रविवार, 20 अगस्त 2023

आदित्य L1 के बाद गगनयान ISRO की अंतरिक्ष में बडी छलांग

 


अंतरिक्ष में अपने पहले मानव मिशन गगनयान को लॉन् करने की दिशा में 20 जुलाई को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) को एक बहुत बड़ी सफलता मिली थी गगनयान मिशन के सर्विस मॉड्यूल प्रोपल्शन सिस्टम (SMPS) का 20 जुलाई को सफलतापूर्वक परीक्षण किया गया सर्विस मॉड्यूल प्रोपल्शन सिस्टम गगनयान ऑर्बिटल मॉड्यूल की आवश्यकताओं को पूरा करता है हॉट टेस्ट के अंतिम कॉन्फिग्रेशन का आयोजन इसरो के तमिलनाडु में महेंद्रगिरी स्थित प्रोपल्शन कॉम्प्लेक् में किया गया था गगनयान मिशन को अगले वर्ष लॉन् किया जाना है, जिसे लेकर इसरो के वैज्ञानिकों और कर्मचारीओं में अत्यांतिक उत्तेजना और रोमांच है और सभी इस मिशन की तैयारी पूरी कर रहे है 

गगनयान मिशन के लिए केंद्र सरकारने इसरो को 10 हजार करोड़ की राशि दे चुकी है. गगनयान भारत का अंतरिक्ष में पहला मानव मिशन है। इस मिशन की गंभीरता ध्यान में रखते हुए इसरो काफी सावधानी बरत रहा है और सभी परिक्षण बारीकी से कर रहा है। मिशन गगनयान मानव को अंतरिक्ष में भेजने का ISRO का महत्वाकांक्षी आयोजन है, इस मिशन के अंतर्गत अंतरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी से करीब 400 किलोमीटर ऊपर स्पेस में भेजा जायेगा. इस संबंध में भारतीय वायुसेना की मदद भी ली जा रही है। वायुसेना से अंतरिक्ष यात्री चुनने के लिए कहा गया है।

गगनयान इसरो के तीन अंतरिक्ष मिशन का एक ग्रुप है। गगनयान इसरो द्वारा बनाया गया एक स्पेसक्राफ्ट है. इसमें दो अभियान मानव रहित होंगे जबकि तीसरे में मानव को अंतरिक्ष में भेजा जाना है. बताया जा रहा है कि इस मिशन में तीन अंतरिक्ष यात्री को अंतरिक्ष में भेजे जाएंगे, जिसमें एक महिला रोबोट समेत दो पुरुष और एक महिला होंगी. इसरो की योजना पृथ्वी की सबसे करीबी कक्षा (लोअर ऑर्बिट) में मानव यान भेजने की है। गगनयान 5-7 दिनों के लिए पृथ्वी के ऊपर 300-400 किमी की ऊंचाई पर एक लो अर्थ ऑर्बिट में पृथ्वी का चक्कर लगाएगा और वापस लौटेगा। भारत का गगनयान मिशन सफल रहा तो अमेरिका, रूस और चीन जैसे चुनिन्दा देशों की क्लब में भारत भी शामिल हो जाएगा।

इस अंतरिक्ष मिशन की घोषणा पहली बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2018 में राष्ट्र के नाम अपने स्वतंत्रता दिवस के संबोधन में की थी। मानवयुक्त मिशन से पहले, इसरो ने गगनयान मिशन के हिस्से के रूप में अंतरिक्ष में दो मानव रहित मिशन भेजने की भी योजना बनाई है। पहला मानव रहित मिशन दिसंबर 2020 में भेजा जाना था और दूसरा मिशन जून 2021 के लिए निर्धारित किया गया था। हालांकि, कोरोना वायरस महामारी के कारण इसरो के काम और संचालन में व्यवधान के कारण पहले मानवरहित मिशन में देरी हुई है। अब इस मिशन के साल 2023-2024 में लॉन्च किया जाएगा। इंडिया के इस स्पेस कार्यक्रम की कुल लागत 10000 करोड़ रुपये से कम होने की उम्मीद है।

गगनयान कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य मानव को भारतीय प्रक्षेपण यान पर पृथ्वी की निचली कक्षा में भेजने और उन्हें सुरक्षित रूप से पृथ्वी पर वापस लाने की क्षमता को प्रदर्शित करना है। गगनयान प्रोजेक्ट में 3 सदस्यों के चालक दल को 400 किमी की कक्षा में 3 दिनों के मिशन के लिए लॉन्च करके और सुरक्षित रूप से पृथ्वी पर वापस लाने के उन्हें भारतीय समुद्री जल में उतारकर, भारत द्वारा मानव अंतरिक्ष उड़ान क्षमता के प्रदर्शन की परिकल्पना की गई है। भारतीय इसरो जिस अंतरिक्ष यान को विकसित कर रहा है उसमें रूस अंतरिक्ष यात्रियों के प्रशिक्षण में हमारी मदद कर रहा है। एचएसएफसी मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम के तहत गगनयान की पहली विकास उड़ान को लागू करने के लिए मौजूदा इसरो केंद्रों का समर्थन लेगा। अंतरिक्ष यात्रियों के बैठने वाली जगह क्रू मॉड्यूल का निर्माण पूरा हो चुका है। गगनयान के पहले चालक दल के मिशन (क्रू मिशन) को मूल रूप से दिसंबर 2021 में इसरो के LVM3 पर लॉन्च करने की योजना थी, लेकिन इसमें 2024 से पहले लॉकडाउन के कारण देरी हुई है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) अपने पहले मानव अंतरिक्ष यान (गगनयान) की तैयारी में लगा हुआ है।

गगनयान कार्यक्रम का उद्देश्य मानव को भारतीय लॉन्च वाहन पर पृथ्वी की निचली कक्षा (LEO) में भेजने और उन्हें सुरक्षित रूप से पृथ्वी पर वापस लाने की क्षमता प्रदर्शित करना है। COVID प्रतिबंधों के कारण भारत के गगनयान कार्यक्रम में थोड़ी देरी हुई, लेकिन अब 2023-24 तक मिशन को हासिल करने की तैयारी जोरों पर है।

गगनयान परियोजना के तहत 3 सदस्यों के चालक दल को 400 किमी की कक्षा (ऑर्बिट) में 3 दिनों के मिशन के लिए लॉन्च करके और मिशन पूरा होने के बाद उन्हें भारतीय समुद्री जल में सुरक्षित और सफल लैंडिंग करवाना है। अतः इस गगनयान कार्यक्रम का उद्देश्य भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को मिशन पूरा होने पर सुरक्षित रूप से पृथ्वी पर वापस लाकर इसरो द्वारा भारत की मानव अंतरिक्ष उड़ान क्षमता के प्रदर्शन को साबित करना है।


सोमवार, 14 अगस्त 2023

संसदीय विशेषाधिकार और विशेषाधिकार समिति क्या हैं?


 


संसद के हाल ही में समाप्त हुए मानसून सत्र में, कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी और AAP के राघव चड्ढा को विशेषाधिकार समिति की रिपोर्ट लंबित होने तक सदन से निलंबित कर दिया गया था।

संसदीय विशेषाधिकार क्या हैं?

संसद और उसके सदस्यों (सांसदों) के पास कुछ अधिकार और छूट हैं जो उन्हें अपनी विधायी भूमिकाओं में प्रभावी ढंग से कार्य करने में सक्षम बनाती हैं। इन्हें संसदीय विशेषाधिकार कहा जाता है।

जब संविधान निर्माताओंने हमारा संस्थापक दस्तावेज़ बनाया, तो उसमें प्रावधान किया गया कि संसदीय विशेषाधिकारों को संसद द्वारा बनाया गये एक कानून में निर्दिष्ट किया जाएगा। और जब तक राष्ट्रीय विधायिका ऐसा कानून नहीं बनाती, तब तक जो विशेषाधिकार यूनाइटेड किंगडम की संसद के निचले सदन हाउस ऑफ कॉमन्स को प्राप्त होते है वह प्राप्त होंगे। 1978 में, संसद ने एक संवैधानिक संशोधन द्वारा हाउस ऑफ कॉमन्स के संदर्भ को हटा दिया और उसने अभी तक इन विशेषाधिकारों को निर्दिष्ट करने वाला कोई कानून नहीं बनाया है। इसलिए, संसदीय विशेषाधिकार संविधान के प्रावधानों, क़ानूनों, सदन की प्रक्रियाओं और सम्मेलनों का मिश्रण हैं। उदाहरण के लिए, संविधान निर्दिष्ट करता है कि सांसदों को बोलने की आजादी है और वे संसद में जो कुछ भी कहते हैं या वोट देते हैं, उसके खिलाफ उन्हें न्यायिक कार्यवाही से छूट मिलती है।

साथ ही, सिविल प्रक्रिया संहिता उन्हें संसदीय सत्र के दौरान और उसके शुरू होने से पहले और समाप्त होने के बाद एक निर्दिष्ट अवधि के लिए नागरिक मामलों के तहत गिरफ्तारी और हिरासत से बचाती है। 

विशेषाधिकार हनन पर संसद कैसे कार्रवाई करती है?

संसद का प्रत्येक सदन अपने विशेषाधिकारों का संरक्षक है। लोकसभा और राज्यसभा को अपने सदस्यों के विशेषाधिकारों का उल्लंघन करने या सदन की अवमानना ​​करने वाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ उचित कार्रवाई करने का अधिकार है। ऐसे दो तंत्र हैं जिनके द्वारा संसद इन मामलों को उठाती है। पहला यह कि कोई सदस्य इस मुद्दे को सदन में उठाता है और फिर सदन इस पर निर्णय लेता है। 

लेकिन लोकसभा और राज्यसभा आमतौर पर मामले को विस्तृत जांच के लिए अपनी विशेषाधिकार समिति को भेजती हैं। समिति सदन को कार्रवाई की सिफारिश करती है जिसे बाद में स्वीकार कर लिया जाता है।

वर्तमान में लोकसभा समिति के अध्यक्ष सांसद सुनील कुमार सिंह हैं, और राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश उच्च सदन की समिति के प्रमुख हैं।

सांसद विशेषाधिकार हनन के मामलों को अपने-अपने सदन के पीठासीन अधिकारियों के संज्ञान में भी ला सकते हैं। इसके बाद पीठासीन अधिकारी यह निर्णय ले सकते हैं कि मामले को विशेषाधिकार समिति को भेजा जाए या नहीं

समिति के पास किस तरह के मामले आते हैं?

आमतौर पर समितियां उन मामलों की जांच करती हैं जहां सांसद शिकायत करते हैं कि किसी बाहरी व्यक्ति ने उनके विशेषाधिकार का उल्लंघन किया है। उदाहरण के लिए, लोकसभा समिति ने हाल ही में ऐसे कई उदाहरण देखे जिनमें सांसदों ने आरोप लगाया कि सरकारी अधिकारियों ने या तो प्रोटोकॉल का उल्लंघन किया है या अनुत्तरदायी रहे हैं। लेकिन इस साल सांसद अन्य सांसदों द्वारा विशेषाधिकार हनन को लेकर भी सवाल लेकर आए हैं।

लोकसभा समिति के एजेंडे में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान भ्रामक, अपमानजनक, असंसदीय और भेदभावपूर्ण बयान देने के लिए कांग्रेस पार्टी के सांसद राहुल गांधी के खिलाफ भाजपा सांसद डॉ. निशिकांत दुबे और प्रह्लाद जोशी द्वारा उठाया गया मामला है।

राज्यसभा में सांसदों ने अपने सहयोगियों के विरुद्ध विशेषाधिकार हनन के आठ मामले लाए हैं। ये अनधिकृत कार्यवाही की वीडियो रिकॉर्डिंग, अव्यवस्थित आचरण, बार-बार एक जैसे नोटिस प्रस्तुत करने, सभापति के विरुद्ध अपमानजनक टिप्पणियां, सदन की कार्यवाही के बारे में मीडिया को गुमराह करने और सांसदों की सहमति के बिना उनके नाम प्रस्ताव में शामिल करने के बारे में हैं।

समिति क्या कार्रवाई कर सकती है?

विशेषाधिकार समिति के पास सदन को सलाह, फटकार, निलंबन और, दुर्लभ मामलों में, सदन से निष्कासन करने की सिफारिश करने की शक्ति है। दोनों सदनों की समिति द्वारा अपनाई जाने वाली परंपरा यह है कि यदि जिस सांसद के खिलाफ विशेषाधिकार का मामला उठाया गया है, और वह माफी मांगता है, तो मुद्दे को शांत कर दिया जाता है। 

1978 में एक दुर्लभ मामले में, लोकसभा विशेषाधिकार समिति ने तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी को निष्कासित करने की सिफारिश की। अगली लोकसभा ने सिफारिश को रद्द कर दिया और कहा कि उसे उम्मीद है कि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति नहीं होगी।

राज्यसभा विशेषाधिकार समिति ने अन्य सांसदों द्वारा किए गए व्यवधान के कारण सदन की कार्यवाही में भाग लेने के लिए सांसदों के विशेषाधिकार के उल्लंघन के मुद्दे की जांच की है। 2009 की अपनी रिपोर्ट में, इसने कहा कि एक राजनीतिक दल के वरिष्ठ सदस्यों पर अपने सांसदों को सदन को बाधित करने से रोकने की जिम्मेदारी है। इसकी 2014 की रिपोर्ट में सदन की कार्यवाही में व्यवधान को रोकने के लिए कई कदमों की सिफारिश की गई थी। हाल ही में उच्च सदन की कार्यवाही को अनधिकृत रुप से वीडियो रिकॉर्डिंग करने के लिए, कांग्रेस सांसद रजनी अशोकराव पाटिल विशेषाधिकार के उल्लंघन के दोषी थे, विषेशाधिकार समितिने सिफारिश की कि उन्हे निलंबित किया जाय और उनको निलंबित किया गया था।

मंगलवार, 4 जुलाई 2023

क्या है शांघाइ कोओपरेशन ओर्गेनाइजेशन (एससीओ, SCO)




शांघाई कोओपरेशन ओर्गेनाइजेशन अथवा एससीओ (SCO)  राजनीति, अर्थशास्त्र, विकास और सेना के मुद्दों पर केंद्रित एक अंतर सरकारी संगठन है। इसकी शुरुआत 1996 में चीन, रूस, कजाकिस्तान, ताजिकिस्तान और किर्गिस्तान के नेताओं द्वारा 'शंघाई फाइव' के रूप में हुई थी। 2001 में sco यानी शांघाइ कोऑपरेशन ओर्गेनाइजेशन की रचना 2001 में हुई, आरंभ में इस संगठन में रशिया, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, उजबेकिस्तान और चीन को मिलाकर कुल 6 सदस्य देश थे। 2017 में भारत और पाकिस्तान के जुड़ने से स्थायी सदस्य देशों की संख्या 8 हुई आर्मेनिया, अजरबेजान, कम्बोडिया, नेपाल, श्रीलंका और तुर्कीये यह 6 देश SCO के डायलॉग पार्टनर है और अफ़गानिस्तान, बेलारूस, इरान और मंगोलिया इसके निरिक्षक देश है नवंबर 2021 में अब तक निरिक्षक रहे इरान को स्थायी सदस्य के रूप में जोडने की प्रक्रिया शुरु की गई थी। आम तौर पर एससीओ को उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (NATO) के पूर्वी समकक्ष के रूप में देखा जाता है। अपने भौगोलिक महत्व के कारण एशिया में एससीओ की रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण भूमिका है - यह उसे मध्य एशिया को नियंत्रित करने और क्षेत्र में अमेरिकी प्रभाव को सीमित करने में सक्षम बनाता है। वर्तमान में संगठन के आठ सदस्य देश शामिल हैं। 2005 में कज़ाकस्तान के अस्ताना में हुए सम्मेलन में भारत, ईरान, मंगोलिया और पाकिस्तान के प्रतिनिधियों ने भी पहली बार हिस्सा लिया इन देशों की सूची में भारत, पाकिस्तान और उज्बेकिस्तान सहित चार पर्यवेक्षक देश और छह संवाद भागीदार देश शामिल थे भारत और पाकिस्तान 2017 में स्थायी सदस्य बने एससीओ में वैश्विक आबादी का 40%, वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 20% और दुनिया की 22% भूमि शामिल है। एससीओ ने संयुक्त राष्ट्र से भी संबंध स्थापित किए हैं और यह महासभा में पर्यवेक्षक है. एससीओ ने यूरोपीय संघ, आसियान, कॉमनवेल्थ और इस्लामिक सहयोग संगठन से भी संबंध स्थापित किए हैं.

2001 में संगठन का नाम बदलकर एससीओ कर दिया गया। इसका मुख्य उद्देश्य क्षेत्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करना सीमा मुद्दों को हल करना, आतंकवाद और धार्मिक अतिवाद का समाधान करना और क्षेत्रीय विकास को बढ़ाना है। यह संगठन देशों की राजनीति, अर्थव्यवस्था, विकास और सेना से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करने के साथ उनका समाधान करने की रणनीति बनाता है. संगठन का लक्ष्य आतंकवाद को रोकना, व्यापार और अर्थव्यवस्था को बढ़ाने के लिए जरूरी मुद्दों पर चर्चा करना है. हालांकि कोई भी कदम उठाने से पहले संगठन के सभी सदस्य देशों की मंजूरी लेना अनिवार्य है. इसके अलावा यह संगठन सदस्य देशों के बीच कारोबार के साथ टेक्नोलॉजी, कल्चर और रिसर्च को साझा करते हैं.

ईरान एससीओ का नया सदस्य है, जिसे उज्बेकिस्तान में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन के 2022 शिखर सम्मेलन में स्थायी सदस्य देशों में जोड़ा गया था। आठ एससीओ सदस्य देशों ने ईरान की स्थिति को पर्यवेक्षक से पूर्ण सदस्य तक उन्नत करने के लिए अपनी सहमति दी। ईरान ने 2008 में पूर्ण सदस्य के रूप में संगठन में शामिल होने के लिए आवेदन किया था। यह 15 वर्षों से अधिक समय तक पर्यवेक्षक सदस्य था। समरकंद शिखर सम्मेलन में ईरान को एससीओ के स्थायी सदस्य के रूप में शामिल किया गया है। ईरान 2023 में भारत द्वारा आयोजित होने वाले शिखर सम्मेलन से पूर्ण सदस्य के रूप में एससीओ में भाग लेगा।

 




कैसे चलता है SCO ?

 

SCO का मुख्यालय बैजिंग चीन में है, SCO की आधिकारिक भाषा चीनी और रशियन है। एससीओ में सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था राज्य परिषद (एचएससी) के प्रमुख हैं। एचएससी वर्ष में एक बार बैठक करती है और एससीओ के सभी महत्वपूर्ण मामलों पर दिशानिर्देश और निर्णय अपनाती है। वर्तमान महत्वपूर्ण आर्थिक और अन्य सहयोग मुद्दों को हल करने के लिए संगठन की बहुपक्षीय सहयोग रणनीति और प्राथमिकता वाले क्षेत्रों पर चर्चा करने के लिए एससीओ शासनाध्यक्ष परिषद (एचजीसी) वर्ष में एक बार बैठक करती है। संगठन के दो स्थायी निकाय हैं - पहला ताशकंद स्थित क्षेत्रीय आतंकवाद विरोधी संरचना (आरएटीएस) की कार्यकारी समिति है और दूसरा बीजिंग स्थित एससीओ सचिवालय है। एससीओ आरएटीएस की कार्यकारी समिति के निदेशक और एससीओ महासचिव को 3 साल की अवधि के लिए राज्य प्रमुखों की परिषद द्वारा नियुक्त किया जाता है।

बुधवार, 24 मई 2023

सेंगोल : भारत का राजदंड







भारत का नया संसद भवन के निर्माण का कार्य करीब समाप्त हो गया है और अगले कुछ दिनो में नये संसद भवन का उद्घाटन भी किया जायेगाउद्घाटन प्रधानमंत्री को करना चाहिए या राष्ट्रपति को इस बात पर सत्ता पक्ष और विपक्ष में विवाद चल रहा है. अब यह जानकारी प्राप्त हो रही है कि भारत के नये संसद भवन में स्पीकर के पास 'सेंगोल' रखा जायेगा.  जब से यह खबर आइ है कि भारत के नये संसद भवन में सेंगोल को स्थापित किया जाएगा तभी से यह चर्चा का आरंभ हो गया है कि आखिर सेंगोल है क्या ? 'सेंगोल'  वैसे कोइ नया नहीं है भारत के लिये, सेंगोल भारत की स्वतंत्रता और भारत के स्वर्णिम इतिहास के साथ जुडा हुआ है

'सेंगोल' शब्द का उद्भव और इतिहास

 कहा जाता है कि सेंगोल शब्द की उत्पत्ति संस्कृत शब्द "संकु" से लिया गया है, जिसका अर्थ होता है "शंख"। और ऐसा भी कहा जाता है कि  सेंगोल यह शब्द तमिल भाषा के शब्द 'सेम्मई' से निकला हुआ शब्द है। इसका अर्थ होता है धर्म, सच्चाई और निष्ठा। सेंगोल राजदंड भारतीय सम्राट की शक्ति और अधिकार का प्रतीक हुआ करता था। हिंदू मान्यताओं और सनातन धर्म  में शंख को बहुत पवित्र माना गया है। सेंगोल शब्द्प्रयोग यह चोला साम्राज्य से जुड़ा हुआ है। पुरातन काल में सेंगोल को सम्राटों की शक्ति और अधिकार का प्रतीक माना जाता था। इसे राजदंड भी कहा जाता था। 1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ तो इसी सेंगोल को अंग्रेजों से सत्ता मिलने का प्रतीक माना गया। अब नए संसद भवन में सेंगोल को स्थापित किया जाएगा। अब तक इस सेंगोल को प्रयागराज के संग्रहालय में रखा गया था। 

भारत के लोगों के पास शासन एक आध्यात्मिक परंपरा से आया. सेंगोल शब्द का अर्थ और भाव नीति पालन से है. ये पवित्र है, और इस पर नंदी विराजमान हैं. ये आठवीं शताब्दी से चली आ रही सभ्यतागत प्रथा है. चोल साम्राज्य से चली आ रही है.

सेंगोल का तमिल चोल साम्राज्य से संबंध 

चोल साम्राज्य दक्षिण भारत का सब से बडा साम्राज्य रहा है और चोल राजवंश के इतिहास को देखे तो पता चलता है कि चोल साम्राज्य के राजा और राजवंश साहित्य, कला, वास्तुकला एवं संस्कृति के संरक्षण में अपने असाधारण योगदान के लिए इतिहास प्रसिद्ध था। सेंगोल चोल राजाओं शासनकाल के दौरान उनकी सच्चाई, शक्ति और संप्रभुता  के प्रतिष्ठित प्रतीक के रूप में प्रसिद्ध हुआ और इतिहास में अपनी अमर कहानी लिखी है।

चोल साम्राज्य के उस सुवर्णकाल के दौरान राजाओं के राज्याभिषेक समारोह होते थे तब उस समारोह में सेंगोल का अत्यधिक महत्व हुआ करता था। 'सेंगोल'  एक ध्वजदंड या भाले के स्वरूप में कार्य करता था, 'सेंगोल' में अद्भुत नयनरम्य और विलक्षण उत्कीर्णन, नक्काशी और जटिल सजावट होती थी। 'सेंगोल' को अधिकार एवं शक्ति का एक पावन प्रतीक माना जाता था, जो एक शासक के द्वारा दूसरे शासक को सत्ता के हस्तांतरण के स्वरूप में सौंपा जाता था। 

समकालीन समय में अगर देखा जाये तो सेंगोल को अत्यधिक सन्मानित किया जाता है,आदर दिया जाता है। सेंगोल आज के समय में भी गहरा सांस्कृतिक महत्व रखता है। सेंगोल भारत की पुरातन, स्वर्णिम और ऐतिहासिक विरासत एवं परंपरा के प्रतीक के रूप में अत्यंत प्रतिष्ठित है, जो विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों, त्योहारों और महत्वपूर्ण समारोहों के अभिन्न अंग के स्वरूप में कार्य करता है।

'सेंगोल' और भारत की स्वतंत्रता 
भारत के अंतिम ब्रिटिश वायसराय लार्ड माउंटबेटन अपने कार्यकाल के बहुत मत्वपुर्ण और अंतिम टास्क की तैयारी कर रहे थे, यह टास्क था भारत को सत्ता हस्तांतरित करने का। भारत को सत्ता का हस्तांतरण का कागजी कार्य पूरा हो चुका था, परंतु ये प्रश्न था कि आखिर भारत की स्वतंत्रता और सत्ता हस्तांतरित करने का प्रतिक क्या होगा? लार्ड माउंटबेटन के इस प्रश्न का उत्तर उस समय किसी के पास नहीं था यह प्रश्न लोर्ड माउंट्बेटन ने जवाहरलाल नेहरु से भी पुछा जवाहरलाल नेहरु के पास इस प्रश्न का उत्तर नही था तब जवाहर लाल नेहरू गए तमिलनाडु से संबंध रखने वाले पूर्व गर्वनर जनरल सी. राज गोपालाचारी के पास और सी. राजगोपालाचारी (राजाजी) से सत्ता के हस्तांतरण के प्रतीकात्मक समारोह के विषय में सलाह मांगी। सी. राज गोपालाचारी भारत के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को समझते थे, उन्होंने बहुत विचार करके जवाहरलाल नेहरुने मांगी सलाह का प्रत्युत्तर देते हुए चोल राजवंश के सत्ता हस्तांतरण के मॉडल से प्रेरणा लेने का सुचन कीया और सेंगोल का नाम सुझाया। इतिहास बताता है की चोल वंश में एक राजा से दूसरे राजा को सत्ता सौंपते समय शीर्ष पुजारियों के आशीर्वाद लिए जाते थे। राजाजी ने बताया, चोल राजवंश के काल में एक राजा से उसके उत्तराधिकारी को सत्ता का हस्तांतरण सेंगोल के द्वारा प्रतीकात्मक रुप से किया जाता था। सेंगोल को तत्कालिन समय में और आज भी अधिकार और शक्ति के प्रतीक माना गया है।
भारत के ऐतिहासिक धरोहर को जानने वाले राजाजीने इस चर्चा के बाद तमिलनाडु के तंजौर जिले में स्थित सब से पुराने एक धार्मिक मठ, थिरुववदुथुराई अधीनम से संपर्क किया। अधीनम मठ से जुड़े संस्थान भगवान शिव की शिक्षाओं और परंपराओं का अनुपालन एवं अनुसरण करते हैं। करीब 500 से अधिक वर्षों से सातत्यपुर्ण रुप से कार्य कर रहे थिरुववदुथुरै अधीनम का अधीमों के बीच एक महत्वपूर्ण और सन्माननीय स्थान है। राजाजी ने थिरुवावदुथुराई के 20वें गुरुमहा महासन्निधानम श्रीलाश्री अंबलवाण देसिगर स्वामी से संपर्क किया, वह उस समय बीमार थे, परंतु उन्होंने इसका दायित्व स्वीकार किया उन्होंने प्रसिद्ध जौहरी वुम्मिडी बंगारू कोसेंगोल बनाने के लिए कहा अंतत: सोने का सेंगेाल तैयार कराया गया, जिसकी लंबाई लगभग पांच फीट थी। विशेष रूप से,जिसके शीर्ष पर नंदी को विराजमान किया गया जो न्याय और निष्पक्षता को दर्शाता है। मठ की ओर से ही एक दल को विशेष विमान से नई दिल्ली भेजा गया, ताकि सेंगोल को लार्ड माउंटबेटन तक पहुंचाया जा सके। सेंगोल के निर्माण में शामिल और वुम्मिदी परिवार के दो सदस्य वुम्मिदी एथिराजुलु (96 वर्ष) और वुम्मिदी सुधाकर (88 वर्ष) आज भी जीवित हैं।
 

 

रविवार, 21 मई 2023

गंगा : भारत की प्रथम क्लोन गिर गाय की बछड़ी


समग्र ब्रह्मांड में प्राकृतिक प्रकार से हुआ जन्म एक विशेष प्रसंग हैं, चाहे वो  धरती पर किसी जीव का बच्चा हो या आकाशगंगा में अथवा आकाशगंगा के बाहर अन्य आकाशगंगा में  किसी  तारे का जन्म हो। मानव जाति प्रतिदिन विज्ञान के पथ पर आगे बढ रही है और इसी  पथ पर आज मानव जाति विज्ञान के उस छोर पर पहुंच गई है जहां उसने जन्म की प्राकृतिक व्यवस्था को चुनौति देकर प्रकृति को अपने हाथ में लेने का प्रयास किया है।  ऐसी  एक प्रयास का परिणाम है गंगा बछडी, क्लोनिंग पद्धति से जन्मा गिर गाय का मादा बछडा गंगा भारत के क्लोनिंग विज्ञान की दिशा में मील का पत्थर गिना जा रहा है।  हरियाणा के करनाल स्थिति राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान ने यह इतिहास रचा है।  2021 में उत्तराखंड लाइव स्टॉक डेवलपमेंट बोर्ड देहरादून के सहयोग से राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान करनाल ने भारत में पाइ जानेवाली गिर, साहीवाल और रेड-सिंधी जैसी देशी गायों के क्लोनिंग का कार्य शुरू किया था। इसी परियोजना के तहत 16 मार्च 2023 को गिर नस्ल की एक क्लोन बछडी का जन्म हुआ. इसका नाम गंगा रखा गया। जन्म के समय इसका वजन 32 किलोग्राम था औऱ यह बछड़ी स्वस्थ है. गिर गाय भारत के देशी गाय की एक प्रसिद्ध नस्ल है. जो मूलत: गुजरात में पाई जाती है. हरियाणा के करनाल में राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (एनडीआरआई) में गंगा का जन्म करवाने वाले वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि क्लोनिंग से देशी गायों के प्रजनन को बढ़ावा मिलेगा, जिनकी संख्या क्रॉस-ब्रीडिंग, उच्च उपज वाली विदेशी नस्लों और निर्यात को अपनाने से घट गई है।

जिसके तहत एनडीआरआई कार्य करता है ऐसे भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के महानिदेशक डॉ. हिमांशु पाठक का मानना है की “गिर गाय जैसे देशी जानवर रोग प्रतिरोधी हैं और देश की गर्म और आर्द्र जलवायु के अनुकूल हैं। क्लोनिंग तकनीक में भारत में पशुपालन के द्वारा दूध से आमदनी करनेवाले वकिसानों के लिए अधिक दूध देने वाले स्वदेशी मवेशियों की आवश्यकता को पूरा करने की क्षमता है," 



गिर गाय ही क्यों ?

हरित क्रांति के बाद, कृषि के बढ़ते मशीनीकरण ने इन गायों की भारतीय नस्लों को आर्थिक रुप से कम लाभदायक बना दिया था, इसलिए किसानों ने ज्यादा दूध उत्पादन के लिए क्रॉस-ब्रीडिंग का प्रयोग करने का प्रयास कीया, परंतु लम्पी त्वचा रोग जैसी बीमारियों के लिए संकर नस्ले अधिक संवेदनशील निकले और यह प्रयास असफल और नुकसानदायक दिखाई देने लगा। ऐसे समय पर राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान करनाल ने देसी गायों के सरंक्षण और संख्या वृद्धि के लिए पशु क्लोनिंग तकनीक विकसित करने का आरंभ किया। प्रश्न यह था कि किस नस्ल का क्लोनिंग किया जाय तब यह ध्यान किया गया कि पारंपरिक भारतीय गाय की नस्लें जैसे गिर, साहीवाल और रेड सिंधी मुख्य रूप से अपेक्षाकृत ज्यादा दूध देने वाले जानवर हैं। 

     इस काम के लिए गिर नस्ल का चुनाव इसलिए किया गया क्योंकि ये गाय अन्य नस्लों की अपेक्षा, बहुत अधिक सहनशील होती है। यह अत्यधिक तापमान व ठंड को आसानी से सहन कर लेती है. इनके अंदर अन्य गायों के मुकाबले रोग प्रतिरोधक क्षमता भी ज्यादा होती है एवं विभिन्न ऊष्ण कटिबन्ध रोगों के प्रति रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए जानी जाती है. इसी कारण, भारत की देशी गायों की ब्राजील, अमेरिका, मैक्सिको, और वेनेजुएला में बहुत मांग हैं. 

डॉ. सोलकर बताते है "जब हम सबसे बेहतर नस्ल की पहचान करने बैठे, तो गिर नस्ल की गाय को निस्संदेह चैंपियन पाया। यह एक मजबूत नस्ल है और कभी भारत में बहुतायत से पाई जाती थी।  यह कठोर मौसम का सामना कर सकती है।  इन सबसे ऊपर, यह एक अधिक दूध देने वाली नस्ल है।  इस कारण इसे ब्राजील ले जाया गया जहां इसने श्वेत क्रांति लाई,” डॉ. सेलोकरने आगे कहा।  “गिर और साहीवाल गायों में दुग्ध उत्पादन को 2-3 गुना तक बढ़ाने की क्षमता होती है।  एक सामान्य भारतीय गाय एक दिन में औसतन 4-5 लीटर देती है, वहां यह नस्लें एक दिन में 15-20 लीटर उत्पादन कर सकती हैं।"

फोटो सौजन्य: द क्विंट


कैसे हुआ गिर गाय का क्लोनिंग 

इस प्रोजेक्ट से संलग्न वैज्ञानिक के अनुसार ‘भैंस की अपेक्षा गाय से सेल और अंडे निकालना काफी मुश्किल था. साथ ही हमारे पास गाय की क्लोनिंग की टेक्नीक भी मौजूद नहीं थी. ऐसे में हमें काफी रिसर्च करनी पड़ी इस तकनीक को विकसित करना काफी चुनौतीपूर्ण रहा है. हम 2021 से ही इसकी कोशिश में जुटे थे यह पूरी प्रक्रिया में करीब 2 वर्ष का समय लगा और अब आकर हमें सफलता मिली है.’ 

गाय के इस बछड़े को पैदा करने के लिए वैज्ञानिकों ने तीन जानवरों का इस्तेमाल किया। अंडाणु को साहीवाल नस्ल से लिया गया था, दैहिक कोशिका गिर नस्ल से ली गई थी और एक सरोगेट पशु एक संकर नस्ल था। गिर गाय के क्लोनिंग की संपूर्ण प्रक्रीया का विवरण एनडीआरआई के वैज्ञानिक ने ऐसे किया....

एनडीआरआई करनाल के वैज्ञानिक डॉ नरेश सेलोकर के अनुसार क्लोनिंग में स्पर्म का नहीं, किन्तु सोमेटिक सेल या कोशिकाओं का उपयोग होता है। सोमेटिक सेल या कोशिकाओं को जिस नस्ल का बच्चा चाहिए उस नस्ल के जानवर के शरीर से निकालकर प्रयोगशाला में 'कल्चर' किया जाता है और साथ ही अंडक (ओसाइट्स) को सूइयो की सहायता से अलग कर दिया जाता है। इस प्रकीया के बाद दोनो को मिलाकर भ्रूण तैयार किया जाता है, इस प्रक्रीया में 7-8 दिन का समय लगता है। बाद में भ्रूण (ब्लास्टोसिस्ट) को  सरोगेट माता (गाय) के अंदर प्रस्थापित किया जाता है। यह प्रक्रीया से क्लोन तैयार होता है। इसके 9 महीने बाद क्लोन पशु के बच्चे का जन्म होता है। गंगा की क्लोनिंग के लिए गिर नस्ल का सेल लिया गया. और साहीवाल किस्म का अंडा लिया गया, जिसका DNA निकाल दिया गया था, इससे भ्रूण तैयार किया गया, इस भ्रूण को जर्सी गाय के अंदर स्थानांतरित किया गया.' 

भारतीय वैज्ञानिको के द्वारा क्लोनिंग तकनीक के प्रयोग का इतिहास 

एनडीआरआई करनाल क्लोनिंग तकनीक से भैंस की क्लोनिंग करने में सफलता हासिल कर चुका है। फरवरी 6, 2009 में इस टेक्निक के द्वारा विश्व के सर्वप्रथम भेंस का क्लोनिंग सफलतापूर्वक किया गया था। भैंस के बच्चे को पैदा किया गया था, उसका नाम समरुपा  रखा गया दुर्भाग्यवश इस बछडे के फेफड़े में संक्रमण हो गया और पांच-छह दिन में उसकी मृत्यु हो गई। इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना से वैज्ञानिक निराश नहीं हुए और इसी वर्ष 6 जून 2009 को उनका प्रयास फलीभूत हुआ, और एक मादा क्लोन बछड़ा गरिमा पैदा हुई, जन्म समय गरिमा का वजन 43 किग्रा था, गरिमा दो वर्ष से अधिक समय तक जीवित रही. गरिमा का जन्म भारत में डेयरी अनुसंधान के इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाता है।  बाद में  22 अगस्त 2010 को गरिमा-2 का जन्म क्लोनिंग से किया गया, जिससे अब तक सात सामान्य बछड़े पैदा हो चुके हैं।वैज्ञानिकों ने 26 अगस्त, 2010 को पहला नर बछड़ा श्रेष्ठ भी पैदा किया, जिसके वीर्य का उपयोग अच्छे जननद्रव्य के गुणन के लिए किया जा रहा है। क्लोन भैंस गरिमा ने 2013 में मादा बछड़ा को जन्म दिया जिसका नाम महिमार खा गया, उसके बाद 2014 में एक और मादा बछड़े को जन्म दिया उस बछडे का नाम करिश्मा रखा गया। यह बछडे क्लोन भैंस से पैदा हुए विश्व के पहले बछड़े हैं। वर्ष 2017 में CIRB ने पहले क्लोन असमिया भैंस नर बछड़े का जन्म करवाया,  उस नर असमिया नर भेंस बछडे का नामांकन सच-गौरव किया गया। 2021 का गणतंत्र दिवस एनडीआरआई के इतिहास में सर्वदा स्मरण किया जायेगा उस दिन  एक क्लोन नर भैंस बछड़े का जन्म करवाया गया और गणतंत्र दिवस पर जन्म हुआ था इस दिन को याद रखने के लिए उसका नाम गणतंत्र रखा गया। 

वर्ष 2012 में एनडीआरआई और शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय ने कश्मीर में नूरी नामक विश्व की पहली पश्मीना भेड के क्लोन का जन्म करवाया। 

बुधवार, 26 अप्रैल 2023

विश्व में कितनी भाषाएं बोली जाती है ?




 विश्व में कितनी भाषाएं हैं, कितनी भाषाएं बोली जाती है वैसे इसका सटीक  उत्तर देना संभव नहीं है परंतु  एक अनुमान के अनुसार विश्व में कुल भाषाओं की संख्या करीब 7000 से ज्यादा है । दुर्भाग्यवश संचार के माध्यमों में लगातार वृद्धि होने के साथ कई ऐसी छोटी छोटी भाषाएं है जो लुप्तप्राय है और कई ऐसी भाषाएं है जो लुप्त होने के कगार पर आ गई है। जब कोइ भाषा लुप्त होती है तो उस भाषा के लुप्त होने के साथ ही उसे बोलने वालों की संस्कृति भी समाप्त हो जाती है। आज के समय में अगर मोटे तौर पर देखे तो विश्व की आधी से अधिक जनसंख्या के द्वारा केवल 23 भाषाएँ हैं जिनका विशेष प्रयोग किया जाता है।

विश्व में सब से ज्यादा बोली जानेवाली भाषा कौन सी है ?

जब किसी भी विषय की तुलनात्मक बात होती है तो सदैव हम यह सोचते है के विश्व में सब से आगे उस विषय में कौन होगा ठीक ऐसे ही जब भाषा की बात करते है तो हमें स्वाभाविक ही प्रश्न होता है की विश्व में सब से ज्यादा किस भाषा का प्रयोग किया जाता है ? कौन सी भाषा सब से ज्यादा बोली जाती है और हमारी हिंदी भाषा का नंबर किस पायदान पर आता है ? 

विश्व में सर्वाधिक बोली जानेवाली भाषा

विश्व में सबसे ज्यादा बोली जानेवाली भाषा मैंडरिन है जो चीन में बोली जानेवाली प्रमुख भाषा है जिसे चीनी भाषा भी कहा जाता है। विश्व में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में प्रथम स्थान लगभग 89.8 करोड़ लोगों द्वारा बोली जानेवाली इस सी भाषा मैंडरिन को प्राप्त है। 

विश्व में सर्वाधिक बोली जानेवाली द्वितिय भाषा

दुसरे नंबर पर विश्व में 43.7 करोड़ लोगों द्वारा जिस भाषा को बोला जाता है ऐसी स्पेनिश भाषा को जाता हैस्पेनिश भाषा स्पेन, चिली, मेक्सिको, पनामा, अर्जेन्टीना, पराग्वे, पेरु, बोलीविया, कोस्टा रीका, अल सेल्वाडोर, क्यूबा, उरुग्वे, वेनेजुएला आदि देशों में बोली जाती है। विश्व में सब से ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में तीसरे नंबर उस देश की भाषा है जिसके लिये कहा जाता था की उसका सुरज कभी डुबता नही है, हाँ तीसरे नंबर पर है अंग्रेजी भाषा, विश्वभर में अंग्रेजी बोलने वाले लोगो की संख्या करीब 37.2 करोड़ है और यह भाशा जिस देशों में बोली जाती है वह सारे देश कभी ना कभी ब्रिटिश उपनिवेशक देश रहे है । वर्तमान समय में अंग्रेजी भाषा विज्ञान, कंप्यूटर, साहित्य, राजनीति और उच्च शिक्षा की मुख्य भाषा है। इसके अलावा यह दुनिया के कई देशों की राजभाषा भी है। इसे दुनिया की पहली अंतरराष्ट्रीय भाषा माना जाता है। 

विश्व में सब से ज्यादा बोली जानेवाली तृतिय की भाषा

विश्व में करीब 29.5 करोड़ लोगों द्वारा बोली जाती और सब से ज्यादा बोली जानेवाली तीसरे नंबर की भाषा एक धर्म विशेष की भाषा भी कही जाती है और यह भाषा अरब के कई देशों की राजभाषा है। इस भाषा को सऊदी अरब, सीरिया, यमन, मिस्र, जॉर्डन, इराक, अल्जीरिया, लीबिया, सूडान, कतर, ट्यूनिशिया, मोरक्को और माली आदि में बोला जाता है। इसी भाषा में पवित्र कुरान-ए-शरीफ लिखी गई है । यह भाषा इस्लाम धर्म की धर्मभाषा कही जाती है और वो है अरबी भाषा 

विश्व में सब से ज्यादा बोली जानेवाली चौथे नंबर की भाषा

 अब आता है नंबर हमारी अपनी भाषा का अर्थात हिंदी भाषा का, यह विश्व की प्रमुख भाषा है तथा भारत की राजभाषा भी। हिंदी भाषा पुरे विश्वभर में करीब 26 करोड़ लोगों द्वारा बोली जाती है। न्यूजीलैंड में हिंदी चौथी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है, हिंदी भाषा नेपाल, मॉरिशस, फिजी, गयाना, सूरीनाम में बोली जाती है। इसके अतिरिक्त हिंदी भाषा अमेरिका, जर्मनी, सिंगापुर में भी बोली जाती है। हिंदी भाषा भारत की सबसे अधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है।

विश्व में सब से ज्यादा बोली जानेवाली पांचवे नंबर की भाषा 

विश्व में सब से ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में भारत की दो भाषाएं शामिल है, चौथे नंबर पर है हिंदी और पांचवे स्थान पर है बंगाली भाषा, बंगाली भाषा विश्व में करीब 24.2 करोड़ लोगों द्वारा बोली जाती है। भारत में बंगाली भाषा पश्चिमी बंगाल और उत्तर पूर्वी भारत के असम, त्रिपुरा में बोली जाने वाली प्रमुख भाषा है। बंगाली भाषा भारत के अतिरिकत बांग्लादेश और विश्व के अन्य देशों में भी बोली जाती है।



 

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