मंगलवार, 11 अप्रैल 2023

विश्व मातृभाषा दिन

 प्रति वर्ष 21 फरवरी को ‘अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस’ (International Mother Language Day 2023) मनाया जाता है। दुनियाभर की भाषाओं और संस्कृति का सम्मान हो और इसके प्रति लोगों में प्रेम एवं गौरव बना रहे इस द्रष्टि से समग्र विश्व में 21 फरवरी के दिन अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया जाता है। अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस को मनाने का सबसे बड़ा उद्देश्य विश्वभर में अपनी भाषा-संस्कृति के प्रति लोगों में जागरुकता फैलाना है। 

सर्व प्रथम मातृभाषा दिवस कब और कहां मनाया गया ?

मातृभाषा पर जिनको ममत्व है और जिस भाषाने रवीन्द्रनाथ ठाकुर जैसे नोबेल पुरस्कार विजेता गुरुवर दिये है ऐसे बांग्ला भाषा बोलने वाले और अपनी मातृभाषा पर गौरव का अनुभव करने वाले और विभाजन के पश्चात पाकिस्तान का हिस्सा बन जाने वाले पूर्व पाकिस्तान के ऐसे बांग्लाभाषी विद्यार्थियों और कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपनी मातृभाषा का अस्तित्व बनाए रखने के लिए  1952 में ढाका विश्वविद्यालय के एक विरोध प्रदर्शन किया था। यह विरोध प्रदर्शन बहुत जल्द एक नरसंहार में बदल गया जब तत्कालीन पाकिस्तान सरकार की पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियां बरसा दी। इस घटना में 16 लोगों की जान गई थी।


भाषा के इस बड़े आंदोलन में शहीद हुए लोगों की याद में 1999 में यूनेस्को (United Nation) ने पहली बार अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाने की घोषणा की थी। कह सकते हैं कि बांग्ला भाषा बोलने वालों के मातृभाषा के लिए प्यार की वजह से ही आज विश्व में अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया जाता है।

बुधवार, 1 फ़रवरी 2023

40 वर्षो में 100 मिलियन भारतीयों की हत्या किसने की ?

 


1880 से 1920 के बीच, ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियों ने कीस देश में सोवियत संघ, माओवादी चीन और उत्तर कोरिया में अकालों से मरनेवालों की तुलना में अधिक जानें लीं ?

हाल के इस समय में नियाल फर्ग्यूसन की Empire: How Britain Made the Modern World, और ब्रूस गिली की The Last Imperialist जैसी हाई-प्रोफाइल किताबों में ऐसा दावा किया गया है कि ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने भारत और अन्य उपनिवेशों में समृद्धि और विकास की नई क्षितिजें न केवल खोल दी अपितु समृद्धि और विकास की एक नई पायदान पर ले गया। दो वर्ष पहले, YouGov के एक पोल में पाया गया कि ब्रिटेन में 32 प्रतिशत लोग देश के औपनिवेशिक इतिहास पर गर्व करते है और अपने आप को गौरवान्वित समजते हैं।

उपनिवेशवाद की यह गुलाबी तस्वीर विश्व के समक्ष दिखाने की भरपुर कोशिशें की जा रही है सारी कोशिशें ऐतिहासिक रिकॉर्ड के सामने विपरित स्थिति में देखी जा सकती है। विश्व प्रसिद्ध आर्थिक इतिहासकार रॉबर्ट सी एलन के संशोधन के अनुसार, ब्रिटिश शासन के तहत भारत में गरीबी 1810 में 23 प्रतिशत थी जो 20वीं शताब्दी के मध्य में से बढ़कर 50 प्रतिशत से अधिक हो गई थी। ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के दौरान वास्तविक मजदूरी दर में लगातार  गिरावट आती गइ, जो 19वीं शताब्दी में अपने निम्न स्तर पर पहुंच गई, इस समय में जब मजदुरी दर घट रही थी भारत में अकाल लगातार पडते रहे इतना ही नही और अधिक घातक होते गए। हम जब इस समय के वास्तविक चित्र को देखते है तब लगता है की ब्रिटिश उपनिवेशवाद भारतीय लोगों को लाभ पहुँचाने की बात से कोसो दूर तो था ही साथ ही, एक मानवीय त्रासदी भी थी, इस बात की पुष्टी हम रेकोर्डेड इतिहास के पन्नो को देखकर कर सकते है जिसमे भरतीयों को हुई हानि और त्रासदी की बहुत सारी समानताएँ दिख जाती  हैं।

जहाँ 1880 से 1920 तक की अवधि में ब्रिटन की साम्राज्यवादी शक्तियां आसमान की ऊंचाई छू रही थी - जब की वोही ब्रिटन की आसमान को छूनेवाली शक्तियां भारत के लिए विशेष रूप से विनाशकारी थी और इस बात पर विश्व के अनेक विशेषज्ञ सहमत है। ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन द्वारा 1880 के दशक में शुरू की गई व्यापक जनगणना से मिले आंकडो से स्पष्ट रुप से  पता चलता है कि इस समयावधि के दौरान मृत्यु दर में काफी वृद्धि हुई थी, 1880 के दशक में भारत में मृत्यु दर प्रति 1,000 लोगों पर 37.2 मृत्यु थी जो केवल 30 वर्ष बीतते बीतते 1910 के दशक में बढकर प्रति 1,000 लोगों पर 44.2 हो गई थी। भारतीयों के जीवन की जैसे किसी को कोई चिंता ही नहि थी, बात केवल इतनी ही नही थी मृत्यु दर तो बढा ही साथ साथ इसी 30 वर्षो में  भारतीयों की जिवनावधि 26.7 वर्ष से करीब करीब 5 वर्ष घटकर 21.9 वर्ष हो गई। इस बात को अगर हम इतिहास के आइने में देखते है तो एक बात स्पष्ट दिखाइ पडती है की उस समय में भारत के नागरिक भगवान भरोसे छोद दिये गये थे, और भगवान भी शायद उनके पक्ष् में नही दिख रहा था और लगातार अकालो से उनका सामना करवा रहा था, कदाचित भगवान भारत के नागरिको की परीक्षा तो नही ले रहा था ?

World Development नामक एक जर्नल में हाल ही में प्रकाशित एक अध्ययन में जनगणना के आंकड़ों का उपयोग इन चार क्रूर दशकों के दौरान ब्रिटिश साम्राज्यवादी नीतियों द्वारा मारे गए लोगों की संख्या का अनुमान लगाने के लिए  किया है। भारत में मृत्यु दर के जो ऐतिहासिक आंकड़े केवल 1880 के दशक से ही मौजूद हैं। यदि हम इस आंकडो को "सामान्य" मृत्यु दर के आधार के रूप में देखते हैं, तो हमे पता चलता हैं कि 1891 से 1920 की अवधि के दौरान ब्रिटिश उपनिवेशवाद के क्रुर समय में, जब भारतीय नागरिको के जीवन की किमत ब्रिटिश उपनिवेशवाद में कुछ नही थी तब लगभग 50 मिलियन भारतीय नगरिकों की मौतें हुईं थी।



पचास लाख मौतें एक चौंका देने वाला आंकड़ा है, और यह आंकडा यह स्पष्ट करता है की वास्तविक मजदूरी के दर में अत्यधिक गिरावट आने से सामान्य भारतीय के जीवन पर इसकी विपरित असर पडी थी, उप्लब्ध डेटा इस बात को इंगित करता है कि औपनिवेशिक भारत में 1880 तक, सामान्य भारतीय नागरिक का जीवन स्तर पहले से ही अपने पिछले स्तरों से दयाजनक रूप से गिर गया था। कई विद्वानों का यह तर्क है कि उपनिवेशवाद से पहले, सामान्य भारतीय नागरिकों का जीवन स्तर "पश्चिमी यूरोप के विकासशील जीवन स्तर के बराबर" रहा होगा। हमारे पास आंकडे उप्लब्ध नही होने से हम निश्चित रूप से यह नहीं जानते है कि भारत में पूर्व-औपनिवेशिक काल में मृत्यु दर क्या थी, परंतु अगर हम जो आंकडे उप्लब्ध है यह मान लें की भारत में पूर्व-औपनिवेशिक काल में मृत्यु दर 16वीं और 17वीं शताब्दी में इंग्लैंड के समान थी (प्रति 1,000 लोगों पर 27.18 मौतें), तो हमें पता चलता हैं कि भारत में 1881 से 1920 की अवधि के दौरान करीब 165 मिलियन अतिरिक्त मौतें हुईं।

भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में हुए मौतों की सटीक और आधारभूत संख्या के आंकडे और मृत्यु दर हमारे द्वारा की गई धारणाओं पर आधारित है, फिर भी यह स्पष्ट है कि ब्रिटिश उपनिवेशवाद भारत में अपनी ऊंचाई पर था उस समय के दौरान कहीं न कहीं 100 मिलियन भारतीय नगरिकों की उनके मृत्यु के समय से पहले मृत्यु हो गई। यह भयावह समय मानव इतिहास में नीति-प्रेरित बढे मृत्यु दर जैसे संकटों में से सबसे बडा गिना जा सकता है। इस समय के दौरान हुई मृत्यु की संख्या की तुलना हम सोवियत संघ, माओवादी चीन, उत्तर कोरिया, पोल पॉट के कंबोडिया और मेंगिस्टु के इथियोपिया में पडे सभी अकालों के दौरान हुई मौतों की संयुक्त संख्या से भी कहीं अधिक है। यह पुरा समय कितना भयावह होगा यह कल्पना हम कर सकते है साथ ही हम यह भी सोच सकते है।


ब्रिटिश शासन के कारण इतनी भारी जान-माल की हानि कैसे हुई? यह यक्ष प्रश्न नही है जरा सा ध्यान देने की आवश्यकता है और समज में आ जायेगा । इस के ब्रिटिश शासन ने कई तंत्र विकसित कीये थे जिसका ध्यान केवल ब्रिटिश शसन और ब्रिटन को आर्थिक रुप से मजबुत बनाना था। उन सभी तंत्रो में से एक है, ब्रिटेन ने प्रभावी और क्रुरतापुर्ण रूप से भारत के उत्पादन क्षेत्र को समग्रतया नष्ट कर दिया। ब्रिटिश उपनिवेशीकरण से पहले की वैश्विक अर्थ व्यवस्था और उस में भारत का हिस्सा देखने पर दिखाइ देता है की, भारत दुनिया के सबसे बड़े औद्योगिक उत्पादकों के उत्पादंकर्ताओं में से एक था, जो दुनिया के सभी कोनों में उच्च गुणवत्ता वाले वस्त्रों की निर्यात करता था परंतु ब्रिटिश उपनिवेशकाल के दौरान ऐसी नीतियां बनाई गई जिस से भारत के वस्त्रो की निर्यात लगभग शुन्य के बराबर हो गई, इससे पहले इंग्लैण्ड में तैयार किया जाने वाला यंत्र निर्मित चमकीला कपड़ा भारत के कर्मीयों के द्वारा उत्पादित कपडे से प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकता था। भारत की अर्थतंत्र और भारतीय उत्पादको के द्वारा तैयार किया जानेवाला उत्पादन विश्व में जा न सके इस की शुरुआत तब से हुई जब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1757 में बंगाल पर अधिकार कर लिया तब भारत की शासन व्यवस्था के बदलने का भी दौर शुरू हुआ।

कइ इतिहासकारों के अनुसार, ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन ने व्यावहारिक रूप से भारत के बाहर उत्पादित चीजों पर से भारतीय शुल्कों को समाप्त कर दिया और यह ऐसा निर्णय था विदेश में उत्पादित वस्तुओं को भारत में उत्पादित वस्तुओं से सस्ता कर दिया जिससे ब्रिटन में उत्पादित वस्तुओं की भारतीय घरेलू बाजार में जैसे बाढ़ आ गई, इसके साथ साथ ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन ने भारत में उत्पादित चीजों पर अत्यधिक करों और आंतरिक ड्युटीज की एक ऐसी प्रणाली बनाई जिसने भारत में उत्पादित कपडा भारत में ब्रिटेन में उत्पादित कपडे की तुलना में इतना महेंगा हो गया की स्थानिक बाजार में इसका खरीदार ही नही था क्यों की दुसरी तरफ भारत के लोगों की आमदनी भी इतनी नही रही थी कइ वो भारत में उत्पादित कपडा खरीद सके अब नोबत यह आ गई की भारत में उत्पादित कपडा केवल निर्यात ही किया जा सके, भारत में बेच ही ना सके अर्थात इस प्रणालीने भारतीयों को अपने ही देश में कपड़ा बेचने से रोक दिया।

जैसा कि ईस्ट इंडिया एंड चाइना एसोसिएशन के अध्यक्ष ने 1840 में अंग्रेजी संसद में दावा किया था: "यह कंपनी भारत को एक उत्पादनकर्ता, औद्योगिक देश से कच्चे उत्पाद का निर्यात करने वाले देश में बदलने में सफल रही है।" अंग्रेजी निर्माताओं ने इस प्रणाली का जबरदस्त लाभ प्राप्त किया, जबकि दुसरी तरफ भारत गरीबी में ऐसा सिमट गया कि लोगों को भूख और बीमारी के अलावा कुछ भी नही मिल रहा था। इस असमान और अन्यायी व्यापार व्यवस्था ने भारतीय निर्माताओं, उत्पादकों को निर्दयता और निष्ठुरता से कुचल दिया और देश को प्रभावी ढंग से वि-औद्योगिक बना दिया। 



भुख और कंगाली  की भारत की हो रही स्थिति को बद से बदतर बनाने के लिए, ब्रिटिश उपनिवेशवादियों ने कानूनी लूट की एक प्रणाली स्थापित की, जिसे समकालीन लोग "धन की निकासी" के रूप में जानते थे। ब्रिटेन ने भारतीय आबादी पर कर लगाया और फिर प्राप्त राजस्व का उपयोग भारतीय उत्पादों - नील, अनाज, कपास और अफीम को खरीदने के लिए किया - इस प्रकार से इन सामानों को भारतीयो से ही मिली आर्थिक शक्ति से जैसे मुफ्त में प्राप्त किया, इन सामानों को ब्रिटेन में भेजा जाने लगा जिसका ब्रिटेन के भीतर उपभोग किया जाता था या विदेशों में फिर से निर्यात किया जाता था, अर्थात भारत के नागरिको के रुपयों से भारत में उत्पादित चीजो को सस्ते दाम में खरीदकर भारत से ब्रिटेन में निर्यात किया जाता था और फिर ब्रिटेन से  ब्रिटिश राज्य द्वारा राजस्व लगाकर ब्रिटेन और उसके उपनिवेशों - संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया के औद्योगिक विकास के लिए इस्तेमाल किया जाता था। इस पुरे तंत्र को सरल रुप से, दुसरे शब्दो में समजे तो भारत को बर्बाद करके ब्रिटेन और ब्रिटिश उपनिवेशों को समृद्ध बनाया गया, भारत को वि-औद्योगिक करके ब्रिटेन और ब्रिटिश उपनिवेशों को औद्योगिक  बनाया गया।

अगर हम आज के परिप्रेक्ष्य से देखते है तो हम देख पायेंगे की इस व्यवस्था के द्वारा ब्रिटिश शासनने भारत से आज के खरबों डॉलर के माल की निकासी कर दी और स्वयं और अपने अन्य उपनिवेशो को समृद्ध बना दिया। अगर हम इस निर्यात नीति को समजने का प्रयास करते है तो यह पाते है की ब्रिटिश शासन इतना निर्दयी हो गया था की सूखे या बाढ़ से जब भारत में स्थानीय खाद्य सुरक्षा को खतरा था और दिन ब दिन यह खतरा बढ रहा था फिर भी, भारत को अनाज निर्यात करने के लिए मजबूर करने वाली नितीयां लागू करखी गई, इतना निर्दयी तो राक्षस भी नही हुआ करते होंगे। इतिहासकारों की माने तो उन्होने यह सत्य स्थापित किया है कि 19वीं शताब्दी के अंत तक ब्रिटिश शासन की इस निर्दयी नीतिओं के कारण उस समय में भारत के विभिन्न क्षेत्रो में पडे अकालों के दौरान लाखों भारतीयों की भुखमरी से मृत्यु हो गई, और यह मृत्यु केवल इस लिये हुई क्योंकि उनके संसाधनों को ब्रिटेन और उसके बसने वाले उपनिवेशों में भेज दिया गया था।

ऐसा कतई नही था की औपनिवेशिक प्रशासक अपनी नीतियों के परिणामों से अवगत नहीं थे वे पूरी तरह अवगत थे। उन्होंने अपनी निर्दयी नीतिओं के कारण लाखों लोगों को भूखे मरते हुए देखा किंतु फिर भी उन्होंने अपना यह दयाहीन नीतिओं का रास्ता नहीं बदला इतना ही नहीं वे जीवित रहने के लिए आवश्यक संसाधनों से जानबूझकर लोगों को वंचित करते रहे। विक्टोरियन काल का यह असाधारण मृत्यु दर कोई दुर्घटना नहीं थी। इतिहासकार माइक डेविस का तर्क है कि ब्रिटेन की शाही नीतियां "18,000 फीट से पुर्व निर्धारित लक्ष्य पर सटीक रुप से गिराए गए बमों से होने वाले परिणाम जितनी भयानकता के समकक्ष थीं।"

शोधकर्ताओं के द्वारा की गई सर्दभयुक्त शोध से यह पता चलता है कि 1881-1920 की अवधि के दौरान ब्रिटेन की शोषणकारी नीतियों से लगभग 100 मिलियन से अतिरिक्त मौतें हुई थी। यह , अंतरराष्ट्रीय कानून में  के साथ। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, जर्मनी ने होलोकॉस्ट के पीड़ितों को मुआवजा देने के लिए मुआवजे के समझौते पर हस्ताक्षर किए और हाल ही में 1900 के दशक की शुरुआत में नामीबिया में हुए औपनिवेशिक अपराधों के लिए मुआवजे का भुगतान करने पर सहमत हुए, रंगभेद के मद्देनजर, दक्षिण अफ्रीका ने श्वेत-अल्पसंख्यक सरकार द्वारा आतंकित किए गए लोगों को क्षतिपूर्ति का भुगतान किया। उसी आंतरराष्ट्रीय नियमों के अंतर्गत यह भी क्षतिपूर्ति की मजबूत मिसाल और मुआवजे के लिए एक सीधा और स्पष्ट मामला है। 

इतिहास को बदला नहीं जा सकता और ब्रिटिश साम्राज्य के अपराधों को मिटाया नहीं जा सकता। लेकिन क्षतिपूर्ति उपनिवेशवाद द्वारा पैदा की गई वंचना और असमानता की विरासत को दुर करने में मदद कर सकती है। यह न्याय और उपचार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।

सोमवार, 23 जनवरी 2023

6,00,000 पाउंड देकर क्या छुपा रही है ब्रिटिश सरकार ?




कोइ दस्तावेज को गुप्त रखने की कीमत क्या हो सकती है ? यूके सरकार  कुछ दस्तावेजो को गुप्त रखने के लिए और उसे सार्वजनिक न करने  के लिए 6,00,000 पाउंड (लगभग 800,000 डॉलर) का भुगतान कर रही है। क्या है येह दस्तावेज ? ऐसा क्या है उन दस्तावेजो में ? कौन सा रहस्य छुपा है उन दस्तावेजो में जिसे युके की सरकार सार्वजनिक न करने के लिए इतना बडा मुल्य चुका रही है ?: 


इन सभी प्रश्नो के उत्तर भारत की स्वतंत्रता के समय के दंपत्ति के पास छुपे है, और वो दंपत्ति है ब्रिटिश भारत के अंतिम वाइसरोय और स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन और उनकी पत्नी लेडी माउंटबेटन, उनकी डायरीयां और दोनों के बीच कुछ के पत्राचार को युके की सरकार सार्वजनिक करना नही चाहती और उसके लिए इतनी बडी किमत चुका रही है, लेकिन आखिर मामला क्या है ? किस को दे रही है ब्रिटन की सरकार इतनी बडी राशि ? 

कीस कागजात को छुपाना चाहती है ब्रिटिश सरकार ?

यूके सरकार इन कागजातों को कीसी भी तरह दफनाने की, छुपाने की, सार्वजनिक नहीं करने की कोशिश कर रही है, विशेष रूप से विभाजन के वर्षों से जुडे कागजात को दफनाना, छुपाना चाहती है और नही चाहती के यह डायरी और पत्राचार सार्वजनिक हो। ब्रिटिश सरकार को लगता है की यह डायरीयां और पत्राचार ब्रिटिश शाही परिवार की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा सकते है और इसीलिए ब्रिटिश लेखक एंड्रयू लॉनी के खिलाफ एक अदालती लड़ाई में ब्रिटिश सरकार इतनी बडी राशि का भुगतान कर रही है। ब्रिटिश सरकार ऐसा मानती है की लोर्ड माउंट्बेटन और उनकी पत्नी लेडी एडविना माउंट्बेटन की डायरीयां और उनकी बीच के पत्राचार ब्रिटेन के पाकिस्तान और भारत के बीच के रिश्तों को खतरे में डाल सकता है। 





माउंटबेटन और लडी एडविना 

ब्रिटिश सरकार किस कारण से लोर्ड माउंटबेटन और उनकी पत्नी लेडी एडविना के पत्राचार और डायरीयां को इतना महत्व दे रही है ? लोर्ड माउंटबेटन और उनकी पत्नी लेडी एडविना की डायरीयां और पत्राचार ब्रिटिश शाही परिवार की प्रतिष्ठा को कैसे नुकसान पहुंचा सकते है ? लोर्ड माउंटबेटन का ब्रिटन के शाही परिवार से क्या संबंध है ? यहाँ यह जानना आवश्यक है की महारानी विक्टोरिया के प्रपौत्र थे। लोर्ड माउंटबेटन एक रॉयलिस्ट थे और जैसे की ब्रितिश रोयल परिवार का नियम है की परिवार के सदस्य को  ब्रिटिश सेना में निश्चित समय के लिए अपनी सेवा देनी  पडती थी, उस नियम का पालन करते हुए लोर्ड माउंटबेटनने भी रॉयल नेवी में अपनी सेवा दी थी। उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नौसेना की कमान संभाली और ब्रिटिश राज में विभिन्न पदों पर रहे। वह भारत के अंतिम वायसराय भी बने। 1922 में दिल्ली में ही माउंटबेटन की मुलाकात एडविना नाम की एक युवती से हुई थी। उन्होंने तब शादी करने का फैसला किया, जिसमें कथित तौर पर कई उतार-चढ़ाव आए। दावा किया गया था कि दोनों के अन्य लोगों के साथ अफेयर थे परंतु माउंटबेटन और एड्विनाने लग्न किये। अब देखा जाए तो माउंटबेटन दंपति की शादी किसी से छिपी नहीं थी फीर ऐसा क्या है जो ब्रिटिश सरकार छिपाने की कोशिश कर रही है ?




भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु और एडविना के पत्र का अंश  

लेडी माउंटबेटन वैसे मिलनसार थी और उनके काफी मित्र थे एड्विना के करीबी दोस्तों में से एक भारत के प्रथम प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू भी थे। नेहरु और एड्विना की मित्रता के अनेक किस्से है जो समय समय पर चर्चा में आते रहेते है । एड्विना और जवाहरलाल नेहरु में पत्राचार होते थे यह भी सार्वजनिक है, कुछ पत्र ऐसे भी है जो सार्वजनिक भी है । एड्विना और जवाहरलाल नेहरू के बीच हुए पत्राचार में से एक पत्र WION न्युज के पास था जिसका संदर्भ देते हुए WION न्युजने दावा किया है की उस पत्र में, एडविनाने नेहरु को लिखा था, "आपने मुझे शांति की एक अजीब भावना के साथ छोड़ दिया। शायद मैं आपके लिए वही लायी हूँ? "मुझे आज सुबह आपको ड्राइव करते हुए देखते हुए नफरत हुइ। जवाहरलाल नेहरू ने इसका उत्तर दिया  "जीवन एक नीरसता है,"।




कीसने मांगे ब्रिटिश सरकार से माउंटबेटन और लडी एदविना के वो कागजात ?

माउंटबेटन के कागजात जैसे एक खजाने की निधि के समान हैं उस में इतिहास है और कथित तौर पर बहुत सारे घोटाले हैं। इसलिए, कुछ साल पहले, लेखक एंड्र्यु लॉनीने जब इन कागजातों पर किसी प्रकार की रोक न करते हुए ब्रिटिश सरकार से मांगे, तो सरकार ने उन्हें उपकृत करने से इनकार कर दिया। लेकिन लेखक एंड्र्यु लॉनी ने सरकार के नकारात्मक उत्तर को ही नकार दिया और उन्होंने अंग्रेजों के सूचना की स्वतंत्रता के कानून का हवाला दिया और सरकार को माउंटबेटन के सभी कागजातों में से कम से कम 99.8 प्रतिशत को जारी करने के लिए मजबूर कर दिया, जबकि सरकारने बाकी के कागजातों का खुलासा करने से स्पष्ट इनकार कर दिया। 

क्या रह्स्य है नकारे गये कगजातों में ?

ब्रिटिश सरकारने जिस बाकी के कागजातों का खुलासा करने से स्पष्ट इनकार कर दिया वह कागजात कथित तौर पर 1947 और 1948 के वर्षों के दस्तावेज हैं, जिनमें लॉर्ड और लेडी माउंटबेटन की डायरी और दोनों के बीच कुछ पत्राचार शामिल हैं। इस दंपत्ति को अपने विचारों को बिना कोइ शब्द चोरी किये, प्रमाणिकता से कागज़ पर लिखने की आदत थी। अपनी आदत को पुरा करने के लिए दोनों डायरी लिखते थे, दोनों ने चिट्ठियों में अपने मन की बातें एक दुसरे को लिखे पत्रोमें स्पष्ट रुप से लिखी है। 1942 में लॉर्ड माउंटबेटन ने अपनी पत्नी को यह लिखा था: "अतिप्रिय एडविना, मुझे लगता है कि जीवन के सबसे कठिन सप्ताह के दौरान दो बार तुम्हें छोड़ना पड़ा। मुझे डर है, जैसा कि मैंने एक बार तुमसे पहले भी कहा था, तुम्हें एक नाविक से शादी नहीं करनी चाहिए थी। मैं अच्छी अच्छी बातें कहने का आदी नहीं हुं और मैं आपके अधिकांश अन्य प्रशंसकों के साथ प्रतिस्पर्धा करने की उम्मीद नहीं कर सकता। परंतु मुझे लगता है कि मुझे यह अवश्य कहना चाहिए जो मैं सोचता हुं कि तुम वास्तव में भव्य और बहुत प्यारी और मधुर हो। माउंटबेटन ने भारत के विभाजन के दौरान हुइ सारी राजनितिक, सामाजिक, आर्थिक, सरहदीय और अन्य सभी उठापटक के साक्षी ही नही थे अपितु बहुत सारी बातो में मुख्य संचालक भी थे। माउंटबेटन और उनकी पत्नी लेडी माउंटबेटन को अपने विचारों बिना कीसी जिजक लिखने की आदत थी, ब्रिटिश सरकार को यह शंका है की उनकी डायरियों सार्वजनिक करने से वो सारी बातों का खुलासा हो सकता है जो उस समय साजा नही किये गये और इसी कारण  ब्रिटेन इसे साझा करने में सहज नहीं है। उनकी डायरियों में नेहरू, मोहम्मद अली जिन्ना, महात्मा गांधी और भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा रेखा खींचने वाले सर सिरिल रेडक्लिफ के बारे में माउंटबेटन के विचार हो सकते हैं। माउंटबेटन, शाही परिवार के एक बहुत ही प्रभावशाली सदस्य, ड्यूक ऑफ एडिनबर्ग प्रिंस फिलिप के मामा थे। वह तत्कालिन प्रिंस ऑफ वेल्स, प्रिंस चार्ल्स और वर्तमान किंग चार्ल्स के लिए एक पिता समान थे, दोनों बहुत करीब थे। माना जाता है कि माउंटबेटन ने प्रिंस चार्ल्स के निजी जीवन में बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी, चाहे वह तत्कालीन प्रेमिका कैमिला पार्कर बाउल्स के साथ उनका अफेयर हो या डायना के साथ उनकी शादी। शाही परिवार प्यार से माउंटबेटन को "अंकल डिकी" कहता था। और वर्तमान किंग चार्ल्स माउंटबेटन की डायरी लिखने की आदत के बारे में भलीभांती जानते थे। ऐसा कहा जाता है कि शाही परिवार के पास उनके कुछ दस्तावेज भी थे। लेकिन परिवार में किसने सोचा होगा कि अंकल डिकी की डायरी एक दिन सार्वजनिक खजाने को खाली करना शुरू कर देगी? अब तक, यूके सरकार ने माउंटबेटन के विचारों को दुनिया से छिपाने की कोशिश करते हुए, उन्हें छुपाने के लिए 800,000 डॉलर खर्च किए हैं। 

क्या माउंटबेटन दंपत्ति के पत्राचार और डायरीयां कभी सार्वजनिक होगी ?

अभी, लंदन में एक मुकदमा चल रहा है जो यह निर्धारित करेगा कि ब्रिटेन के शाही परिवार और ब्रिटन की कैबिनेट की चिंताओं के बावजूद माउंटबेटन दंपत्ति की सभी निजी डायरियों और पत्रों को जनता के लिए जारी किया जाना चाहिए या नहीं।

शनिवार, 7 जनवरी 2023

विश्व नेता भारत का प्रतिबिंब G-20 का अध्यक्ष भारत




अमेरिका, यूरोपीय संघ सहित रूस, चीन, दक्षिण कोरिया, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, आस्ट्रेलिया, कनाडा, सऊदी अरब, जर्मनी, इडोनिशिया, इटली, मेक्सिको, इंडोनेशिया, अर्जेंटीना, तुर्की जैसे देशों से बना संगठन है जी-20, यह ऐसे देश है जो विश्व जीडीपी का 85 प्रतिशत, विश्व कारोबार का 75 प्रतिशत हिस्सा समेटे हुए है, इतना ही नहि विश्व की 60 प्रतिशत जनसंख्या जी-20 देशों में ही रहती है भारत इतने सामर्थ्यवान एवं बड़े समूह की अध्यक्षता एक दिसंबर से कर रहा है। ऐसे सामर्थ्यवान देशो के संगठन जी-20 देशों की अध्यक्षता मिलना भारत के लिए एक बड़ा अवसर है। जी-20 देशों की अध्यक्षता मिलना यह केवल संजोग नही है परंतु, विश्व व्यवस्था के इन समृद्ध देशो के संगठन जी-20 देशों के बीच भारत के सामर्थ्य की स्वीकार्यता स्पष्ट तौर पर दर्शाता है। इस मौके का उपयोग करते हुए भारत को विश्व कल्याण पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और इस विचार को स्पष्ट करते हुए ‘भारत के पास विश्व कल्याण, शांति एवं पर्यावरण की चुनौतियों का समाधान है।" इस बात को विश्व के समक्ष उजागर करते हुए हमने एक पृथ्वी, एक परिवार और एक भविष्य की जो थीम दी है, उससे वसुधैव कुटुंबकम् के लिए हमारी प्रतिबद्धता जाहिर होती है।’ बिना किसी संदेह के जी-20 को विश्व नेतृत्वकर्ता समूह के तौर पर स्वीकार किया जा सकता है।



भारत की प्रमुख और प्रभावी होती भूमिका

गत दिनों इंडोनेशिया के बाली में आयोजित जी-20 देशों की बैठक में और पिछले दिनों उज्बेकिस्तान के समरकंद में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के सदस्य देशों के सम्मेलन में भी यह साफ तौर पर दिख यहा था की विश्व मंचों पर भारत की प्रमुख और प्रभावी होती भूमिका को अब विश्व के प्रमुख देश स्वीकारने लगे हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने उज्बेकिस्तान के समरकंद में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के सदस्य देशों के सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से बातचीत में जब कहा कि "यह युद्ध का युग नहीं है" तो उस पर विश्व आश्चर्यचकित रह गया था, क्योंकि भारत हथियारों और तेल की आपूर्ति के लिए बहुत हद तक रूस पर निर्भर है। भारत जितना इंधन आयात करता है  उसमे रूस से खरीदा जाने वाला ईंधन 19% से बढकर 23% हुआ है, भारतीय मिलिट्री के करीब 86 फीसदी उपकरणों का सीधा संबंध रूस से है, कुछ उदाहरण देखते है भारत ने रूस से 125 एंतोनोव एन-32 कार्गो प्लेन खरीदे थे जिनमें से 105 अब भी काम कर रहे हैं, इस प्लेन्स को अत्याधुनिक बनाया जा रहा है, भारत ने रूस के साथ AK-203 असॉल्ट राइफल बनाने की 5 हजार करोड़ रुपये की डील की है.जिसके तहत 6.01 लाख राइफल भारत में बनेगी, जबकि 70 हजार राइफल रूस से ही आएगी, भारत के कइ जंगी जहाजो पर रुस द्वारा विकसित की गइ घुमने वाली तोप यानी क्लोज-इन वेपन सिस्टम रोटरी केनन, भारतीय वायुसेना के सबसे घातक लड़ाकू विमानों में से एक मिग-29 मिकोयान (MiG-29 Mikoyan) को रूस ने ही बनाया है और फिलहाल इसके तीन वैरिएंट्स भारत के पास मौजूद हैं, जिसे हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने अत्याधुनिक बनाया है और भारतीय वायुसेना में ऐसे 272 विमान मौजूद ऐसा लडाकु विमान सुखोई 30एमकेआई भी रुस से ही भारत ने खरिदा है और जिसे भारत ने जिसका नाम बदलकर भीष्म रखा है ऐसी मेइन बैटल टेंक टी-90 टेंक जिसके लिये भारतने रुस के साथ डील की है तिसके तहत 2025 तक 1675 भीष्म टेंक ड्युटी पर तैनात कर देगा यह टेंक भी रुस्ने ही बनाइ है, इस तरह से रुस के साथ गहरे रक्षा संबंध होने के बावजुद भारतने जो कहा उससे विश्व यह मानने लगा है की भारत अब किसी अन्य देश के दबाव में आकर अपने फैसले नही लेता बल्कि भारत के निर्णय विश्व हितऔर स्व के परिप्रेक्ष्य में लेता है.   

भारतीय कूटनीति

बाद में एक कार्यक्रम में व्लादिमीर पुतिन ने प्रधानमंत्री मोदी की प्रशंसा करते हुए कहा कि "भारत की विदेश नीति स्वतंत्र है और मोदी एक देशभक्त राजनेता हैं, जो अपने देश के हितों के लिहाज से नीति तय करते हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि विश्व व्यवस्था में भारत की भूमिका बढ़ने वाली है।" इसकी पुष्टि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर से लेकर प्रमुख नेताओं द्वारा कही जा रही यह बात कर रही है कि हम भारत के हितों के लिहाज से कोई भी निर्णय लेंगे। पुतिन की ही तरह फ्रांस के राष्ट्रपति एमैनुअल मैक्रों भी भारत के अच्छे मित्रों में गिने जाते हैं। गत दिनों मैक्रों ने जी-20 की बैठक से प्रधानमंत्री मोदी के साथ एक चित्र साझा करते हुए लिखा कि "हम भारत की अध्यक्षता में शांति के एजेंडे पर साझा काम करेंगे।" जाहिर है आतंकवाद, वित्तीय समावेशन, खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा पर विश्व के विकसित देश भारत के नेतृत्व में चल रहे एजेंडे को आगे बढ़ाने की बात कर रहे हैं। अमेरिकी मीडिया आमतौर पर भारतीय प्रधानमंत्रियों के बयान को बहुत प्रमुखता नहीं देता है, लेकिन अमेरिका को मोदी का 'यह युद्ध का युग नहीं है' वाला यह बयान अपने पक्ष में लगा तो वह मोदी की प्रशंसा में जुट गया। जाहिर है अमेरिका, रूस और चीन की तिकड़ी के बीच फंसी विश्व व्यवस्था में भारतीय कूटनीति के संतुलन का यह अप्रतिम उदाहरण देखने को मिला है। साथ ही भारत अब किसी के दबाव में या प्रभाव में आकर अपने फैसले नही ले रहा ऐस स्पष्ट संदेश विश्व को मिल रहा है जब भारत के विदेशमंत्री को युरोप में युरोप के पत्रकार के द्वारा ऐसा प्रश्न पुछा जाता है की भारत रुस से इंधन खरिदता है उस इंधन के पैसे से रुस युद्ध करता है तब भारत के विदेशमंत्री स्पष्ट शब्दो में उत्तर देते है की भारत से कही ज्यादा इंधन युरोप के देश रुस से खरीदते है । ऐसे अनेक उदाहरण विश्व के मंच पर भारत के बयानो के मिल जायेंगे जिस को देख सुन विश्व भारत के सामर्थ्य को मानने पर विवश हो रहा है। एक और बात यह भी है की विश्व की महासत्ता कहे जानेवाले देश या संगठन कोइ भी निर्णय लेने के बारे में सोचते है तो स्वाभाविक रुप से यह विचार किया जाता है की उस निर्णय पर भारत का रुख एवम रवैया कैसा रहेगा ।

अब ऐसे समय में जब भारत जी-20 की अध्यक्षता संभालने जा रहा है, उससे ठीक पहले भारत की विश्व नेता के तौर पर यह स्वीकार्यता सकारात्मक संकेत है। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को वैकल्पिक और रीन्युएबल ऊर्जा की ओर तेजी से ले जा रहा है, लेकिन भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं के रास्ते में किसी तरह की बाधा खड़ी करने की कोशिश हुई तो यह विश्व अर्थव्यवस्था के लिए बेहतर नहीं होगा यह बात विश्व को अब समज में आ रही है। इस समय रूस-यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध की वजह से पूरी दुनिया में खाद्य और ऊर्जा आपूर्ति पर बुरा असर पड़ रहा है। जबकि भारत में इस युद्ध की काफी कम असर हुइ है और इस युद्ध के बावजुद आज भारत विश्व की तिसरे नंबर की और सब से तेज गति से आगे बढ रही अर्थव्यवस्था बना हुआ है।



जी-20 की अध्यक्षता

आज का खाद संकट कल का खाद्य संकट न बने इसके लिए जरूरी है कि विकसित देश एक साथ आकर आपूर्ति सुचारु करने का प्रयास करें। भारत लोकतंत्र की जननी है यह बात फिर से स्थापित हो रही है। गत दिनों बाली में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन की मुलाकात के बाद चीन की तरफ से जारी बयान में जिस तरह से अमेरिकी शैली के लोकतंत्र और चीनी शैली के लोकतंत्र की बात की गई थी, उसमें भारतीय लोकतंत्र की स्थापना अति महत्वपूर्ण है। यहां यह बात भी ध्यान में रखना होगा कि अमेरिका हो या चीन, दोनों ही देश इस स्थिति में नहीं हैं कि कह सकें कि यह युद्ध का युग नहीं है, क्योंकि दोनों ही देश युद्ध की स्थिति के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर जिम्मेदार दिखते हैं। इसीलिए भारतीय लोकतंत्र का उदाहरण विश्व के दूसरे देशों को आसानी से समझ आता है।

समग्रतया देखने पर भारत ऐसे समय में जी-20 की अध्यक्षता संभालने जा रहा है, जब संपूर्ण विश्व में तनाव है। अर्थव्यवस्था में कमजोरी दिख रही है और खाद्य एवं ऊर्जा की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। उम्मीद है भारत अपनी अध्यक्षता के दौरान इनका समाधान पेश करेगा। यह बात विश्व इस लिये भी समजता और मानता है क्योंकि पहले प्रधानमंत्रित्व काल में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने विश्व व्यवस्था में परिवर्तन करके बहुध्रुवीय विश्व बनाने की बात की थी और शुरुआत भी की थी वह आज अब दूसरे कार्यकाल में वह साकार होती दिख रही है। इस पर विश्व के विकसित देशों की भी स्वीकृति मिलती दिख रही है।

मंगलवार, 3 जनवरी 2023

गंगा विलास : भारत में शुरु होगी विश्व की सब से लंबी क्रुज यात्रा





देव दीपावली जैसे पर्व को भव्य बनाने और काशी कॉरिडोर के निर्माण के बाद बनारस के पर्यटन में एक और अध्याय जुड़ गया है राष्ट्रीय जलमार्ग-1 एक बार फिर पर्यटकों की गतिविधियों से गुलजार होने वाला है। देश के सबसे लंबी रिवर क्रूज़ की यात्रा की शुरुआत जनवरी 2023 से वाराणसी में होने वाली है, मील रही जानकारी के अनुसार, दुनिया का सबसे लंबा लक्ज़री रिवर क्रूज़ जनवरी 2023 में अपनी यात्रा शुरू करने के लिए पूरी तरह तैयार है, जो लगभग 4000 किमी की दूरी होगी। 

"गंगा विलास" क्रूज के नाम से जाना जाने वाला यह क्रूज उत्तर प्रदेश के वाराणसी को असम के डिब्रूगढ़ से जोड़ेगा और कोलकाता और ढाका से होकर गुजरेगा।  प्रयागराज-हल्दिया जलमार्ग से होते हुए करीब 4000 किलोमीटर दूरी तय करने वाली दुनिया की सबसे लंबी और रोमांचक रिवर क्रूज यात्रा जनवरी महीन में शुरू होने वाली है। वाराणसी से शुरू होने वाली यह यात्रा केवल भारत ही नहीं, बल्कि बांग्लादेश की नदियों से भी होकर गुजरेगी। गंगा के तट से शुरू होने के बाद भारत में गंगा-भागीरथी, हुगली, ब्रह्मपुत्र और वेस्ट कोस्ट नहर सहित 27 नदी प्रणालियों से होकर गुजरने वाली यह यात्रा ब्रह्मपुत्र के किनारे बसे पूर्वोत्तर भारत के शहर डिब्रूगढ़ तक जाएगी।



क्रूज मार्ग:

गंगा विलास क्रूज 50 दिनों की सबसे लंबी नदी यात्रा से गुजरेगा, जिसमें 27 नदी प्रणालियां और विश्व धरोहर स्थलों सहित 50 से अधिक पर्यटक स्थल शामिल होंगे। यह क्रूज दुनिया में किसी एक नदी जहाज द्वारा की जाने वाली सबसे बड़ी नदी यात्रा होगी जो भारत और बांग्लादेश दोनों को दुनिया के नदी क्रूज मानचित्र पर रखेगी। जहाज काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान और सुंदरवन डेल्टा सहित राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों से होकर गुजरेगा। क्रूज आगे वाराणसी से गुजरेगा और बक्सर, रामनगर और गाजीपुर से होते हुए 8वें दिन पटना पहुंचेगा, और भारत में प्रवेश करने से पहले बांग्लादेश में लगभग 1100 किमी की दूरी तय करेगा। इस दौरे का अन्य मुख्य आकर्षण गंगा आरती होगी, दुनिया के सबसे बड़े मैंग्रोव वन के प्राकृतिक अजूबों की जाँच करना, मायोंग का दौरा करना, जिसे भारत में 'काले जादू' के पालने के रूप में जाना जाता है। "गंगा विलास" क्रूज की पहली यात्रा 13 जनवरी को वाराणसी से शुरू होगी, जबकि क्रूज मार्च महिने में असम के डिब्रूगढ़ जिले में बोगीबील पहुंचेगा 


लग्जरी क्रूज शिप में उप्लब्ध सुविधाए

गंगा विलास क्रूज शिप 62.5 मीटर लंबा और 12.7 मीटर चौड़ा है और भारत में बना पहला रिवर क्रूज शिप है।इस गंगा विलास लग्जरी जहाज में स्पा, सनडेक, फ्रेंच बालकनी और 40 सीटर रेस्तरां जैसी सुविधाओं के साथ 18 सुइट्स होंगे।

भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण (IWAI) के एक वरिष्ठ अधिकारी, जो राष्ट्रीय जल-मार्गों (NWs) के लिए जिम्मेदार एजेंसी है, ने कहा कि एक निजी खिलाड़ी द्वारा संचालित क्रूज एक नियमित सुविधा होगी। अधिकारी ने कहा, "अंतर्देशीय जलमार्गों के विकास और रखरखाव पर सरकार के बढ़ते ध्यान के कारण, हमने गहराई बढ़ाने, यात्री और मालवाहक जहाजों दोनों के सफल संचालन के लिए आवश्यक नेविगेशन सुविधाएं और जेटी स्थापित करने के लिए कई परियोजनाएं शुरू की हैं।" अधिकारियों ने कहा कि भारत-बांग्लादेश प्रोटोकॉल मार्ग के विकास ने क्रूज सेवा की योजना बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिखायेंगे हरी झंडी

उत्तर प्रदेश के वाराणसी से बांग्लादेश होते हुए असम के डिब्रूगढ़ तक दुनिया की सबसे लंबी नदी क्रूज को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 13 जनवरी को झंडी दिखाकर रवाना करेंगे।  

आईडब्ल्यूएआई के एक अधिकारी ने कहा, "हमारी सभ्यता नदियों के किनारे विकसित हुई है और इसलिए नदी परिभ्रमण का उपयोग करने वाले पर्यटकों को बेहतर अनुभव मिलेगा और वे हमारी संस्कृति और विरासत को समझेंगे।" हाल ही में शिपिंग और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने कहा था कि क्रूज सेवाओं सहित तटीय और नदी शिपिंग का विकास सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में से एक है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीने कहा था कि केंद्रने 100 राष्ट्रीय जलमार्गों को विकसित करने का काम अपने हाथ में लिया है और लक्ष्य इन जलमार्गों पर चलने वाले विश्व स्तरीय क्रूज को देखने के अलावा कार्गो की आवाजाही को भी देखना है। “प्राचीन काल में, व्यापार और पर्यटन के लिए जलमार्गों का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता था। इसलिए कई शहर नदियों के किनारे आ गए और वहां औद्योगिक विकास हुआ।

मंगलवार, 27 दिसंबर 2022

वैश्विक वर्चस्व कायम करने की होड़ में भारत से पिछड़ता चीन




भारत सदीओ से शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के मंत्र का अनुपालनकर्ता देश है. यह विचार आज भी भारत के आंतरराष्ट्रिय संबंधो में झलकता है। भारत न तो कोइ अनावश्यक ऐसे बयान देता है और न ही ऐसी कोइ हरकत करता है की जिससे सीमा पर तनाव जैसी स्थिति व्यक्त हो हालांकी भारत के सामने ऐसी कोइ भी चुनौती खडी कर दी जाती है जिससे भारत की संप्रभुता और अखंडीतता पर प्रश्न हो तब भारत प्रश्न खडे करने वाले को उसकी भाषा में उत्तर देता आया है और वर्तमान में ज्यादा मजबुती से देता है और देने के लिये सदैव तैयार रहेता है। इसका सबसे उत्कृष्ट उदाहरण है पोखरण-2 के बाद भारत द्वारा ‘नो फर्स्ट यूज’ और ‘मिनिमम डेटरेंस’ की निति को अपनाया है। परंतु यदि किसी दूसरे देश द्वारा युद्धोन्मादी अभिव्यक्ति का संदर्भ हो तो उसके अनुरूप प्रत्युत्तर राष्ट्रीय दायित्व की श्रेणी में आता है। 



चीन और भारत 

चीन भारत की स्वतंत्रता के बाद भारत के साथ 1962 में एक युद्ध लड चुका है और आज भी ऐसा मानता है की भारत 1962 का भारत ही है और भारत-चीन की सीमाओ पर समयांतर पर भारत को उकसाने के प्रयास करता रहेता है चाहे वो डोकलाम हो, गलवान हो या वर्तमान में उसका दुस्साहस जहाँ भारतीय सैनिकोने चीन के सैनिको को अपने शौर्य का परचा देते हुए भगाया ऐसा तवांग हो चीन ऐसी हरकतो को लगातार करता रहेता है। 

वर्तमान में भारत का सब से बडा व्यापारिक पार्टनर है, और विश्व की द्वितिय नंबर की आर्थिक शक्ति भी है और अगर भारत की और देखे तो भारत वर्तमान विश्व में सब से तेज गति से बढ रही आर्थिक व्यवस्था है। भारत न केवल सब से तेज गति से बढती हुई आर्थिक व्यवस्था है अपितु संरक्षण,अंतरिक्ष,उत्पादन, वैश्विक निवेश, सैन्य सरंजाम जैसे अनेक क्षेत्रो में समग्र विश्व को अपना लोहा मनवा रहा है, और वैश्विक कोरोना महामारी के बाद जिस तरह से चीन के विरुद्ध विश्व में विमर्श चला और चीन में से विदेशी कंपनीयां अपना व्यवसाय बंध करके भारत में आ रही है इसे देखकर और ऐसे वैश्विक वातावरण में चीन विश्व और एशिया में भारत को अपना प्रतिद्वंद्वी मानता है और इस कारण से चीन ऐसी हरकते करता रहेता है जिससे विश्व में भारत की शाख कम हो और भारत एक कमजोर राष्ट्र दिखे इस परिप्रेक्ष्य में भारत के साथ चीन के संबंधो को और चीन की मंशा की तरफ द्रष्टि करना आवश्यक है  



चीन की दक्षिण प्रशांत में वर्चस्व की राजनीति

चीन की हरकतो को देखे तो वर्ष 2020 की गलवान हिंसा के बाद चीनी नेता के वक्तव्यों को सामान्य बातचीत की शैली भर नहीं मान सकते।चीन वर्तमान में सख्ती के उस दौर में आ गया है, जहां उसकी हरकतो में आक्रामकता अधिक दिख सकती है। हाल में हुए कम्युनिस्ट पार्टी की कांग्रेस में इसे और बल मिला है, जब शी जिनपिंग को लगातार तीसरी बार पार्टी महासचिव चुना गया। पिछले दशकों में चीन ने साम्यवादी शासन के बावजूद शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन का एक रास्ता खोज लिया था, जिसमें एक नेता दस वर्षों और अधिकतम 70 वर्ष की उम्र तक पार्टी का महासचिव और देश का राष्ट्रपति होता था। लेकिन शी जिनपिंगने इसे पूरी तरह से बदल दिया है। अब शी जिनपिंग तीसरे कार्यकाल के साथ पार्टी के सर्वशक्तिमान नेता बन गए हैं, इसलिए चीन तानाशाही, आक्रामकता और युद्धोन्मादी अभिव्यक्ति का शिकार अधिक रहेगा। दुसरी तरफ देखे तो चीन के सामने घरेलू राजनीति में विरोध लगातार बढ रहा है, वर्तमान में सामान्य नागरिको द्वारा जीरो कोविड नीति का व्यापक तौर पर विरोध होने के बाद उस नीति को बदलना पडा यह देखने के बाद और आंतरिक विरोध से विश्व का ध्यान भटाकाने तथा आंतरिक विरोध को दबाने तथा दक्षिण प्रशांत में वर्चस्व की राजनीति करने के अलावा चीन अब एक खतरनाक विदेश और आर्थिक नीति अपनाने की ओर बढ़ चुका है। चीन के द्वारा लिये जा रहे कदमो की तरफ द्रष्टि करे तो हम देख सकते है कि इसका उद्देश्य है- 'चीन को दुनिया से स्वतंत्र और दुनिया को चीन पर निर्भर बनाना'। एक तरफ आंतरिक विरोध की स्थिति है और दुसरी और पुरा विश्व रुस-युक्रेन युद्ध में चीन की भुमिका को संदेह की नजर से देखता है तब चीन क्या करेगा यह बडा प्रश्न है। यद्यपि यूक्रेन में रूस के लिए बनती प्रतिकूल परिस्थितियों के दृष्टिगत चीन हिंद-प्रशांत क्षेत्र में थोड़ा संभलकर कदम बढ़ाएगा, लेकिन वह अपने मौलिक चरित्र से पीछे हटना नहीं चाहेगा।


शी जिनपिंग की आंतरिक चुनौती

वर्तमान में चीन की जीरो कोविड नीति के व्यापक विरोध के कारण से उस नीति में बदलाव लाना पडा उस कदम से विश्व में चीन और शी जिनपिंग की छवि कमजोर राष्ट्र और कमजोर राष्ट्रप्रमुख है ऐसी बन रही है जिससे शी जिनपिंग अपनी छवि और अपनी नेतृत्व क्षमता को मजबूती से देश के अंदर और बाहर प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहे हैं। इसके पीछे भी कई कारण हैं। चीन के सामान्य लोग एवम आर्थिक मामलो के विशेषज्ञ मानते हैं कि सख्त जीरो कोविड नीति के तहत सख्ती से किए गए लाकडाउन ने चीनकी अर्थव्यवस्था को चौपट कर दिया है। वैसे चीन की साम्यवादी सरकार के इतिहास को देखे तो पता चलता है कि जब भी सामान्य नागरिको की तरफ सरकार के कीसी कदम का विरोध होता है तब नागरिकों की तरफ से भारी विरोध न हो इसके लिए नागरिक अधिकारों का दमन किया गया है और वर्तमान शासक उसी इतिहास को दोहरायेंगे। इस दिशा में चीन की साम्यवादी सरकार का पहला कदम होता है बलपूर्ण धमकी या अपनी ताकत को प्रदर्शित करने के लिए वक्तव्यों के माध्यम से सेना को छद्म निर्देश और लोगों को संदेश पहुंचाना। जैसे चीन का इतिहास रहा है वैसे ही आंतरिक स्थितियों को नियंत्रण में रखने के लिए सरकार का विरोध करने वालों के लिए सख्त सजा के प्रविधान किए गए हैं, लेकिन फिर भी इंटरनेट मीडिया के माध्यम से चीन के नागरिक विरोध करते हुए स्पष्ट तौर पर देखे जा सकते हैं और चीन की सरकार की बेचैनी भी।

चीन की सरकार आंतरिक मामलो में दिन ब दिन सख्त होती जा रही है यहाँ तक की चीनी सोश्यल मीडिया साइट ‘वीबो’ पर मंडारिन भाषा में की गइ सरकार विरोधी पोस्ट्स हटा दि जाती हैं। आंतरिक विरोध को दबाने में जुटे शी जिनपिंग चाइनीज आर्मी पीएलए को आगामी चार वर्षों में विश्व स्तरीय सेना बनाना चाहते हैं। इसके साथ ही शी जिनपिंग यूनीफिकेशन और रीजनल युद्ध को वरीयता देते हुए दिख रहे हैं। शी जिनपिंग प्रत्येक स्तर पर अपनी सेना को युद्ध के लिए तैयार रहने के साथ-साथ शक्तिशाली बनाने की मंशा पाले हुए हैं। इसलिए भारत के विरुद्ध चाइनीज आर्मी के दुस्साहस का भारत की तरफ से उनकी ही भाषा में उत्तर दिया जाता है अथवा सख्त प्रतिक्रिया दी जाती है तो चीन की चिंता बढ जाती है,जिसके निश्चित कारण हैं। अगर वास्तविक स्थिति देखे तो चीन भी यह जान गया है की आज का भारत 1962 का भारत नहि है इसलिए चीन भारत के साथ कोई बड़ा युद्ध करना कदापि नहीं चाहेगा,लेकिन वह भारत को दबाव में रखने की कोशिश करता रहेगा। मुख्य रूप से तो शी जिनपिंग के निशाने पर ताइवान है, परंतु भारत उपमहाद्वीपीय शक्ति के रूप में स्वीकार्य हो रहा है और भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा निरंतर बढ़ रही है। इसलिए चीन यदि रीयूनीफिकेशन के बहाने ताइवान और तिब्बत को निशाना बनाने की कोशिश कर सकता है तो वह तवांग यानी अरुणाचल और सिक्किम तक अपनी हरकतों के दायरे का विस्तार भी इस जैसी किसी छद्म नीति के जरिये कर सकता है।



भारत को सतर्क रहना होगा

वैसे वर्तमान युग यथार्थवाद से कहीं अधिक प्रतीकवाद और संदेहवाद का युग है और चीन प्रतीकवाद और संदेहवाद का सहारा अधिक ले रहा है। हालांकि भारत ‘ग्लोबल वैल्यू चेन’ में सक्रिय भूमिका निभाने के साथ एक एशियाइ शक्ति के रूप में उभरता हुआ दिख रहा है ऐसे में भारत को भी सतर्क रहना होगा क्योंकि चीन बहुआयामी से बहुरूपिये तक की भूमिका में समग्र विश्व के समक्ष नजर आता है जिसमें व्यापार के ‘वेपनाइजेशन’ से लेकर ‘डिप्लोमैटिक सिंबोलिज्म’ तक बहुत कुछ शामिल है। अत: भू-राजनीतिक खेल अब केवल दो शब्दों तक ही सीमित नहीं रह गया है, अपितु बहुत कुछ है जो द्रश्यमान नहीं है। इसलिए केवल आंख और कान ही नहीं खुले रखने होंगे, बल्कि मस्तिष्क को प्रति क्षण सक्रिय और संवेदनशील बनाए रखना होगा।

पिछले दिनों भारत और चीन, दोनों ही देशों की तरफ से दो बयान आए। एक बयान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की तरफ से था जो उन्होंने दिल्ली में सैन्य कमांडरों के सम्मेलन को संबोधित करते हुए दिया था। उनका कहना था, ‘भारत एक शांति प्रिय देश है जिसने कभी किसी देश को ठेस पहुंचाने की कोशिश नहीं की, परंतु यदि देश के अमन-चैन को भंग करने की कोई कोशिश की जाती है तो उसका मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा।’ दूसरा बयान चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग आठ नवंबर को दे चुके है वो है।वैश्विक राजनितिक विशेषज्ञ भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का बयान चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के उस बयान का ही प्रत्युत्तर मान रहे है।

सेंट्रल मिलिट्री कमीशन (सीएमसी) के संयुक्त अभियान कमान मुख्यालय में सैन्य कर्मियों को संबोधित करते हुए शी जिनपिंगने कहा था ‘चीन की राष्ट्रीय सुरक्षा बढ़ती अस्थिरता व अनिश्चितता का सामना कर रही है। ऐसे में हमें युद्ध लड़ने और जीतने के लिए तैयार रहना चाहिए।’ शी जिनपिंगने उसी समय चीनी सेना (PLA) को 'सैन्य प्रशिक्षण और युद्ध की तैयारियों को बढ़ाने’ का आह्वान भी किया। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इस बयान पर सवाल उठता है कि क्या ये बयान औपचारिक थे जो सामान्य स्थितियों में भी देशों के माध्यम से अपने स्टेटस को व्यक्त करने के लिए दिए जाते रहते हैं या फिर इनके निहितार्थ कुछ और हैं ?

कैसे पिछड रहा है चीन ?

इस पुर्व भुमिका के बाद प्रश्न यह उठ रहा है की चीन वैश्विक वर्चस्व कायम करने की उसकी दौड में भारत से कैसे पिछड रहा है या पिछड गया है ? युरोपिय युनियन के और अन्य देशोने जिस तरह चीन से किनार करने की शुरुआत की है और वैश्विक महासत्ता अमेरिका के साथ मिलकर जिस तरह युक्रेन का समर्थन कर, ताइवान को शस्त्रो को देकर तथा तवांग में चीन के दुस्साहस के बाद भारत का समर्थन कर के जो चित्र प्रस्तुत किया है  उसको देख यह कहना गलत नहि होगा की चीन वैश्विक वर्चस्व कायम करने की अपनी मंशा में भारत से पिछड गया है 

शनिवार, 24 दिसंबर 2022

भारत में चलता था ढाइ रुपये का नोट

 



भारत में करंसी का इतिहास 2500 साल पुराना हैं। बात सन 1917 की है जब 1 रुपया 13 डॉलर के बराबर हुआ करता था।  वर्ष 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ तब 1 रूपया 1 डॉलर कर दिया गया। स्वतंत्रता के समय देश पर कोई कर्ज नहीं था। वर्ष 1951 में पहली पंचवर्षीय योजना के लिए सरकार ने कर्ज लिया और इसके बाद यह सिलसिला चलता रहा। 1 रूपए में 100 पैसे होंगे, ये बात सन 1957 में लागू की गई थी। पहले इसे 16 आने में बांटा जाता था। अगर अंग्रेजों का बस चलता तो आज भारत की करंसी पाउंड होती लेकिन रुपए की मजबूती के कारण ऐसा संभव नहीं हुआ। वर्ष 1948 से वर्ष 1966 के बीच रुपया लगातार गिरता चला गया और इंदिरा गांधीने 6 जुन1966 के दिन रुपये का अवमुल्यन करने की घोषणा कर दी और 1 डोलर के सामने रुपये की किमत 7.50 रुपये हो गयी जो अवमूल्यन से पहले 4.76 रुपये थी, रुपया गिरते गिरते वर्ष 1975 में 1 डॉलर 8.39 रूपए हो गया, रुपये के गिरने कि यह परम्परा ऐसी चली की रुपया 1985 में 1 डॉलर 12 रूपए तक महेंगा हो गया।

यह वो दौर था जब देश में राजनितिक अस्थिरता चारो तरफ दिख रही थी, भारत की अर्थ व्यवस्था जैसे ढह जायेगी ऐसे आसार दिख रहे थे, 1991 आते आते पुरा देश बेतहाशा मंहगाई की जंजिर में जैसे फंसता जा रहा था, यह वो समय था जब कभी भारतीय रीजर्व बेंक के गवर्नर रहे प्रतिष्ठीत अर्थशास्त्री मनमोहंसिन्ह भारत के अर्थमंत्री बने, विकास दर कम होता जा रहा था, ऐसा माना जाता है कि यह भारतीय अर्थव्यवस्था का सबसे कठिन दौर था, इस दौर में राजकोषीय घाटा, सकल घरेलू उत्पाद का 7.8%, ब्याज भुगतान सरकार के कुल राजस्व संग्रह का 39%, चालू खाता घाटा (CAD) सकल घरेलू उत्पाद का 3.69% और थोकमूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति लगभग 14% थी और फॉरेन रिर्जव कम होने की कगार पर आ गया था, थोडे दिन तक कि आयात का बिल दे पाये इतना हो गया था भारत का फॉरेन रिर्जव भंडार, इन सब परिस्तिथियों में भारत विदेशियों को भुगतान नही कर पा रहा था जिसके कारण अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा भारत को दिवालिया घोषित किया जा सकता था, अतः इन सभी समस्याओं से निपटने के लिए सरकार ने भारतीय मुद्रा का अवमूल्यन किया और विनिमय दर 24.58 रूपये/1अमेरिकी डॉलर हो गयी। वित्तमंत्री मनमोहनसिन्ह के उपाय कारगर नहि हो रहे थे, 1993 में  एक डॉलर 31.37 रूपए। 2000-2010 के दौरान यह एक डॉलर की कीमत 40-50 रूपए तक पहुंच गई। 2013 में तो यह हद पार हो गई और यही एक डॉलर की कीमत 65.50 रूपए तक पहुंच गई।

भारत में प्रथम बार कागज की नोट

RBI, ने जनवरी 1938 में पहली बार 5 रूपए की पेपर करंसी छापी थी जिस पर किंग जार्ज-6 का चित्र था। इसी साल 10,000 रूपए का नोट भी छापा गया था लेकिन 1978 में इसे पूरी तरह बंद कर दिया गया। आजादी के बाद पाकिस्तान ने तब तक भारतीय मुद्रा का प्रयोग किया जब तक उन्होनें काम चलाने लायक नोट न छाप लिए।

भारतीय नोट पर महात्मा गांधी की जो फोटो छपती हैं वह तब खींची गई थी जब गांधीजी, तत्कालीन बर्मा और भारत में ब्रिटिश सेक्रेटरी के रूप में कार्यरत फ्रेडरिक पेथिक लॉरेंस के साथ कोलकाता स्थित वायसराय हाउस में मुलाकात करने गए थे।

यह फोटो 1996 में नोटों पर छपनी शुरू हुई थी। इससे पहले महात्मा गांधी की जगह अशोक स्तंभ छापा जाता था। भारत के 500 और 1,000 रूपये के नोट नेपाल में नहीं चलते। 500 का पहला नोट 1987 में और 1,000 का पहला नोट 2000 में बनाया गया था।

भारत में 75, 100 और 1,000 रूपए के भी सिक्के छप चुके हैं।1 रूपए का नोट भारत सरकार द्वारा और 2 से 1,000 तक के नोट RBI द्वारा जारी किये जाते हैं। एक समय पर भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए 10 का नोट 5thpillar नाम की गैर सरकारी संस्था द्वारा जारी किए गए थे।

10 रूपये के सिक्के को बनाने में 6.10 रूपए की लागत आती हैं। हर सिक्के पर सन के नीचे एक खास निशान बना होता हैं आप उस निशान को देखकर पता लगा सकते हैं कि ये सिक्का कहां बना है। मुंबई – हीरा ◆, नोएडा – डॉट. हैदराबाद – सितारा ★ कोलकाता- कोई निशान नहीं। नोटों पर सीरियल नंबर इसलिए डाला जाता हैं ताकि आरबीआई(RBI) को पता चलता रहे कि इस समय मार्केट में कितनी करंसी हैं। रूपया भारत के अलावा इंडोनेशिया, मॉरीशस, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका की भी करंसी हैं।



2 जनवरी 1918 में ब्रिटिश सरकार ने एक ढाई (2.5) रुपए का नोट जारी किया था. साल 2018 में इस दुर्लभ नोट के सौ साल पूरे हुए हैं. इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक ये नोट सफेद कागज़ पर छापा गया था और इसपर जॉर्ज पंचम की मुहर छपी थी. इस नोट पर ब्रिटिश फाइनेंस सेक्रेट्री एम एम एस गब्बी के सिग्नेचर थे

ये नोट सात सर्किल्स के हिसाब से प्रिफिक्स थे. ये सात सर्किल कानपुर (c), बॉम्बे (B), कराची (K), लाहौर(L), मद्रास (M) और रंगून (R). ये नोट शुरुआत में इन इलाकों में ही चलता था. एक समय इस ढाई रुपए की कीमत 1 डॉलर के बराबर थी.

जिस दौर में ये ढाई रुपए का नोट जारी हुआ था उस समय भारत में 'आना' सिस्टम था. एक रुपए में सोलह 'आने' होते थे. इसका मतलब हुआ कि ढाई रुपए के नोट में 40 'आने' होते हैं.

साल 1926 में ब्रिटिश सरकार ने ये नोट बंद कर दिया और दोबारा जारी नहीं किया. अब ये नोट दुर्लभ बन गया है. इसके बाद एक नीलामी में ढाई रुपए का ये नोट 6,40,000 का बिका था.

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