલિત સમાજને સમજાવી શકે એવાં ડૉ. બાબાસાહેબ આંબેડકર ને સ્વતંત્રતા મળ્યા નાં થોડોક જ સમય માં દેશ ગુમાવી બેઠો.
આરક્ષણ એ એક નિશ્ચિત સમાજ ઉપર સદીઓ સુધી થયેલાં અન્યાયો, અત્યાચારો ને કારણે એ સમાજ માં આવેલી અક્ષમતા, અસમર્થતા ને દૂર કરીને સક્ષમ, સમર્થ બનાવીને રાષ્ટ્ર ની મુખ્ય ધારામાં લાવવા ની વ્યવસ્થા છે. કોઈને એવું લાગતું હોય કે એ વ્યવસ્થા તેમને અન્યાય કરે છે તો તેમણે ભુતકાળમાં કથિત સવર્ણ સમાજ દ્વારા દલિતો ને કરવામાં આવેલાં અને દુર્ભાગ્યે આજે એકવીસમી સદીમાં’ય થતાં રહેલાં અન્યાયો, અત્યાચારો નજર સમક્ષ લાવજો અને માનવીય હ્રદય થી અનુભવવા ની કોશિશ કરજો તમને આ વ્યવસ્થા ચોક્કસ શ્રેષ્ઠ લાગશે જ અને એ સમજવું જ પડશે કે જ્યાં સુધી જાતિ જ્ઞાતિ નાં કારણે કોઈ પણ વ્યક્તિની સાથે ભેદભાવ કરવામાં આવશે, અન્યાય કરવામાં આવશે, અમાનવીય વ્યવહાર કરવામાં આવશે ત્યાં સુધી આરક્ષણ અનિવાર્ય છે, છે અને છે જ તથા જે દિવસે જાતિ ને કારણે થતા ભેદભાવ, ઊંચ નીચ, આભડછેટ આ દૂર, સંપૂર્ણ નાબૂદ થઇ જશે પછી કોઈ ને પણ સક્ષમ થવા આરક્ષણ ની જરૂરિયાત નહીં જ રહે તે સુવર્ણપત્ર ઉપર રૂપાની શાહી થી લખી રાખજો.
તદ્દન આવી જ રીતે આરક્ષણ મેળવતાં વર્ગે પણ એ સમજવું જ પડશે કે આરક્ષણ એ અંતિમ નથી, અંતે તો પોતે સક્ષમ, સમર્થ બન્યા પછી પોતાના સમાજ માં જેમને આ વ્યવસ્થા નો લાભ નથી મળ્યો તેમને તૈયાર કરવાં પડશે, સમાજ વચ્ચે જવું પડશે અને ઉચિત યોગ્ય માર્ગદર્શન આપવું પડશે જેથી વધુ ને વધુ લોકો એનો લાભ મેળવે અને સમર્થ સક્ષમ બને.
આરક્ષણ મેળવતાં અને નહીં મેળવતાં બંને વર્ગો માટે આત્મચિંતન, આત્મનિરીક્ષણ કરવાની જરૂર છે અને બંને વર્ગો એ હાથ માં હાથ મેળવી ને જાતિ/જ્ઞાતિ ને કારણે થતા ભેદભાવ, ઊંચ નીચ, આભડછેટ અને બીજી અમાનવીય પ્રથાઓ, રિવાજો, વ્યવહારો ને દૂર કરવા લાગી જાય. જ્યાં સુધી કોઈ એક વ્યક્તિ ઉપર જાતિ ને કારણે થતો અન્યાય દરેક જાતિને પોતાની ઉપર થતો અન્યાય નહીં લાગે ત્યાં સુધી એ સમાજમાંથી નહીં જ જાય.
આખરે માનવ એ ઈશ્વર નું શ્રેષ્ઠ સર્જન છે, ઈશ્વર દરેક નું ધ્યાન રાખવામાં, દરેકનાં કર્મોના ફળ આપવામાં કોઈ ભેદભાવ, આભડછેટ નથી કરતો તો ઇશ્વરના બનાવેલા આપણે કોણ છીએ કોઈનાં પ્રત્યે ભેદભાવ, આભડછેટ રાખનારા ? શું આપણે ઈશ્વર કરતાં પણ વધારે મોટાં, મહાન, સક્ષમ, સમર્થ બની ગયાં છીએ ?
અને જો જ્યાં પણ ભગવાન, ઈશ્વર નો વાસ છે તેને પવિત્ર માનતાં હોઈએ તો એક વખત શ્રીમદ્ ભગવદ્ ગીતા ને શરણે ચોક્કસપણે જવું પડશે જ્યાં ભગવાન શ્રી કૃષ્ણ એ પોતાના સ્વમુખે પોતાનું સરનામું “सर्वस्यचाहं ह्रदिसन्निविष्टो” “હું દરેક નાં હ્રદય માં વસેલો છું” આપ્યું છે તો દરેક જીવ ને “ममैवांशो जीवलोके” “દરેક જીવ મારો અંશ છે” કહી સંબંધ જણાવ્યો છે. જ્યારે ભગવાન સ્વયં કહે છે તે દરેક જીવ માં વિરાજમાન છે તો હું અથવા આપણે કોણ છીએ જેમાં ભગવાન, ઈશ્વર છે તેને અપવિત્ર, અસ્પૃશ્ય માનનારા ?
એક બાબત સોનાનાં અક્ષરો થી હ્રદયમાં વસાવી દેવાની જરૂર છે કે માણસ અસ્વચ્છ હોઈ શકે, અશિક્ષિત હોઈ શકે, અસંસ્કારી હોઈ શકે, અસંસ્કૃત હોઈ શકે, અવિચારી હોઈ શકે પરંતુ કોઈ જ માનવ કદી અપવિત્ર, અસ્પૃશ્ય કદી જ ન હોઈ શકે.
અને હા, સમાજ ને હવે તાતી જરૂર છે એક પ્રચંડ આંદોલન ની જેનો નારો હોય “આભડછેટ હટાવો,દેશ બચાવો” જાતિગત ભેદભાવ મિટાવો, દેશ બચાવો”.
અસ્તુ,
🖌️ દેવેન્દ્ર કુમાર

संवैधानिक संतुलन: भारत में संसद की भूमिका और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय

भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में, जाँच और संतुलन की व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न संस्थाओं की भूमिकाएँ सावधानीपूर्वक परिभाषित की गई है...