बुधवार, 1 फ़रवरी 2023

40 वर्षो में 100 मिलियन भारतीयों की हत्या किसने की ?

 


1880 से 1920 के बीच, ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियों ने कीस देश में सोवियत संघ, माओवादी चीन और उत्तर कोरिया में अकालों से मरनेवालों की तुलना में अधिक जानें लीं ?

हाल के इस समय में नियाल फर्ग्यूसन की Empire: How Britain Made the Modern World, और ब्रूस गिली की The Last Imperialist जैसी हाई-प्रोफाइल किताबों में ऐसा दावा किया गया है कि ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने भारत और अन्य उपनिवेशों में समृद्धि और विकास की नई क्षितिजें न केवल खोल दी अपितु समृद्धि और विकास की एक नई पायदान पर ले गया। दो वर्ष पहले, YouGov के एक पोल में पाया गया कि ब्रिटेन में 32 प्रतिशत लोग देश के औपनिवेशिक इतिहास पर गर्व करते है और अपने आप को गौरवान्वित समजते हैं।

उपनिवेशवाद की यह गुलाबी तस्वीर विश्व के समक्ष दिखाने की भरपुर कोशिशें की जा रही है सारी कोशिशें ऐतिहासिक रिकॉर्ड के सामने विपरित स्थिति में देखी जा सकती है। विश्व प्रसिद्ध आर्थिक इतिहासकार रॉबर्ट सी एलन के संशोधन के अनुसार, ब्रिटिश शासन के तहत भारत में गरीबी 1810 में 23 प्रतिशत थी जो 20वीं शताब्दी के मध्य में से बढ़कर 50 प्रतिशत से अधिक हो गई थी। ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के दौरान वास्तविक मजदूरी दर में लगातार  गिरावट आती गइ, जो 19वीं शताब्दी में अपने निम्न स्तर पर पहुंच गई, इस समय में जब मजदुरी दर घट रही थी भारत में अकाल लगातार पडते रहे इतना ही नही और अधिक घातक होते गए। हम जब इस समय के वास्तविक चित्र को देखते है तब लगता है की ब्रिटिश उपनिवेशवाद भारतीय लोगों को लाभ पहुँचाने की बात से कोसो दूर तो था ही साथ ही, एक मानवीय त्रासदी भी थी, इस बात की पुष्टी हम रेकोर्डेड इतिहास के पन्नो को देखकर कर सकते है जिसमे भरतीयों को हुई हानि और त्रासदी की बहुत सारी समानताएँ दिख जाती  हैं।

जहाँ 1880 से 1920 तक की अवधि में ब्रिटन की साम्राज्यवादी शक्तियां आसमान की ऊंचाई छू रही थी - जब की वोही ब्रिटन की आसमान को छूनेवाली शक्तियां भारत के लिए विशेष रूप से विनाशकारी थी और इस बात पर विश्व के अनेक विशेषज्ञ सहमत है। ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन द्वारा 1880 के दशक में शुरू की गई व्यापक जनगणना से मिले आंकडो से स्पष्ट रुप से  पता चलता है कि इस समयावधि के दौरान मृत्यु दर में काफी वृद्धि हुई थी, 1880 के दशक में भारत में मृत्यु दर प्रति 1,000 लोगों पर 37.2 मृत्यु थी जो केवल 30 वर्ष बीतते बीतते 1910 के दशक में बढकर प्रति 1,000 लोगों पर 44.2 हो गई थी। भारतीयों के जीवन की जैसे किसी को कोई चिंता ही नहि थी, बात केवल इतनी ही नही थी मृत्यु दर तो बढा ही साथ साथ इसी 30 वर्षो में  भारतीयों की जिवनावधि 26.7 वर्ष से करीब करीब 5 वर्ष घटकर 21.9 वर्ष हो गई। इस बात को अगर हम इतिहास के आइने में देखते है तो एक बात स्पष्ट दिखाइ पडती है की उस समय में भारत के नागरिक भगवान भरोसे छोद दिये गये थे, और भगवान भी शायद उनके पक्ष् में नही दिख रहा था और लगातार अकालो से उनका सामना करवा रहा था, कदाचित भगवान भारत के नागरिको की परीक्षा तो नही ले रहा था ?

World Development नामक एक जर्नल में हाल ही में प्रकाशित एक अध्ययन में जनगणना के आंकड़ों का उपयोग इन चार क्रूर दशकों के दौरान ब्रिटिश साम्राज्यवादी नीतियों द्वारा मारे गए लोगों की संख्या का अनुमान लगाने के लिए  किया है। भारत में मृत्यु दर के जो ऐतिहासिक आंकड़े केवल 1880 के दशक से ही मौजूद हैं। यदि हम इस आंकडो को "सामान्य" मृत्यु दर के आधार के रूप में देखते हैं, तो हमे पता चलता हैं कि 1891 से 1920 की अवधि के दौरान ब्रिटिश उपनिवेशवाद के क्रुर समय में, जब भारतीय नागरिको के जीवन की किमत ब्रिटिश उपनिवेशवाद में कुछ नही थी तब लगभग 50 मिलियन भारतीय नगरिकों की मौतें हुईं थी।



पचास लाख मौतें एक चौंका देने वाला आंकड़ा है, और यह आंकडा यह स्पष्ट करता है की वास्तविक मजदूरी के दर में अत्यधिक गिरावट आने से सामान्य भारतीय के जीवन पर इसकी विपरित असर पडी थी, उप्लब्ध डेटा इस बात को इंगित करता है कि औपनिवेशिक भारत में 1880 तक, सामान्य भारतीय नागरिक का जीवन स्तर पहले से ही अपने पिछले स्तरों से दयाजनक रूप से गिर गया था। कई विद्वानों का यह तर्क है कि उपनिवेशवाद से पहले, सामान्य भारतीय नागरिकों का जीवन स्तर "पश्चिमी यूरोप के विकासशील जीवन स्तर के बराबर" रहा होगा। हमारे पास आंकडे उप्लब्ध नही होने से हम निश्चित रूप से यह नहीं जानते है कि भारत में पूर्व-औपनिवेशिक काल में मृत्यु दर क्या थी, परंतु अगर हम जो आंकडे उप्लब्ध है यह मान लें की भारत में पूर्व-औपनिवेशिक काल में मृत्यु दर 16वीं और 17वीं शताब्दी में इंग्लैंड के समान थी (प्रति 1,000 लोगों पर 27.18 मौतें), तो हमें पता चलता हैं कि भारत में 1881 से 1920 की अवधि के दौरान करीब 165 मिलियन अतिरिक्त मौतें हुईं।

भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में हुए मौतों की सटीक और आधारभूत संख्या के आंकडे और मृत्यु दर हमारे द्वारा की गई धारणाओं पर आधारित है, फिर भी यह स्पष्ट है कि ब्रिटिश उपनिवेशवाद भारत में अपनी ऊंचाई पर था उस समय के दौरान कहीं न कहीं 100 मिलियन भारतीय नगरिकों की उनके मृत्यु के समय से पहले मृत्यु हो गई। यह भयावह समय मानव इतिहास में नीति-प्रेरित बढे मृत्यु दर जैसे संकटों में से सबसे बडा गिना जा सकता है। इस समय के दौरान हुई मृत्यु की संख्या की तुलना हम सोवियत संघ, माओवादी चीन, उत्तर कोरिया, पोल पॉट के कंबोडिया और मेंगिस्टु के इथियोपिया में पडे सभी अकालों के दौरान हुई मौतों की संयुक्त संख्या से भी कहीं अधिक है। यह पुरा समय कितना भयावह होगा यह कल्पना हम कर सकते है साथ ही हम यह भी सोच सकते है।


ब्रिटिश शासन के कारण इतनी भारी जान-माल की हानि कैसे हुई? यह यक्ष प्रश्न नही है जरा सा ध्यान देने की आवश्यकता है और समज में आ जायेगा । इस के ब्रिटिश शासन ने कई तंत्र विकसित कीये थे जिसका ध्यान केवल ब्रिटिश शसन और ब्रिटन को आर्थिक रुप से मजबुत बनाना था। उन सभी तंत्रो में से एक है, ब्रिटेन ने प्रभावी और क्रुरतापुर्ण रूप से भारत के उत्पादन क्षेत्र को समग्रतया नष्ट कर दिया। ब्रिटिश उपनिवेशीकरण से पहले की वैश्विक अर्थ व्यवस्था और उस में भारत का हिस्सा देखने पर दिखाइ देता है की, भारत दुनिया के सबसे बड़े औद्योगिक उत्पादकों के उत्पादंकर्ताओं में से एक था, जो दुनिया के सभी कोनों में उच्च गुणवत्ता वाले वस्त्रों की निर्यात करता था परंतु ब्रिटिश उपनिवेशकाल के दौरान ऐसी नीतियां बनाई गई जिस से भारत के वस्त्रो की निर्यात लगभग शुन्य के बराबर हो गई, इससे पहले इंग्लैण्ड में तैयार किया जाने वाला यंत्र निर्मित चमकीला कपड़ा भारत के कर्मीयों के द्वारा उत्पादित कपडे से प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकता था। भारत की अर्थतंत्र और भारतीय उत्पादको के द्वारा तैयार किया जानेवाला उत्पादन विश्व में जा न सके इस की शुरुआत तब से हुई जब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1757 में बंगाल पर अधिकार कर लिया तब भारत की शासन व्यवस्था के बदलने का भी दौर शुरू हुआ।

कइ इतिहासकारों के अनुसार, ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन ने व्यावहारिक रूप से भारत के बाहर उत्पादित चीजों पर से भारतीय शुल्कों को समाप्त कर दिया और यह ऐसा निर्णय था विदेश में उत्पादित वस्तुओं को भारत में उत्पादित वस्तुओं से सस्ता कर दिया जिससे ब्रिटन में उत्पादित वस्तुओं की भारतीय घरेलू बाजार में जैसे बाढ़ आ गई, इसके साथ साथ ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन ने भारत में उत्पादित चीजों पर अत्यधिक करों और आंतरिक ड्युटीज की एक ऐसी प्रणाली बनाई जिसने भारत में उत्पादित कपडा भारत में ब्रिटेन में उत्पादित कपडे की तुलना में इतना महेंगा हो गया की स्थानिक बाजार में इसका खरीदार ही नही था क्यों की दुसरी तरफ भारत के लोगों की आमदनी भी इतनी नही रही थी कइ वो भारत में उत्पादित कपडा खरीद सके अब नोबत यह आ गई की भारत में उत्पादित कपडा केवल निर्यात ही किया जा सके, भारत में बेच ही ना सके अर्थात इस प्रणालीने भारतीयों को अपने ही देश में कपड़ा बेचने से रोक दिया।

जैसा कि ईस्ट इंडिया एंड चाइना एसोसिएशन के अध्यक्ष ने 1840 में अंग्रेजी संसद में दावा किया था: "यह कंपनी भारत को एक उत्पादनकर्ता, औद्योगिक देश से कच्चे उत्पाद का निर्यात करने वाले देश में बदलने में सफल रही है।" अंग्रेजी निर्माताओं ने इस प्रणाली का जबरदस्त लाभ प्राप्त किया, जबकि दुसरी तरफ भारत गरीबी में ऐसा सिमट गया कि लोगों को भूख और बीमारी के अलावा कुछ भी नही मिल रहा था। इस असमान और अन्यायी व्यापार व्यवस्था ने भारतीय निर्माताओं, उत्पादकों को निर्दयता और निष्ठुरता से कुचल दिया और देश को प्रभावी ढंग से वि-औद्योगिक बना दिया। 



भुख और कंगाली  की भारत की हो रही स्थिति को बद से बदतर बनाने के लिए, ब्रिटिश उपनिवेशवादियों ने कानूनी लूट की एक प्रणाली स्थापित की, जिसे समकालीन लोग "धन की निकासी" के रूप में जानते थे। ब्रिटेन ने भारतीय आबादी पर कर लगाया और फिर प्राप्त राजस्व का उपयोग भारतीय उत्पादों - नील, अनाज, कपास और अफीम को खरीदने के लिए किया - इस प्रकार से इन सामानों को भारतीयो से ही मिली आर्थिक शक्ति से जैसे मुफ्त में प्राप्त किया, इन सामानों को ब्रिटेन में भेजा जाने लगा जिसका ब्रिटेन के भीतर उपभोग किया जाता था या विदेशों में फिर से निर्यात किया जाता था, अर्थात भारत के नागरिको के रुपयों से भारत में उत्पादित चीजो को सस्ते दाम में खरीदकर भारत से ब्रिटेन में निर्यात किया जाता था और फिर ब्रिटेन से  ब्रिटिश राज्य द्वारा राजस्व लगाकर ब्रिटेन और उसके उपनिवेशों - संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया के औद्योगिक विकास के लिए इस्तेमाल किया जाता था। इस पुरे तंत्र को सरल रुप से, दुसरे शब्दो में समजे तो भारत को बर्बाद करके ब्रिटेन और ब्रिटिश उपनिवेशों को समृद्ध बनाया गया, भारत को वि-औद्योगिक करके ब्रिटेन और ब्रिटिश उपनिवेशों को औद्योगिक  बनाया गया।

अगर हम आज के परिप्रेक्ष्य से देखते है तो हम देख पायेंगे की इस व्यवस्था के द्वारा ब्रिटिश शासनने भारत से आज के खरबों डॉलर के माल की निकासी कर दी और स्वयं और अपने अन्य उपनिवेशो को समृद्ध बना दिया। अगर हम इस निर्यात नीति को समजने का प्रयास करते है तो यह पाते है की ब्रिटिश शासन इतना निर्दयी हो गया था की सूखे या बाढ़ से जब भारत में स्थानीय खाद्य सुरक्षा को खतरा था और दिन ब दिन यह खतरा बढ रहा था फिर भी, भारत को अनाज निर्यात करने के लिए मजबूर करने वाली नितीयां लागू करखी गई, इतना निर्दयी तो राक्षस भी नही हुआ करते होंगे। इतिहासकारों की माने तो उन्होने यह सत्य स्थापित किया है कि 19वीं शताब्दी के अंत तक ब्रिटिश शासन की इस निर्दयी नीतिओं के कारण उस समय में भारत के विभिन्न क्षेत्रो में पडे अकालों के दौरान लाखों भारतीयों की भुखमरी से मृत्यु हो गई, और यह मृत्यु केवल इस लिये हुई क्योंकि उनके संसाधनों को ब्रिटेन और उसके बसने वाले उपनिवेशों में भेज दिया गया था।

ऐसा कतई नही था की औपनिवेशिक प्रशासक अपनी नीतियों के परिणामों से अवगत नहीं थे वे पूरी तरह अवगत थे। उन्होंने अपनी निर्दयी नीतिओं के कारण लाखों लोगों को भूखे मरते हुए देखा किंतु फिर भी उन्होंने अपना यह दयाहीन नीतिओं का रास्ता नहीं बदला इतना ही नहीं वे जीवित रहने के लिए आवश्यक संसाधनों से जानबूझकर लोगों को वंचित करते रहे। विक्टोरियन काल का यह असाधारण मृत्यु दर कोई दुर्घटना नहीं थी। इतिहासकार माइक डेविस का तर्क है कि ब्रिटेन की शाही नीतियां "18,000 फीट से पुर्व निर्धारित लक्ष्य पर सटीक रुप से गिराए गए बमों से होने वाले परिणाम जितनी भयानकता के समकक्ष थीं।"

शोधकर्ताओं के द्वारा की गई सर्दभयुक्त शोध से यह पता चलता है कि 1881-1920 की अवधि के दौरान ब्रिटेन की शोषणकारी नीतियों से लगभग 100 मिलियन से अतिरिक्त मौतें हुई थी। यह , अंतरराष्ट्रीय कानून में  के साथ। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, जर्मनी ने होलोकॉस्ट के पीड़ितों को मुआवजा देने के लिए मुआवजे के समझौते पर हस्ताक्षर किए और हाल ही में 1900 के दशक की शुरुआत में नामीबिया में हुए औपनिवेशिक अपराधों के लिए मुआवजे का भुगतान करने पर सहमत हुए, रंगभेद के मद्देनजर, दक्षिण अफ्रीका ने श्वेत-अल्पसंख्यक सरकार द्वारा आतंकित किए गए लोगों को क्षतिपूर्ति का भुगतान किया। उसी आंतरराष्ट्रीय नियमों के अंतर्गत यह भी क्षतिपूर्ति की मजबूत मिसाल और मुआवजे के लिए एक सीधा और स्पष्ट मामला है। 

इतिहास को बदला नहीं जा सकता और ब्रिटिश साम्राज्य के अपराधों को मिटाया नहीं जा सकता। लेकिन क्षतिपूर्ति उपनिवेशवाद द्वारा पैदा की गई वंचना और असमानता की विरासत को दुर करने में मदद कर सकती है। यह न्याय और उपचार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।

सोमवार, 23 जनवरी 2023

6,00,000 पाउंड देकर क्या छुपा रही है ब्रिटिश सरकार ?




कोइ दस्तावेज को गुप्त रखने की कीमत क्या हो सकती है ? यूके सरकार  कुछ दस्तावेजो को गुप्त रखने के लिए और उसे सार्वजनिक न करने  के लिए 6,00,000 पाउंड (लगभग 800,000 डॉलर) का भुगतान कर रही है। क्या है येह दस्तावेज ? ऐसा क्या है उन दस्तावेजो में ? कौन सा रहस्य छुपा है उन दस्तावेजो में जिसे युके की सरकार सार्वजनिक न करने के लिए इतना बडा मुल्य चुका रही है ?: 


इन सभी प्रश्नो के उत्तर भारत की स्वतंत्रता के समय के दंपत्ति के पास छुपे है, और वो दंपत्ति है ब्रिटिश भारत के अंतिम वाइसरोय और स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन और उनकी पत्नी लेडी माउंटबेटन, उनकी डायरीयां और दोनों के बीच कुछ के पत्राचार को युके की सरकार सार्वजनिक करना नही चाहती और उसके लिए इतनी बडी किमत चुका रही है, लेकिन आखिर मामला क्या है ? किस को दे रही है ब्रिटन की सरकार इतनी बडी राशि ? 

कीस कागजात को छुपाना चाहती है ब्रिटिश सरकार ?

यूके सरकार इन कागजातों को कीसी भी तरह दफनाने की, छुपाने की, सार्वजनिक नहीं करने की कोशिश कर रही है, विशेष रूप से विभाजन के वर्षों से जुडे कागजात को दफनाना, छुपाना चाहती है और नही चाहती के यह डायरी और पत्राचार सार्वजनिक हो। ब्रिटिश सरकार को लगता है की यह डायरीयां और पत्राचार ब्रिटिश शाही परिवार की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा सकते है और इसीलिए ब्रिटिश लेखक एंड्रयू लॉनी के खिलाफ एक अदालती लड़ाई में ब्रिटिश सरकार इतनी बडी राशि का भुगतान कर रही है। ब्रिटिश सरकार ऐसा मानती है की लोर्ड माउंट्बेटन और उनकी पत्नी लेडी एडविना माउंट्बेटन की डायरीयां और उनकी बीच के पत्राचार ब्रिटेन के पाकिस्तान और भारत के बीच के रिश्तों को खतरे में डाल सकता है। 





माउंटबेटन और लडी एडविना 

ब्रिटिश सरकार किस कारण से लोर्ड माउंटबेटन और उनकी पत्नी लेडी एडविना के पत्राचार और डायरीयां को इतना महत्व दे रही है ? लोर्ड माउंटबेटन और उनकी पत्नी लेडी एडविना की डायरीयां और पत्राचार ब्रिटिश शाही परिवार की प्रतिष्ठा को कैसे नुकसान पहुंचा सकते है ? लोर्ड माउंटबेटन का ब्रिटन के शाही परिवार से क्या संबंध है ? यहाँ यह जानना आवश्यक है की महारानी विक्टोरिया के प्रपौत्र थे। लोर्ड माउंटबेटन एक रॉयलिस्ट थे और जैसे की ब्रितिश रोयल परिवार का नियम है की परिवार के सदस्य को  ब्रिटिश सेना में निश्चित समय के लिए अपनी सेवा देनी  पडती थी, उस नियम का पालन करते हुए लोर्ड माउंटबेटनने भी रॉयल नेवी में अपनी सेवा दी थी। उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नौसेना की कमान संभाली और ब्रिटिश राज में विभिन्न पदों पर रहे। वह भारत के अंतिम वायसराय भी बने। 1922 में दिल्ली में ही माउंटबेटन की मुलाकात एडविना नाम की एक युवती से हुई थी। उन्होंने तब शादी करने का फैसला किया, जिसमें कथित तौर पर कई उतार-चढ़ाव आए। दावा किया गया था कि दोनों के अन्य लोगों के साथ अफेयर थे परंतु माउंटबेटन और एड्विनाने लग्न किये। अब देखा जाए तो माउंटबेटन दंपति की शादी किसी से छिपी नहीं थी फीर ऐसा क्या है जो ब्रिटिश सरकार छिपाने की कोशिश कर रही है ?




भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु और एडविना के पत्र का अंश  

लेडी माउंटबेटन वैसे मिलनसार थी और उनके काफी मित्र थे एड्विना के करीबी दोस्तों में से एक भारत के प्रथम प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू भी थे। नेहरु और एड्विना की मित्रता के अनेक किस्से है जो समय समय पर चर्चा में आते रहेते है । एड्विना और जवाहरलाल नेहरु में पत्राचार होते थे यह भी सार्वजनिक है, कुछ पत्र ऐसे भी है जो सार्वजनिक भी है । एड्विना और जवाहरलाल नेहरू के बीच हुए पत्राचार में से एक पत्र WION न्युज के पास था जिसका संदर्भ देते हुए WION न्युजने दावा किया है की उस पत्र में, एडविनाने नेहरु को लिखा था, "आपने मुझे शांति की एक अजीब भावना के साथ छोड़ दिया। शायद मैं आपके लिए वही लायी हूँ? "मुझे आज सुबह आपको ड्राइव करते हुए देखते हुए नफरत हुइ। जवाहरलाल नेहरू ने इसका उत्तर दिया  "जीवन एक नीरसता है,"।




कीसने मांगे ब्रिटिश सरकार से माउंटबेटन और लडी एदविना के वो कागजात ?

माउंटबेटन के कागजात जैसे एक खजाने की निधि के समान हैं उस में इतिहास है और कथित तौर पर बहुत सारे घोटाले हैं। इसलिए, कुछ साल पहले, लेखक एंड्र्यु लॉनीने जब इन कागजातों पर किसी प्रकार की रोक न करते हुए ब्रिटिश सरकार से मांगे, तो सरकार ने उन्हें उपकृत करने से इनकार कर दिया। लेकिन लेखक एंड्र्यु लॉनी ने सरकार के नकारात्मक उत्तर को ही नकार दिया और उन्होंने अंग्रेजों के सूचना की स्वतंत्रता के कानून का हवाला दिया और सरकार को माउंटबेटन के सभी कागजातों में से कम से कम 99.8 प्रतिशत को जारी करने के लिए मजबूर कर दिया, जबकि सरकारने बाकी के कागजातों का खुलासा करने से स्पष्ट इनकार कर दिया। 

क्या रह्स्य है नकारे गये कगजातों में ?

ब्रिटिश सरकारने जिस बाकी के कागजातों का खुलासा करने से स्पष्ट इनकार कर दिया वह कागजात कथित तौर पर 1947 और 1948 के वर्षों के दस्तावेज हैं, जिनमें लॉर्ड और लेडी माउंटबेटन की डायरी और दोनों के बीच कुछ पत्राचार शामिल हैं। इस दंपत्ति को अपने विचारों को बिना कोइ शब्द चोरी किये, प्रमाणिकता से कागज़ पर लिखने की आदत थी। अपनी आदत को पुरा करने के लिए दोनों डायरी लिखते थे, दोनों ने चिट्ठियों में अपने मन की बातें एक दुसरे को लिखे पत्रोमें स्पष्ट रुप से लिखी है। 1942 में लॉर्ड माउंटबेटन ने अपनी पत्नी को यह लिखा था: "अतिप्रिय एडविना, मुझे लगता है कि जीवन के सबसे कठिन सप्ताह के दौरान दो बार तुम्हें छोड़ना पड़ा। मुझे डर है, जैसा कि मैंने एक बार तुमसे पहले भी कहा था, तुम्हें एक नाविक से शादी नहीं करनी चाहिए थी। मैं अच्छी अच्छी बातें कहने का आदी नहीं हुं और मैं आपके अधिकांश अन्य प्रशंसकों के साथ प्रतिस्पर्धा करने की उम्मीद नहीं कर सकता। परंतु मुझे लगता है कि मुझे यह अवश्य कहना चाहिए जो मैं सोचता हुं कि तुम वास्तव में भव्य और बहुत प्यारी और मधुर हो। माउंटबेटन ने भारत के विभाजन के दौरान हुइ सारी राजनितिक, सामाजिक, आर्थिक, सरहदीय और अन्य सभी उठापटक के साक्षी ही नही थे अपितु बहुत सारी बातो में मुख्य संचालक भी थे। माउंटबेटन और उनकी पत्नी लेडी माउंटबेटन को अपने विचारों बिना कीसी जिजक लिखने की आदत थी, ब्रिटिश सरकार को यह शंका है की उनकी डायरियों सार्वजनिक करने से वो सारी बातों का खुलासा हो सकता है जो उस समय साजा नही किये गये और इसी कारण  ब्रिटेन इसे साझा करने में सहज नहीं है। उनकी डायरियों में नेहरू, मोहम्मद अली जिन्ना, महात्मा गांधी और भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा रेखा खींचने वाले सर सिरिल रेडक्लिफ के बारे में माउंटबेटन के विचार हो सकते हैं। माउंटबेटन, शाही परिवार के एक बहुत ही प्रभावशाली सदस्य, ड्यूक ऑफ एडिनबर्ग प्रिंस फिलिप के मामा थे। वह तत्कालिन प्रिंस ऑफ वेल्स, प्रिंस चार्ल्स और वर्तमान किंग चार्ल्स के लिए एक पिता समान थे, दोनों बहुत करीब थे। माना जाता है कि माउंटबेटन ने प्रिंस चार्ल्स के निजी जीवन में बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी, चाहे वह तत्कालीन प्रेमिका कैमिला पार्कर बाउल्स के साथ उनका अफेयर हो या डायना के साथ उनकी शादी। शाही परिवार प्यार से माउंटबेटन को "अंकल डिकी" कहता था। और वर्तमान किंग चार्ल्स माउंटबेटन की डायरी लिखने की आदत के बारे में भलीभांती जानते थे। ऐसा कहा जाता है कि शाही परिवार के पास उनके कुछ दस्तावेज भी थे। लेकिन परिवार में किसने सोचा होगा कि अंकल डिकी की डायरी एक दिन सार्वजनिक खजाने को खाली करना शुरू कर देगी? अब तक, यूके सरकार ने माउंटबेटन के विचारों को दुनिया से छिपाने की कोशिश करते हुए, उन्हें छुपाने के लिए 800,000 डॉलर खर्च किए हैं। 

क्या माउंटबेटन दंपत्ति के पत्राचार और डायरीयां कभी सार्वजनिक होगी ?

अभी, लंदन में एक मुकदमा चल रहा है जो यह निर्धारित करेगा कि ब्रिटेन के शाही परिवार और ब्रिटन की कैबिनेट की चिंताओं के बावजूद माउंटबेटन दंपत्ति की सभी निजी डायरियों और पत्रों को जनता के लिए जारी किया जाना चाहिए या नहीं।

शनिवार, 7 जनवरी 2023

विश्व नेता भारत का प्रतिबिंब G-20 का अध्यक्ष भारत




अमेरिका, यूरोपीय संघ सहित रूस, चीन, दक्षिण कोरिया, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, आस्ट्रेलिया, कनाडा, सऊदी अरब, जर्मनी, इडोनिशिया, इटली, मेक्सिको, इंडोनेशिया, अर्जेंटीना, तुर्की जैसे देशों से बना संगठन है जी-20, यह ऐसे देश है जो विश्व जीडीपी का 85 प्रतिशत, विश्व कारोबार का 75 प्रतिशत हिस्सा समेटे हुए है, इतना ही नहि विश्व की 60 प्रतिशत जनसंख्या जी-20 देशों में ही रहती है भारत इतने सामर्थ्यवान एवं बड़े समूह की अध्यक्षता एक दिसंबर से कर रहा है। ऐसे सामर्थ्यवान देशो के संगठन जी-20 देशों की अध्यक्षता मिलना भारत के लिए एक बड़ा अवसर है। जी-20 देशों की अध्यक्षता मिलना यह केवल संजोग नही है परंतु, विश्व व्यवस्था के इन समृद्ध देशो के संगठन जी-20 देशों के बीच भारत के सामर्थ्य की स्वीकार्यता स्पष्ट तौर पर दर्शाता है। इस मौके का उपयोग करते हुए भारत को विश्व कल्याण पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और इस विचार को स्पष्ट करते हुए ‘भारत के पास विश्व कल्याण, शांति एवं पर्यावरण की चुनौतियों का समाधान है।" इस बात को विश्व के समक्ष उजागर करते हुए हमने एक पृथ्वी, एक परिवार और एक भविष्य की जो थीम दी है, उससे वसुधैव कुटुंबकम् के लिए हमारी प्रतिबद्धता जाहिर होती है।’ बिना किसी संदेह के जी-20 को विश्व नेतृत्वकर्ता समूह के तौर पर स्वीकार किया जा सकता है।



भारत की प्रमुख और प्रभावी होती भूमिका

गत दिनों इंडोनेशिया के बाली में आयोजित जी-20 देशों की बैठक में और पिछले दिनों उज्बेकिस्तान के समरकंद में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के सदस्य देशों के सम्मेलन में भी यह साफ तौर पर दिख यहा था की विश्व मंचों पर भारत की प्रमुख और प्रभावी होती भूमिका को अब विश्व के प्रमुख देश स्वीकारने लगे हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने उज्बेकिस्तान के समरकंद में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के सदस्य देशों के सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से बातचीत में जब कहा कि "यह युद्ध का युग नहीं है" तो उस पर विश्व आश्चर्यचकित रह गया था, क्योंकि भारत हथियारों और तेल की आपूर्ति के लिए बहुत हद तक रूस पर निर्भर है। भारत जितना इंधन आयात करता है  उसमे रूस से खरीदा जाने वाला ईंधन 19% से बढकर 23% हुआ है, भारतीय मिलिट्री के करीब 86 फीसदी उपकरणों का सीधा संबंध रूस से है, कुछ उदाहरण देखते है भारत ने रूस से 125 एंतोनोव एन-32 कार्गो प्लेन खरीदे थे जिनमें से 105 अब भी काम कर रहे हैं, इस प्लेन्स को अत्याधुनिक बनाया जा रहा है, भारत ने रूस के साथ AK-203 असॉल्ट राइफल बनाने की 5 हजार करोड़ रुपये की डील की है.जिसके तहत 6.01 लाख राइफल भारत में बनेगी, जबकि 70 हजार राइफल रूस से ही आएगी, भारत के कइ जंगी जहाजो पर रुस द्वारा विकसित की गइ घुमने वाली तोप यानी क्लोज-इन वेपन सिस्टम रोटरी केनन, भारतीय वायुसेना के सबसे घातक लड़ाकू विमानों में से एक मिग-29 मिकोयान (MiG-29 Mikoyan) को रूस ने ही बनाया है और फिलहाल इसके तीन वैरिएंट्स भारत के पास मौजूद हैं, जिसे हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने अत्याधुनिक बनाया है और भारतीय वायुसेना में ऐसे 272 विमान मौजूद ऐसा लडाकु विमान सुखोई 30एमकेआई भी रुस से ही भारत ने खरिदा है और जिसे भारत ने जिसका नाम बदलकर भीष्म रखा है ऐसी मेइन बैटल टेंक टी-90 टेंक जिसके लिये भारतने रुस के साथ डील की है तिसके तहत 2025 तक 1675 भीष्म टेंक ड्युटी पर तैनात कर देगा यह टेंक भी रुस्ने ही बनाइ है, इस तरह से रुस के साथ गहरे रक्षा संबंध होने के बावजुद भारतने जो कहा उससे विश्व यह मानने लगा है की भारत अब किसी अन्य देश के दबाव में आकर अपने फैसले नही लेता बल्कि भारत के निर्णय विश्व हितऔर स्व के परिप्रेक्ष्य में लेता है.   

भारतीय कूटनीति

बाद में एक कार्यक्रम में व्लादिमीर पुतिन ने प्रधानमंत्री मोदी की प्रशंसा करते हुए कहा कि "भारत की विदेश नीति स्वतंत्र है और मोदी एक देशभक्त राजनेता हैं, जो अपने देश के हितों के लिहाज से नीति तय करते हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि विश्व व्यवस्था में भारत की भूमिका बढ़ने वाली है।" इसकी पुष्टि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर से लेकर प्रमुख नेताओं द्वारा कही जा रही यह बात कर रही है कि हम भारत के हितों के लिहाज से कोई भी निर्णय लेंगे। पुतिन की ही तरह फ्रांस के राष्ट्रपति एमैनुअल मैक्रों भी भारत के अच्छे मित्रों में गिने जाते हैं। गत दिनों मैक्रों ने जी-20 की बैठक से प्रधानमंत्री मोदी के साथ एक चित्र साझा करते हुए लिखा कि "हम भारत की अध्यक्षता में शांति के एजेंडे पर साझा काम करेंगे।" जाहिर है आतंकवाद, वित्तीय समावेशन, खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा पर विश्व के विकसित देश भारत के नेतृत्व में चल रहे एजेंडे को आगे बढ़ाने की बात कर रहे हैं। अमेरिकी मीडिया आमतौर पर भारतीय प्रधानमंत्रियों के बयान को बहुत प्रमुखता नहीं देता है, लेकिन अमेरिका को मोदी का 'यह युद्ध का युग नहीं है' वाला यह बयान अपने पक्ष में लगा तो वह मोदी की प्रशंसा में जुट गया। जाहिर है अमेरिका, रूस और चीन की तिकड़ी के बीच फंसी विश्व व्यवस्था में भारतीय कूटनीति के संतुलन का यह अप्रतिम उदाहरण देखने को मिला है। साथ ही भारत अब किसी के दबाव में या प्रभाव में आकर अपने फैसले नही ले रहा ऐस स्पष्ट संदेश विश्व को मिल रहा है जब भारत के विदेशमंत्री को युरोप में युरोप के पत्रकार के द्वारा ऐसा प्रश्न पुछा जाता है की भारत रुस से इंधन खरिदता है उस इंधन के पैसे से रुस युद्ध करता है तब भारत के विदेशमंत्री स्पष्ट शब्दो में उत्तर देते है की भारत से कही ज्यादा इंधन युरोप के देश रुस से खरीदते है । ऐसे अनेक उदाहरण विश्व के मंच पर भारत के बयानो के मिल जायेंगे जिस को देख सुन विश्व भारत के सामर्थ्य को मानने पर विवश हो रहा है। एक और बात यह भी है की विश्व की महासत्ता कहे जानेवाले देश या संगठन कोइ भी निर्णय लेने के बारे में सोचते है तो स्वाभाविक रुप से यह विचार किया जाता है की उस निर्णय पर भारत का रुख एवम रवैया कैसा रहेगा ।

अब ऐसे समय में जब भारत जी-20 की अध्यक्षता संभालने जा रहा है, उससे ठीक पहले भारत की विश्व नेता के तौर पर यह स्वीकार्यता सकारात्मक संकेत है। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को वैकल्पिक और रीन्युएबल ऊर्जा की ओर तेजी से ले जा रहा है, लेकिन भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं के रास्ते में किसी तरह की बाधा खड़ी करने की कोशिश हुई तो यह विश्व अर्थव्यवस्था के लिए बेहतर नहीं होगा यह बात विश्व को अब समज में आ रही है। इस समय रूस-यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध की वजह से पूरी दुनिया में खाद्य और ऊर्जा आपूर्ति पर बुरा असर पड़ रहा है। जबकि भारत में इस युद्ध की काफी कम असर हुइ है और इस युद्ध के बावजुद आज भारत विश्व की तिसरे नंबर की और सब से तेज गति से आगे बढ रही अर्थव्यवस्था बना हुआ है।



जी-20 की अध्यक्षता

आज का खाद संकट कल का खाद्य संकट न बने इसके लिए जरूरी है कि विकसित देश एक साथ आकर आपूर्ति सुचारु करने का प्रयास करें। भारत लोकतंत्र की जननी है यह बात फिर से स्थापित हो रही है। गत दिनों बाली में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन की मुलाकात के बाद चीन की तरफ से जारी बयान में जिस तरह से अमेरिकी शैली के लोकतंत्र और चीनी शैली के लोकतंत्र की बात की गई थी, उसमें भारतीय लोकतंत्र की स्थापना अति महत्वपूर्ण है। यहां यह बात भी ध्यान में रखना होगा कि अमेरिका हो या चीन, दोनों ही देश इस स्थिति में नहीं हैं कि कह सकें कि यह युद्ध का युग नहीं है, क्योंकि दोनों ही देश युद्ध की स्थिति के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर जिम्मेदार दिखते हैं। इसीलिए भारतीय लोकतंत्र का उदाहरण विश्व के दूसरे देशों को आसानी से समझ आता है।

समग्रतया देखने पर भारत ऐसे समय में जी-20 की अध्यक्षता संभालने जा रहा है, जब संपूर्ण विश्व में तनाव है। अर्थव्यवस्था में कमजोरी दिख रही है और खाद्य एवं ऊर्जा की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। उम्मीद है भारत अपनी अध्यक्षता के दौरान इनका समाधान पेश करेगा। यह बात विश्व इस लिये भी समजता और मानता है क्योंकि पहले प्रधानमंत्रित्व काल में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने विश्व व्यवस्था में परिवर्तन करके बहुध्रुवीय विश्व बनाने की बात की थी और शुरुआत भी की थी वह आज अब दूसरे कार्यकाल में वह साकार होती दिख रही है। इस पर विश्व के विकसित देशों की भी स्वीकृति मिलती दिख रही है।

मंगलवार, 3 जनवरी 2023

गंगा विलास : भारत में शुरु होगी विश्व की सब से लंबी क्रुज यात्रा





देव दीपावली जैसे पर्व को भव्य बनाने और काशी कॉरिडोर के निर्माण के बाद बनारस के पर्यटन में एक और अध्याय जुड़ गया है राष्ट्रीय जलमार्ग-1 एक बार फिर पर्यटकों की गतिविधियों से गुलजार होने वाला है। देश के सबसे लंबी रिवर क्रूज़ की यात्रा की शुरुआत जनवरी 2023 से वाराणसी में होने वाली है, मील रही जानकारी के अनुसार, दुनिया का सबसे लंबा लक्ज़री रिवर क्रूज़ जनवरी 2023 में अपनी यात्रा शुरू करने के लिए पूरी तरह तैयार है, जो लगभग 4000 किमी की दूरी होगी। 

"गंगा विलास" क्रूज के नाम से जाना जाने वाला यह क्रूज उत्तर प्रदेश के वाराणसी को असम के डिब्रूगढ़ से जोड़ेगा और कोलकाता और ढाका से होकर गुजरेगा।  प्रयागराज-हल्दिया जलमार्ग से होते हुए करीब 4000 किलोमीटर दूरी तय करने वाली दुनिया की सबसे लंबी और रोमांचक रिवर क्रूज यात्रा जनवरी महीन में शुरू होने वाली है। वाराणसी से शुरू होने वाली यह यात्रा केवल भारत ही नहीं, बल्कि बांग्लादेश की नदियों से भी होकर गुजरेगी। गंगा के तट से शुरू होने के बाद भारत में गंगा-भागीरथी, हुगली, ब्रह्मपुत्र और वेस्ट कोस्ट नहर सहित 27 नदी प्रणालियों से होकर गुजरने वाली यह यात्रा ब्रह्मपुत्र के किनारे बसे पूर्वोत्तर भारत के शहर डिब्रूगढ़ तक जाएगी।



क्रूज मार्ग:

गंगा विलास क्रूज 50 दिनों की सबसे लंबी नदी यात्रा से गुजरेगा, जिसमें 27 नदी प्रणालियां और विश्व धरोहर स्थलों सहित 50 से अधिक पर्यटक स्थल शामिल होंगे। यह क्रूज दुनिया में किसी एक नदी जहाज द्वारा की जाने वाली सबसे बड़ी नदी यात्रा होगी जो भारत और बांग्लादेश दोनों को दुनिया के नदी क्रूज मानचित्र पर रखेगी। जहाज काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान और सुंदरवन डेल्टा सहित राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों से होकर गुजरेगा। क्रूज आगे वाराणसी से गुजरेगा और बक्सर, रामनगर और गाजीपुर से होते हुए 8वें दिन पटना पहुंचेगा, और भारत में प्रवेश करने से पहले बांग्लादेश में लगभग 1100 किमी की दूरी तय करेगा। इस दौरे का अन्य मुख्य आकर्षण गंगा आरती होगी, दुनिया के सबसे बड़े मैंग्रोव वन के प्राकृतिक अजूबों की जाँच करना, मायोंग का दौरा करना, जिसे भारत में 'काले जादू' के पालने के रूप में जाना जाता है। "गंगा विलास" क्रूज की पहली यात्रा 13 जनवरी को वाराणसी से शुरू होगी, जबकि क्रूज मार्च महिने में असम के डिब्रूगढ़ जिले में बोगीबील पहुंचेगा 


लग्जरी क्रूज शिप में उप्लब्ध सुविधाए

गंगा विलास क्रूज शिप 62.5 मीटर लंबा और 12.7 मीटर चौड़ा है और भारत में बना पहला रिवर क्रूज शिप है।इस गंगा विलास लग्जरी जहाज में स्पा, सनडेक, फ्रेंच बालकनी और 40 सीटर रेस्तरां जैसी सुविधाओं के साथ 18 सुइट्स होंगे।

भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण (IWAI) के एक वरिष्ठ अधिकारी, जो राष्ट्रीय जल-मार्गों (NWs) के लिए जिम्मेदार एजेंसी है, ने कहा कि एक निजी खिलाड़ी द्वारा संचालित क्रूज एक नियमित सुविधा होगी। अधिकारी ने कहा, "अंतर्देशीय जलमार्गों के विकास और रखरखाव पर सरकार के बढ़ते ध्यान के कारण, हमने गहराई बढ़ाने, यात्री और मालवाहक जहाजों दोनों के सफल संचालन के लिए आवश्यक नेविगेशन सुविधाएं और जेटी स्थापित करने के लिए कई परियोजनाएं शुरू की हैं।" अधिकारियों ने कहा कि भारत-बांग्लादेश प्रोटोकॉल मार्ग के विकास ने क्रूज सेवा की योजना बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिखायेंगे हरी झंडी

उत्तर प्रदेश के वाराणसी से बांग्लादेश होते हुए असम के डिब्रूगढ़ तक दुनिया की सबसे लंबी नदी क्रूज को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 13 जनवरी को झंडी दिखाकर रवाना करेंगे।  

आईडब्ल्यूएआई के एक अधिकारी ने कहा, "हमारी सभ्यता नदियों के किनारे विकसित हुई है और इसलिए नदी परिभ्रमण का उपयोग करने वाले पर्यटकों को बेहतर अनुभव मिलेगा और वे हमारी संस्कृति और विरासत को समझेंगे।" हाल ही में शिपिंग और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने कहा था कि क्रूज सेवाओं सहित तटीय और नदी शिपिंग का विकास सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में से एक है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीने कहा था कि केंद्रने 100 राष्ट्रीय जलमार्गों को विकसित करने का काम अपने हाथ में लिया है और लक्ष्य इन जलमार्गों पर चलने वाले विश्व स्तरीय क्रूज को देखने के अलावा कार्गो की आवाजाही को भी देखना है। “प्राचीन काल में, व्यापार और पर्यटन के लिए जलमार्गों का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता था। इसलिए कई शहर नदियों के किनारे आ गए और वहां औद्योगिक विकास हुआ।

मंगलवार, 27 दिसंबर 2022

वैश्विक वर्चस्व कायम करने की होड़ में भारत से पिछड़ता चीन




भारत सदीओ से शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के मंत्र का अनुपालनकर्ता देश है. यह विचार आज भी भारत के आंतरराष्ट्रिय संबंधो में झलकता है। भारत न तो कोइ अनावश्यक ऐसे बयान देता है और न ही ऐसी कोइ हरकत करता है की जिससे सीमा पर तनाव जैसी स्थिति व्यक्त हो हालांकी भारत के सामने ऐसी कोइ भी चुनौती खडी कर दी जाती है जिससे भारत की संप्रभुता और अखंडीतता पर प्रश्न हो तब भारत प्रश्न खडे करने वाले को उसकी भाषा में उत्तर देता आया है और वर्तमान में ज्यादा मजबुती से देता है और देने के लिये सदैव तैयार रहेता है। इसका सबसे उत्कृष्ट उदाहरण है पोखरण-2 के बाद भारत द्वारा ‘नो फर्स्ट यूज’ और ‘मिनिमम डेटरेंस’ की निति को अपनाया है। परंतु यदि किसी दूसरे देश द्वारा युद्धोन्मादी अभिव्यक्ति का संदर्भ हो तो उसके अनुरूप प्रत्युत्तर राष्ट्रीय दायित्व की श्रेणी में आता है। 



चीन और भारत 

चीन भारत की स्वतंत्रता के बाद भारत के साथ 1962 में एक युद्ध लड चुका है और आज भी ऐसा मानता है की भारत 1962 का भारत ही है और भारत-चीन की सीमाओ पर समयांतर पर भारत को उकसाने के प्रयास करता रहेता है चाहे वो डोकलाम हो, गलवान हो या वर्तमान में उसका दुस्साहस जहाँ भारतीय सैनिकोने चीन के सैनिको को अपने शौर्य का परचा देते हुए भगाया ऐसा तवांग हो चीन ऐसी हरकतो को लगातार करता रहेता है। 

वर्तमान में भारत का सब से बडा व्यापारिक पार्टनर है, और विश्व की द्वितिय नंबर की आर्थिक शक्ति भी है और अगर भारत की और देखे तो भारत वर्तमान विश्व में सब से तेज गति से बढ रही आर्थिक व्यवस्था है। भारत न केवल सब से तेज गति से बढती हुई आर्थिक व्यवस्था है अपितु संरक्षण,अंतरिक्ष,उत्पादन, वैश्विक निवेश, सैन्य सरंजाम जैसे अनेक क्षेत्रो में समग्र विश्व को अपना लोहा मनवा रहा है, और वैश्विक कोरोना महामारी के बाद जिस तरह से चीन के विरुद्ध विश्व में विमर्श चला और चीन में से विदेशी कंपनीयां अपना व्यवसाय बंध करके भारत में आ रही है इसे देखकर और ऐसे वैश्विक वातावरण में चीन विश्व और एशिया में भारत को अपना प्रतिद्वंद्वी मानता है और इस कारण से चीन ऐसी हरकते करता रहेता है जिससे विश्व में भारत की शाख कम हो और भारत एक कमजोर राष्ट्र दिखे इस परिप्रेक्ष्य में भारत के साथ चीन के संबंधो को और चीन की मंशा की तरफ द्रष्टि करना आवश्यक है  



चीन की दक्षिण प्रशांत में वर्चस्व की राजनीति

चीन की हरकतो को देखे तो वर्ष 2020 की गलवान हिंसा के बाद चीनी नेता के वक्तव्यों को सामान्य बातचीत की शैली भर नहीं मान सकते।चीन वर्तमान में सख्ती के उस दौर में आ गया है, जहां उसकी हरकतो में आक्रामकता अधिक दिख सकती है। हाल में हुए कम्युनिस्ट पार्टी की कांग्रेस में इसे और बल मिला है, जब शी जिनपिंग को लगातार तीसरी बार पार्टी महासचिव चुना गया। पिछले दशकों में चीन ने साम्यवादी शासन के बावजूद शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन का एक रास्ता खोज लिया था, जिसमें एक नेता दस वर्षों और अधिकतम 70 वर्ष की उम्र तक पार्टी का महासचिव और देश का राष्ट्रपति होता था। लेकिन शी जिनपिंगने इसे पूरी तरह से बदल दिया है। अब शी जिनपिंग तीसरे कार्यकाल के साथ पार्टी के सर्वशक्तिमान नेता बन गए हैं, इसलिए चीन तानाशाही, आक्रामकता और युद्धोन्मादी अभिव्यक्ति का शिकार अधिक रहेगा। दुसरी तरफ देखे तो चीन के सामने घरेलू राजनीति में विरोध लगातार बढ रहा है, वर्तमान में सामान्य नागरिको द्वारा जीरो कोविड नीति का व्यापक तौर पर विरोध होने के बाद उस नीति को बदलना पडा यह देखने के बाद और आंतरिक विरोध से विश्व का ध्यान भटाकाने तथा आंतरिक विरोध को दबाने तथा दक्षिण प्रशांत में वर्चस्व की राजनीति करने के अलावा चीन अब एक खतरनाक विदेश और आर्थिक नीति अपनाने की ओर बढ़ चुका है। चीन के द्वारा लिये जा रहे कदमो की तरफ द्रष्टि करे तो हम देख सकते है कि इसका उद्देश्य है- 'चीन को दुनिया से स्वतंत्र और दुनिया को चीन पर निर्भर बनाना'। एक तरफ आंतरिक विरोध की स्थिति है और दुसरी और पुरा विश्व रुस-युक्रेन युद्ध में चीन की भुमिका को संदेह की नजर से देखता है तब चीन क्या करेगा यह बडा प्रश्न है। यद्यपि यूक्रेन में रूस के लिए बनती प्रतिकूल परिस्थितियों के दृष्टिगत चीन हिंद-प्रशांत क्षेत्र में थोड़ा संभलकर कदम बढ़ाएगा, लेकिन वह अपने मौलिक चरित्र से पीछे हटना नहीं चाहेगा।


शी जिनपिंग की आंतरिक चुनौती

वर्तमान में चीन की जीरो कोविड नीति के व्यापक विरोध के कारण से उस नीति में बदलाव लाना पडा उस कदम से विश्व में चीन और शी जिनपिंग की छवि कमजोर राष्ट्र और कमजोर राष्ट्रप्रमुख है ऐसी बन रही है जिससे शी जिनपिंग अपनी छवि और अपनी नेतृत्व क्षमता को मजबूती से देश के अंदर और बाहर प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहे हैं। इसके पीछे भी कई कारण हैं। चीन के सामान्य लोग एवम आर्थिक मामलो के विशेषज्ञ मानते हैं कि सख्त जीरो कोविड नीति के तहत सख्ती से किए गए लाकडाउन ने चीनकी अर्थव्यवस्था को चौपट कर दिया है। वैसे चीन की साम्यवादी सरकार के इतिहास को देखे तो पता चलता है कि जब भी सामान्य नागरिको की तरफ सरकार के कीसी कदम का विरोध होता है तब नागरिकों की तरफ से भारी विरोध न हो इसके लिए नागरिक अधिकारों का दमन किया गया है और वर्तमान शासक उसी इतिहास को दोहरायेंगे। इस दिशा में चीन की साम्यवादी सरकार का पहला कदम होता है बलपूर्ण धमकी या अपनी ताकत को प्रदर्शित करने के लिए वक्तव्यों के माध्यम से सेना को छद्म निर्देश और लोगों को संदेश पहुंचाना। जैसे चीन का इतिहास रहा है वैसे ही आंतरिक स्थितियों को नियंत्रण में रखने के लिए सरकार का विरोध करने वालों के लिए सख्त सजा के प्रविधान किए गए हैं, लेकिन फिर भी इंटरनेट मीडिया के माध्यम से चीन के नागरिक विरोध करते हुए स्पष्ट तौर पर देखे जा सकते हैं और चीन की सरकार की बेचैनी भी।

चीन की सरकार आंतरिक मामलो में दिन ब दिन सख्त होती जा रही है यहाँ तक की चीनी सोश्यल मीडिया साइट ‘वीबो’ पर मंडारिन भाषा में की गइ सरकार विरोधी पोस्ट्स हटा दि जाती हैं। आंतरिक विरोध को दबाने में जुटे शी जिनपिंग चाइनीज आर्मी पीएलए को आगामी चार वर्षों में विश्व स्तरीय सेना बनाना चाहते हैं। इसके साथ ही शी जिनपिंग यूनीफिकेशन और रीजनल युद्ध को वरीयता देते हुए दिख रहे हैं। शी जिनपिंग प्रत्येक स्तर पर अपनी सेना को युद्ध के लिए तैयार रहने के साथ-साथ शक्तिशाली बनाने की मंशा पाले हुए हैं। इसलिए भारत के विरुद्ध चाइनीज आर्मी के दुस्साहस का भारत की तरफ से उनकी ही भाषा में उत्तर दिया जाता है अथवा सख्त प्रतिक्रिया दी जाती है तो चीन की चिंता बढ जाती है,जिसके निश्चित कारण हैं। अगर वास्तविक स्थिति देखे तो चीन भी यह जान गया है की आज का भारत 1962 का भारत नहि है इसलिए चीन भारत के साथ कोई बड़ा युद्ध करना कदापि नहीं चाहेगा,लेकिन वह भारत को दबाव में रखने की कोशिश करता रहेगा। मुख्य रूप से तो शी जिनपिंग के निशाने पर ताइवान है, परंतु भारत उपमहाद्वीपीय शक्ति के रूप में स्वीकार्य हो रहा है और भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा निरंतर बढ़ रही है। इसलिए चीन यदि रीयूनीफिकेशन के बहाने ताइवान और तिब्बत को निशाना बनाने की कोशिश कर सकता है तो वह तवांग यानी अरुणाचल और सिक्किम तक अपनी हरकतों के दायरे का विस्तार भी इस जैसी किसी छद्म नीति के जरिये कर सकता है।



भारत को सतर्क रहना होगा

वैसे वर्तमान युग यथार्थवाद से कहीं अधिक प्रतीकवाद और संदेहवाद का युग है और चीन प्रतीकवाद और संदेहवाद का सहारा अधिक ले रहा है। हालांकि भारत ‘ग्लोबल वैल्यू चेन’ में सक्रिय भूमिका निभाने के साथ एक एशियाइ शक्ति के रूप में उभरता हुआ दिख रहा है ऐसे में भारत को भी सतर्क रहना होगा क्योंकि चीन बहुआयामी से बहुरूपिये तक की भूमिका में समग्र विश्व के समक्ष नजर आता है जिसमें व्यापार के ‘वेपनाइजेशन’ से लेकर ‘डिप्लोमैटिक सिंबोलिज्म’ तक बहुत कुछ शामिल है। अत: भू-राजनीतिक खेल अब केवल दो शब्दों तक ही सीमित नहीं रह गया है, अपितु बहुत कुछ है जो द्रश्यमान नहीं है। इसलिए केवल आंख और कान ही नहीं खुले रखने होंगे, बल्कि मस्तिष्क को प्रति क्षण सक्रिय और संवेदनशील बनाए रखना होगा।

पिछले दिनों भारत और चीन, दोनों ही देशों की तरफ से दो बयान आए। एक बयान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की तरफ से था जो उन्होंने दिल्ली में सैन्य कमांडरों के सम्मेलन को संबोधित करते हुए दिया था। उनका कहना था, ‘भारत एक शांति प्रिय देश है जिसने कभी किसी देश को ठेस पहुंचाने की कोशिश नहीं की, परंतु यदि देश के अमन-चैन को भंग करने की कोई कोशिश की जाती है तो उसका मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा।’ दूसरा बयान चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग आठ नवंबर को दे चुके है वो है।वैश्विक राजनितिक विशेषज्ञ भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का बयान चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के उस बयान का ही प्रत्युत्तर मान रहे है।

सेंट्रल मिलिट्री कमीशन (सीएमसी) के संयुक्त अभियान कमान मुख्यालय में सैन्य कर्मियों को संबोधित करते हुए शी जिनपिंगने कहा था ‘चीन की राष्ट्रीय सुरक्षा बढ़ती अस्थिरता व अनिश्चितता का सामना कर रही है। ऐसे में हमें युद्ध लड़ने और जीतने के लिए तैयार रहना चाहिए।’ शी जिनपिंगने उसी समय चीनी सेना (PLA) को 'सैन्य प्रशिक्षण और युद्ध की तैयारियों को बढ़ाने’ का आह्वान भी किया। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इस बयान पर सवाल उठता है कि क्या ये बयान औपचारिक थे जो सामान्य स्थितियों में भी देशों के माध्यम से अपने स्टेटस को व्यक्त करने के लिए दिए जाते रहते हैं या फिर इनके निहितार्थ कुछ और हैं ?

कैसे पिछड रहा है चीन ?

इस पुर्व भुमिका के बाद प्रश्न यह उठ रहा है की चीन वैश्विक वर्चस्व कायम करने की उसकी दौड में भारत से कैसे पिछड रहा है या पिछड गया है ? युरोपिय युनियन के और अन्य देशोने जिस तरह चीन से किनार करने की शुरुआत की है और वैश्विक महासत्ता अमेरिका के साथ मिलकर जिस तरह युक्रेन का समर्थन कर, ताइवान को शस्त्रो को देकर तथा तवांग में चीन के दुस्साहस के बाद भारत का समर्थन कर के जो चित्र प्रस्तुत किया है  उसको देख यह कहना गलत नहि होगा की चीन वैश्विक वर्चस्व कायम करने की अपनी मंशा में भारत से पिछड गया है 

शनिवार, 24 दिसंबर 2022

भारत में चलता था ढाइ रुपये का नोट

 



भारत में करंसी का इतिहास 2500 साल पुराना हैं। बात सन 1917 की है जब 1 रुपया 13 डॉलर के बराबर हुआ करता था।  वर्ष 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ तब 1 रूपया 1 डॉलर कर दिया गया। स्वतंत्रता के समय देश पर कोई कर्ज नहीं था। वर्ष 1951 में पहली पंचवर्षीय योजना के लिए सरकार ने कर्ज लिया और इसके बाद यह सिलसिला चलता रहा। 1 रूपए में 100 पैसे होंगे, ये बात सन 1957 में लागू की गई थी। पहले इसे 16 आने में बांटा जाता था। अगर अंग्रेजों का बस चलता तो आज भारत की करंसी पाउंड होती लेकिन रुपए की मजबूती के कारण ऐसा संभव नहीं हुआ। वर्ष 1948 से वर्ष 1966 के बीच रुपया लगातार गिरता चला गया और इंदिरा गांधीने 6 जुन1966 के दिन रुपये का अवमुल्यन करने की घोषणा कर दी और 1 डोलर के सामने रुपये की किमत 7.50 रुपये हो गयी जो अवमूल्यन से पहले 4.76 रुपये थी, रुपया गिरते गिरते वर्ष 1975 में 1 डॉलर 8.39 रूपए हो गया, रुपये के गिरने कि यह परम्परा ऐसी चली की रुपया 1985 में 1 डॉलर 12 रूपए तक महेंगा हो गया।

यह वो दौर था जब देश में राजनितिक अस्थिरता चारो तरफ दिख रही थी, भारत की अर्थ व्यवस्था जैसे ढह जायेगी ऐसे आसार दिख रहे थे, 1991 आते आते पुरा देश बेतहाशा मंहगाई की जंजिर में जैसे फंसता जा रहा था, यह वो समय था जब कभी भारतीय रीजर्व बेंक के गवर्नर रहे प्रतिष्ठीत अर्थशास्त्री मनमोहंसिन्ह भारत के अर्थमंत्री बने, विकास दर कम होता जा रहा था, ऐसा माना जाता है कि यह भारतीय अर्थव्यवस्था का सबसे कठिन दौर था, इस दौर में राजकोषीय घाटा, सकल घरेलू उत्पाद का 7.8%, ब्याज भुगतान सरकार के कुल राजस्व संग्रह का 39%, चालू खाता घाटा (CAD) सकल घरेलू उत्पाद का 3.69% और थोकमूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति लगभग 14% थी और फॉरेन रिर्जव कम होने की कगार पर आ गया था, थोडे दिन तक कि आयात का बिल दे पाये इतना हो गया था भारत का फॉरेन रिर्जव भंडार, इन सब परिस्तिथियों में भारत विदेशियों को भुगतान नही कर पा रहा था जिसके कारण अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा भारत को दिवालिया घोषित किया जा सकता था, अतः इन सभी समस्याओं से निपटने के लिए सरकार ने भारतीय मुद्रा का अवमूल्यन किया और विनिमय दर 24.58 रूपये/1अमेरिकी डॉलर हो गयी। वित्तमंत्री मनमोहनसिन्ह के उपाय कारगर नहि हो रहे थे, 1993 में  एक डॉलर 31.37 रूपए। 2000-2010 के दौरान यह एक डॉलर की कीमत 40-50 रूपए तक पहुंच गई। 2013 में तो यह हद पार हो गई और यही एक डॉलर की कीमत 65.50 रूपए तक पहुंच गई।

भारत में प्रथम बार कागज की नोट

RBI, ने जनवरी 1938 में पहली बार 5 रूपए की पेपर करंसी छापी थी जिस पर किंग जार्ज-6 का चित्र था। इसी साल 10,000 रूपए का नोट भी छापा गया था लेकिन 1978 में इसे पूरी तरह बंद कर दिया गया। आजादी के बाद पाकिस्तान ने तब तक भारतीय मुद्रा का प्रयोग किया जब तक उन्होनें काम चलाने लायक नोट न छाप लिए।

भारतीय नोट पर महात्मा गांधी की जो फोटो छपती हैं वह तब खींची गई थी जब गांधीजी, तत्कालीन बर्मा और भारत में ब्रिटिश सेक्रेटरी के रूप में कार्यरत फ्रेडरिक पेथिक लॉरेंस के साथ कोलकाता स्थित वायसराय हाउस में मुलाकात करने गए थे।

यह फोटो 1996 में नोटों पर छपनी शुरू हुई थी। इससे पहले महात्मा गांधी की जगह अशोक स्तंभ छापा जाता था। भारत के 500 और 1,000 रूपये के नोट नेपाल में नहीं चलते। 500 का पहला नोट 1987 में और 1,000 का पहला नोट 2000 में बनाया गया था।

भारत में 75, 100 और 1,000 रूपए के भी सिक्के छप चुके हैं।1 रूपए का नोट भारत सरकार द्वारा और 2 से 1,000 तक के नोट RBI द्वारा जारी किये जाते हैं। एक समय पर भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए 10 का नोट 5thpillar नाम की गैर सरकारी संस्था द्वारा जारी किए गए थे।

10 रूपये के सिक्के को बनाने में 6.10 रूपए की लागत आती हैं। हर सिक्के पर सन के नीचे एक खास निशान बना होता हैं आप उस निशान को देखकर पता लगा सकते हैं कि ये सिक्का कहां बना है। मुंबई – हीरा ◆, नोएडा – डॉट. हैदराबाद – सितारा ★ कोलकाता- कोई निशान नहीं। नोटों पर सीरियल नंबर इसलिए डाला जाता हैं ताकि आरबीआई(RBI) को पता चलता रहे कि इस समय मार्केट में कितनी करंसी हैं। रूपया भारत के अलावा इंडोनेशिया, मॉरीशस, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका की भी करंसी हैं।



2 जनवरी 1918 में ब्रिटिश सरकार ने एक ढाई (2.5) रुपए का नोट जारी किया था. साल 2018 में इस दुर्लभ नोट के सौ साल पूरे हुए हैं. इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक ये नोट सफेद कागज़ पर छापा गया था और इसपर जॉर्ज पंचम की मुहर छपी थी. इस नोट पर ब्रिटिश फाइनेंस सेक्रेट्री एम एम एस गब्बी के सिग्नेचर थे

ये नोट सात सर्किल्स के हिसाब से प्रिफिक्स थे. ये सात सर्किल कानपुर (c), बॉम्बे (B), कराची (K), लाहौर(L), मद्रास (M) और रंगून (R). ये नोट शुरुआत में इन इलाकों में ही चलता था. एक समय इस ढाई रुपए की कीमत 1 डॉलर के बराबर थी.

जिस दौर में ये ढाई रुपए का नोट जारी हुआ था उस समय भारत में 'आना' सिस्टम था. एक रुपए में सोलह 'आने' होते थे. इसका मतलब हुआ कि ढाई रुपए के नोट में 40 'आने' होते हैं.

साल 1926 में ब्रिटिश सरकार ने ये नोट बंद कर दिया और दोबारा जारी नहीं किया. अब ये नोट दुर्लभ बन गया है. इसके बाद एक नीलामी में ढाई रुपए का ये नोट 6,40,000 का बिका था.

गुरुवार, 3 नवंबर 2022

भारत के अंतरिक्ष प्रक्षेपण यान

 








 

 

क्या होता है सैटेलाइट लोंच वेहिकल ?

किसी भी देश की संचार व्यवस्था तथा सुरक्षा को मजबूत करने में विभिन्न मानव निर्मित कृत्रिम उपग्रहों की अहम भूमिका होती है, ऐसे उपग्रहों को अंतरिक्ष की अलग-अलग कक्षाओं में स्थापित करना होता हैकिसी भी कृत्रिम उपग्रह को अंतरिक्ष में भेजने के लिए हमें एक यान की आवश्यकता पड़ती है जिसकी सहायता से उस उपग्रह को अंतरिक्ष में स्थापित किया जाता है जिसके लिए ऐसे दक्ष वाहनों की आवश्यकता होती है, यह बहुत ही बडी चुनौती हैजो सुरक्षित तरीके से इन उपग्रहों को अंतरिक्ष तक ले जा सके इसी यान को अंग्रेजी में सैटलाइट लॉन्च व्हीकल (SLV अर्थात Satellite Launch Vehicles)और हिंदी में उपग्रह प्रक्षेपण यान कहा जाता है। सैटेलाइट लौंच वेहिकल एक प्रकार का रोकेट प्रोपेलर होता है जिसका प्रयोग कर कृत्रिम उपग्रहों को अंतरिक्ष में (विशेषकर पृथ्वी की कक्षा या उससे पार) भेजा जाता है। SLV अर्थात Satellite Launch Vehicles एक ऐसा वाहन है, जिसकी सहायता से किसी सेटेलाइट यानी उपग्रह को अंतरिक्ष में भेजा जाता है। सैटलाइट लॉन्च व्हीकल (SLV अर्थात Satellite Launch Vehicles इसके प्रकारों की बात करें तो SLV के मुख्यतः निम्नलिखित प्रकार हैं।

  1. उपग्रह प्रक्षेपण यान : Satellite Launch Vehicles (SLV)
  2. संवर्धित उपग्रह प्रक्षेपण यान : Augmented Satellite Launch Vehicle (ASLV)
  3. ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान : Polar Satellite Launch Vehicle (PSLV)
  4. भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान : Geosynchronous Satellite Launch Vehicle (GSLV)
  5. लघु उपग्रह प्रक्षेपण यान : Small Satellite Launch Vehicle (SSLV)

उपग्रह प्रक्षेपण यान : Satellite Launch Vehicles (SLV)

उपग्रह प्रक्षेपण यान या एसएलवी (SLV) परियोजना भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन द्वारा 1970 के       दशक में उपग्रहों को प्रक्षेपित करने के लिए आवश्यक प्रौद्योगिकी विकसित करने के लिए मिसाइल मैन' के नाम से प्रसिद्ध डो. एपीजे अब्दुल कलाम की अध्यक्षता में की गयी थी। उपग्रह प्रक्षेपण यान का उद्देश्य उपग्रह को 400 किलोमीटर की ऊंचाई तक 40 किलो तक के पेलोड को अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित करना था। यह उपग्रह प्रक्षेपण यान चार चरण वाले ठोस इंधनयुक्त इंजन से लैस रॉकेट था। उपग्रह प्रक्षेपण यान (एसएलवी-3) का पहला प्रक्षेपण 10 अगस्त 1979 को श्रीहरिकोटा से हुआ, इसमें 35 किलोग्राम (77 पौंड) का रोहिणी उपग्रह पेलोड के तौर पर था परन्तु दोषपूर्ण वाल्व के कारण वाहन लांच के 317 सेकंड के बाद बंगाल की खाड़ी में दुर्घटनाग्रस्त हो गया और यह प्रक्षेपण विफल रहा। उसके बाद दुसरा प्रक्षेपण 18 जुलाइ 1980 के दिन 35 किलोग्राम (77 पौंड) का रोहिणी उपग्रह के साथ हुआ जो सफल हुआ। तीसरी उडान 31 मई 1981 के दिन 38 किलोग्राम (84 पौंड) वजन के रोहिणी उप्ग्रह के साथ हुइ और उपग्रह निश्चित कक्षा में स्थापित नहि होने के कारण दुर्भाग्यवश यह उडान असफल हुइ तीन उडानो में से दो असफल होने के बावजुद इसरो के वैज्ञानिकोने अपने प्रयास नही छोडे और SLV-3 का चौथा और अंतिम प्रक्षेपण करीब दो वर्ष पश्चात 17 अप्रैल 1983 के दिन सफलतापुर्वक किया गया, SLV-3 के सभी चार उपग्रह प्रक्षेपण यान को शार(SHAR) के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के उपग्रह प्रक्षेपण यान लॉन्च पैड से लॉन्च किये गये थे। इस प्रक्षेपण यान के द्वारा भारत में, भारत के वैज्ञानिको के द्वारा निर्मित रोहिणी उपग्रह को प्रक्षेपित किया गया।

 

संवर्धित उपग्रह प्रक्षेपण यान : Augmented Satellite Launch Vehicle (ASLV)

संवर्धित उपग्रह प्रक्षेपण यान (Augmented Satellite Launch Vehicle - ASLV) SLV-3 के पप्श्चात भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा SLV-3 से अधिक शक्तिशाली और भू-स्थिर कक्षा में पेलोड के लिए आवश्यक प्रौद्योगिकियों के विकास के लिए 1980 के दशक के दौरान शुरू किया गया था। इसका डिजाइन उपग्रह प्रक्षेपण यान पर आधारित था। संवर्धित उपग्रह प्रक्षेपण यान (ASLV) में पांच चरण ठोस ईंधन के इंजन का प्रयोग किया गया। संवर्धित उपग्रह प्रक्षेपण यान (ASLV)  पृथ्वी की निचली कक्षा में पृथ्वी से करीब 400 किलोमीटर की उंचाइ पर 150 किलो के उपग्रहों स्थापित करने में सक्षम था।

ASLV कार्यक्रम के तहत श्रीहरिकोटा हाई एल्टीट्यूड रेंज में SLV launch pad से चार विकासात्मक उड़ानें संचालित की गईं. पहली दो विकासात्मक उड़ानें जो क्रमशः 24 मार्च, 1987 और 13 जुलाई, 1988 को हुईं, सफल नहीं हो सकीतीसरी विकासात्मक उड़ान 20 मई, 1992 को आयोजित की गई थी जिसमे उपग्रह निश्चित भ्रमणकक्षा में स्थिर नही हो पाया और गलत भ्रमण-स्थिरीकरण के कारण जल्दी निष्क्रीय हो गया और यह प्रक्षेपण आंशिकरुप से सफल रहा। ASLV की चौथी और अंतिम उडान (ASLV-D4) 5 मई, 1994 को संचालित किया गया, जो 106 किलोग्राम के SRSS-C2 उपग्रह को रखने में इच्छित कक्षा में स्थापित करने में सफल रहा।वर्ष 1994 में अंतिम लॉन्च के बाद, ASLV कार्यक्रम अनिश्चित काल के लिए समाप्त कर दिया गया।

ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान : Polar Satellite Launch Vehicle (PSLV)


ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान : Polar Satellite Launch Vehicle (PSLV) भारत की तिसरी पीढी का प्रक्षेपण यान है, यह भारत की पहली लॉन्च वीइकल है जिसमें लिक्विड स्टेज है यानी लिक्विड रॉकेट इंजन का इस्तेमाल किया गया है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) द्वारा अपने सुदूर संवेदी उपग्रह ( Indian Remote Sensing (IRS) satellite) को सूर्य समकालिक कक्षा (sun-synchronous orbits) में प्रक्षेपित करने के लिये विकसित किया गया है। एसएलवी और एएसएलवी उपग्रहो को केवल भू-स्थिर कक्षा में प्रक्षेपित करने में सक्षम थे जबकी पीएसएलवी उपग्रहो को सूर्य समकालिक कक्षा (sun-synchronous orbits) में प्रक्षेपित करने में सक्षम है,पीएसएलवी की एक ओर विषेशता यह है की वो छोटे आकार के उपग्रहों को भू-स्थिर कक्षा में भी भेजने में सक्षम है। पीएसएलवी चार स्टेजों में बंटा हुआ रॉकेट है. इसकी पहली और तीसरी स्टेज में सॉलिड रॉकेट मोटर्स का इस्तेमाल हुआ है. जबकि दूसरी और चौथी स्टेज लिक्विड रॉकेट और इंजन से लैस है. पीएसएलवी में इनके अलावा स्ट्रैप्स का इस्तेमाल होता है, जो पहली स्टेज में रॉकेट को ऊंचाई तक ले जाने में ताकत देता है.

पीएसएलवी का प्रथम विकास प्रक्षेपण 20 सितम्बर1993 के दिन 846 किलोग्राम वजन के भारतीय रिमोट सेंसिंग उपग्रह 1 को लेकर श्रीहरिकोटा लौंच पेड से किया गया था, हालांकि सोफ्टवेर में त्रुटी के कारण यह प्रक्षेपण उडान भरने के केवल 700 सेकंड में ही बंगाल की खाडी में दुर्घटनाग्रस्त हो गया. ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान : Polar Satellite Launch Vehicle (PSLV) को कुल 37 बार लौंच किया गया जिसमें पीएसएलवी-जी: 12 उडानेपीएसएलवी-सीए: 11 उडाने और पीएसएलवी-एक्सएल : 14 उडाने हुई उसमें से 35 उडाने सफल रही. 29 सितंबर 1997 के दिन भेजी गई 1 उडान  आंशिक रुप से सफल रही जबकी 31 अगस्त 2017 के दिन की 1 उडान असफल हुई.

ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान : Polar Satellite Launch Vehicle (PSLV) के संस्करण

इसरो ने विभिन्न मिशन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पीएसएलवी के कई संस्करणो को विकसित किया है। वर्तमान में पीएसएलवी के दो परिचालन संस्करण हैं - एक है कोर-अलोन (पीएसएलवी-सीए) जो स्ट्रैप-ऑन मोटर्स के बिना का है, और दुसरा है (पीएसएलवी-एक्सएल) संस्करण, जिसमें छह विस्तारित लंबाई (एक्सएल) स्ट्रैप-ऑन मोटर्स हैं, इस कोंफ्रिगेशन के द्वारा पीएसएलवी 3,800 किग्रा (8,400 पाउंड) के पेलोड को लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में  और सन सिंक्रोनस ऑर्बिट कक्षा में 1,800 किग्रा (4,000 पाउंड) तक की पेलोड को प्रक्षेपित करने में सक्षम हैं। पीएसएलवी को अलग-अलग वर्जन में विभाजित किया गया है. इनमें PSLV-G, PSLV-CA, PSLV-XL,PSLV-DL, PSLV-QL और जिसको विकसित करने का कार्य अभी चालु है ऐसा PSLV-3S शामिल हैं

  1. PSLV-G (पीएसएलवी-जी) : पीएसएलवी-जी, पीएसएलवी का  स्टांडर्ड या 'जेनेरिक' वर्जन है। पीएसएलवी-जी संस्करण में चार चरण है विकल्पत: प्रयोग करने हेतु ठोस और तरल इंधन उपयोग होता है, पीएसएलवी में 9 टन प्रोपलंट लोडिंग के साथ छह स्ट्रैप-ऑन मोटर्स (पीएसओएम या एस9) का इस्तमाल होता है। इस संस्करण के द्वारा 1,678 किलोग्राम (3,699 पाउंड) से 622 किमी (386 मील) तक सूर्य-तुल्यकालिक कक्षा (सन सिंक्रोनस ऑर्बिट - Sun-synchronous orbit) में लॉन्च करने की क्षमता थी। पीएसएलवी-जी के बंद होने से पहले का अंतिम परिचालन प्रक्षेपण पीएसएलवी-सी35 था।
  2. PSLV-CA (पीएसएलवी-सीए) : PSLV-CA, CA का अर्थ है "कोर अलोन", मॉडल का सर्व प्रथम बार 23 अप्रैल 2007 उपयोग में लाया गया। CA मॉडल में PSLV स्टांडर्ड संस्करण द्वारा उपयोग किए गए छह स्ट्रैप-ऑन बूस्टर शामिल नहीं हैं, अपितु दो SITVC टैंक के साथ पहले चरण के लिये अतिरिक्त दो बेलनाकार वायुगतिकीय स्टेबलाइजर्स के साथ रोल कंट्रोल थ्रस्टर मॉड्यूल संलग्न हैं। CA संस्करण के चौथे चरण में इसके स्टांडर्ड संस्करण की तुलना में 400 किग्रा (880 पौंड) कम प्रोपलंट है। पीएसएलवी-सीए की क्षमता 1,100 किग्रा (2,400 पाउंड)  622 किमी (386 मील) की दुरी तक सूर्य-तुल्यकालिक कक्षा (सन सिंक्रोनस ऑर्बिट - Sun-synchronous orbit) तक लॉन्च करने की है।
  3. PSLV-XL (पीएसएलवी-एक्सएल) पीएसएलवी-एक्सएल (PSLV-XL) पीएसएलवी-जी अथवा पीएसएलवी स्टांडर्ड का उन्नत संस्करण (upgraded version) है, जो 12 टन प्रोपेलंट से लैस करके स्ट्रेच्ड स्ट्रैप-ऑन बूस्टर द्वारा अधिक शक्तिशाली बनाया गया है। पीएसएलवी-एक्सएल लिफ्ट-ऑफ पर 320 टन वजन रहता है, बड़े स्ट्रैप-ऑन मोटर्स (PSOM-XL या S12) के कारण पीएसएलवी-एक्सएल अधिक पेलोड क्षमता प्राप्त करता है। इसरो ने PSLV के लिए स्ट्रैप-ऑन बूस्टर के उन्नत संस्करण (Improved version) का 29 दिसंबर 2005 को सफलतापूर्वक परीक्षण किया। पीएसएलवी-सी11 के द्वारा चंद्रयान-1 का प्रक्षेपण पीएसएलवी-एक्सएल का प्रथम प्रयोग था। पीएसएलवी के यह प्रकार 1,800 किग्रा (4,000 पाउंड) के पेलोड को सूर्य-तुल्यकालिक कक्षा (सन सिंक्रोनस ऑर्बिट - Sun-synchronous orbit) में स्थापित करने की क्षमता रखता है। एक्सएल वैरियंट अब तक का सबसे शक्तिशाली राकेट है जिसका इस्तेमाल चंद्रयान और मंगलयान जैसे मिशन में हो चूका है।
  4. PSLV-DL (पीएसएलवी-डीएल)‌ : पीएसएलवी-डीएल संस्करण में 12 टन वजन के प्रोपलंटवाले दो स्ट्रैप-ऑन बूस्टर हैं पीएसएलवी-डीएल संस्करण का उपयोग करने वाली पहली उड़ान 24 जनवरी 2019 को पीएसएलवी-सी44 ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पीएसएलवी) ने की। पीएसएलवी-सी44 1,257 किग्रा (2,771 पाउंड) पेलोड को 600 किमी (370 मील) सूर्य-तुल्यकालिक कक्षा (सन सिंक्रोनस ऑर्बिट - Sun-synchronous orbit) तक लॉन्च करने में सक्षम है।
  5. PSLV-QL (पीएसएलवी-क्यूएल) : पीएसएलवी-क्यूएल संस्करण में प्रत्येक में 12 टन प्रोपलंट हो ऐसे चार ग्राउंड-लाइट स्ट्रैप-ऑन बूस्टर हैं। पीएसएलवी-क्यूएल की पहली उड़ान  1 अप्रैल 2019 को हुइ और प्रक्षेपण यान का नाम पीएसएलवी-सी45 रखा गया था। इसकी क्षमता 1,523 किग्रा (3,358 पाउंड) पेलोड को 600 किमी (370 मील) दुरी पर सूर्य-तुल्यकालिक कक्षा (सन सिंक्रोनस ऑर्बिट - Sun-synchronous orbit) में लॉन्च करने की है।
  6. PSLV-3S (पीएसएलवी-3S) (Concept - संकल्पना : पीएसएलवी-3एस की कल्पना पीएसएलवी के तीन चरणों वाले संस्करण के रूप में की गई है, जिसमें इसके छह स्ट्रैप-ऑन बूस्टर जोडा गया है और दूसरे चरण के तरल इंधन को हटा दिया गया है। पीएसएलवी -3 एस का कुल उत्थापन द्रव्यमान (Lift-off mass) 175 टन और 550 किमी लॉ अर्थ ओर्बिट (LEO) में 500 किलोग्राम पेलोड प्रक्षेपित करने की क्षमता अपेक्षित है।

पीएसएलवी के रेकोर्ड

 

पीएसएलवी ने छोटे उपग्रहों के लिए राइडशेयर सेवाओं के अग्रणी प्रदाता के रूप में विश्वभर में विश्वसनीयता प्राप्त की है, इसके कई बहु-उपग्रह परिनियोजना अभियान राइड-शेयरिंगजिसमें आमतौर सहायक पेलोड प्राथमिक रुप से  भारतीय होता है साथ साथ अन्य पेलोड भी होते  हो स्फलतापुर्वक लोंच की है  22 जून, 2016 में इस यान ने पीएसएलवी सी-34 के माध्यम से रिकॉर्ड 20 उपग्रह एक साथ छोड़े और इससे पहले 28 अप्रैल 2008 को इसरो ने एक साथ 10 उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजकर एक ही बार में सबसे ज़्यादा उपग्रह अंतरिक्ष में भेजने का विश्वरिकॉर्ड बनाया था उसे तोड दिया था। 15 फरवरी 2017 को श्रीहरिकोटा के सतीश धवन लॉन्चिंग सेंटर से पीएसएलवी-सी37 ने 104 उपग्रह एक साथ अंतरिक्ष में भेजे . इस सफल प्रक्षेपण में 104 उपग्रहों में अमेरिका के 96, भारत के 3 और इजरायल, हॉलैंड, यूएई, स्विट्जरलैंड और कजाकिस्तान के भी सैटेलाइट शामिल थे. इस से पुर्व रूसी अंतरिक्ष एजेंसी ने एक साथ 37 उपग्रहों के सफल प्रक्षेपण कर रेकोर्ड बनाया था जिसे भारतने केवल तोडा अपितु एक साथ 104 उपग्रह प्रक्षेपित करने में सफलता हासिल करने वाला विश्व का पहला देश बन गया. भारत के अंतरिक्ष संशोधन अनुसंधान इसरो के पीएसएलवी ने जुन  2022 तक कुल 36 देशो के 345 उपग्रहो को अंतरिक्ष में सफलतापुर्वक प्रक्षेपित किया है.

 

भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान : Geosynchronous Satellite Launch Vehicle (GSLV)

भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान (GSLV) : जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (GSLV) प्रोजेक्ट 1990 में जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट्स के लिए भारतीय लॉन्च क्षमता हासिल करने के उद्देश्य से शुरू किया गया था।जीएसएलवी ऐसा बहुचरण रॉकेट है जो दो टन से अधिक भार के उपग्रह को पृथ्वी से 36000 कि॰मी॰ की ऊंचाई पर भू-स्थिर कक्षा में स्थापित कर देता है जो विषुवत वृत्त या भूमध्य रेखा की सीध में होता है।  जीएसएलवी अपने डिजाइन और सुविधाओं में ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान यानि पीएसएलवी से बेहतर है। यह तीन श्रेणी वाला प्रक्षेपण यान होता है जिसमें पहला ठोस-आधार या पुश वाला, दूसरा तरल दबाव वाला यानि लिक्विड प्रापेल्ड तथा तीसरा क्रायोजेनिक आधारित होता है। इनके तीसरे यानी अंतिम चरण में सबसे अधिक बल की आवश्यकता होती है। रॉकेट की यह आवश्यकता केवल क्रायोजेनिक इंजन ही पूरा कर सकते हैं। इसलिए बिना क्रायोजेनिक इंजन के जीएसएलवी रॉकेट का निर्माण मुश्किल होता है। जीएसएलवी लगभग 5,000 किग्रा (11,000 पाउंड) को पूर्व की निचली पृथ्वी की कक्षा (Low Earth Orbit : LEO :एलईओ) या 2,500 किग्रा (5,500 पाउंड) (एमके II संस्करण के लिए) को 18 डिग्री भूस्थिर स्थानांतरण कक्षा (Geostationary Transfer Orbit :GTO : जीटीओ) में स्थापित कर सकता है।

 

भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान के अलग अलग संस्करण:

भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान (GSLV)  के तीन संस्करण इसरोने विकसीत किये है I जिस भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान (GSLV) में रूसी क्रायोजेनिक चरण (Russian Cryogenic Stage : CS : सीएस) का उपयोग करता है उस जीएसएलवी रॉकेट को जीएसएलवी मार्क I के रूप में नामित किया गया हैजिस भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान (GSLV) में स्वदेशी क्रायोजेनिक अपर स्टेज (सीयूएस) इंजन का उपयोग किया जाता है उस संस्करणों को जीएसएलवी मार्क II और जीएसएलवी मार्क III नाम से नामित किया गया है। जीएसएलवी मार्क III का नाम हाल ही में बदलकर लॉन्च वाहन मार्क 3 (LVM 3) किया गया हैसभी जीएसएलवी प्रक्षेपण श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से किए गए हैं।


  1. GSLV Mark I : 
    GSLV मार्क I की पहली विकासात्मक उड़ान में पहला चरण 129 टन (S125) का था और यह लगभग 1500 किलोग्राम भूस्थिर स्थानांतरण कक्षा (Geostationary Transfer Orbit :GTO : जीटीओ) में लॉन्च करने में सक्षम था। दूसरी विकासात्मक उड़ान ने S125 चरण को S139 से परिवर्तित किया गया था, इसमें 138 टन वजन के प्रोपलंट के साथ प्रथम उडान में उपयोग में ली गई ठोस इंधंनवाली मोटर का उपयोग किया गया था। तरल इंधनवाले इंजनों की सभी चैम्बरो के दबाव को हाइ प्रोपलंट द्रव्यमान और इंधन की कार्यक्षमता सक्षम करने के लिये बढ़ाया गया था। इन सुधारों ने जीएसएलवी को अतिरिक्त 300 किलोग्राम पेलोड ले जाने के लिये सक्षमता प्रदान की। GSLV मार्क I, GSLV-F06 की चौथी परिचालन उड़ान में 15 टन प्रोपलंट लोडिंग के साथ C15 नामक एक लंबा तीसरा चरण था और इसमें 4 मीटर व्यास वाला पेलोड फेयरिंग भी लगाया गया था।
  2. GSLV Mark II : GSLV Mark II (जीएसएलवी मार्क II) में रूसी क्रायोजेनिक इंजन का उपयोग किया जाता था, GSLV Mark II उसका विकसीत संस्करण हैI GSLV Mark II (जीएसएलवी मार्क II में इसरो द्वारा विकसित किया गया क्रायोजेनिक इंजन, सीई-7.5 का उपयोग करता है, और 2500 किलोग्राम को भूस्थिर स्थानांतरण कक्षा में लॉन्च करने में सक्षम है। 2018 से लॉन्च किये जानेवाले जीएसएलवी के लिये 6% बढ़ा हुआ थ्रस्ट देनेवाले "विकास" इंजन का संस्करण विकसित किया गया था। "विकास" इंजन को 29 मार्च 2018 को प्रथम बार GSAT-6A लॉन्च के दूसरे चरण में उपयोग में लाया गया और इस इंजन के बारे में पुरे विश्व को जानकारी प्राप्त हुइ। इसका उपयोग भविष्य के मिशनों के लिये चार विकास इंजनों के पहले चरण के बूस्टर के तौर पर किया जानेवाला था।
  3. GSLV Mark III GSLV Mark III(जीएसएलवी मार्क III) : जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल मार्क III (GSLV Mk3) भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) द्वारा विकसित एक तीन-चरण मध्यम-लिफ्ट लॉन्च वेहिक्ल है। मुख्य रूप से संचार उपग्रहों को भूस्थिर कक्षा में लॉन्च करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।अपने पूर्ववर्ती GSLV Mk II की तुलना में GSLV Mk III में अधिक पेलोड क्षमता है।जीएसएलवी-III का विकास की योजना 2000 के दशक में बनाइ गइ और उस पर कार्य भी शुरू कर दीया गया, शुरुआती योजना के अंतर्गत वर्ष 2009-2010 में इसके प्रथम प्रक्षेपण अपेक्षित किया गया था परंतु कई कारणो से इस कार्यक्रम में देरी होती चली गइ जिसमे सब से बडा विक्षेप था 2010 में हुए भारतीय क्रायोजेनिक इंजन को मीली विफलता। जीएसएलवी मार्क III के विकास के कार्य में अनेक मुश्किले और विक्षेप के बाद अंतत: एक उपकक्षा परीक्षण उड़ान (Sub-Orbital Test Flight) तीसरे निष्क्रिय क्रायोजेनिक चरण के साथ सफलतापूर्वक 18 दिसंबर 2014 को कि गयीI इसरो ने सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से 5 जून 2017 को जीएसएलवी एमके III का पहला कक्षीय परीक्षण (Orbital Test) सफलतापूर्वक किया। जीएसएलवी एमके III के प्रथम कक्षीय परीक्षण की विशेष बात यह थी की इसमें भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के भविष्य के भारतीय मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम के लिए एक प्रायोगिक परीक्षण वाहन क्रू मॉड्यूल वायुमंडलीय पुनः प्रवेश प्रयोग (Crew Module Atmospheric Re-entry Experiment या CARE का भी सफलतापुर्वक परिक्षण किया गया.

GSLV Mark III GSLV Mark III (जीएसएलवी मार्क III) की विशेष उपलब्धिया

GSLV Mk III  (जीएसएलवी मार्क III) की मुख्य रुप से बडी उपलब्धि वर्तमान में हम गीन सकते है जिसमें सर्वप्रथम है अपने प्रथम कक्षीय परीक्षण में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के भविष्य के भारतीय मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम के लिए एक प्रायोगिक परीक्षण वाहन क्रू मॉड्यूल वायुमंडलीय पुनः प्रवेश प्रयोग ( CARE : Crew Module Atmospheric Re-entry Experiment) का सफलतापुर्वक परिक्षण किया गया, दुसरी उपलब्धी यह है की इसी GSLV Mk III  (जीएसएलवी मार्क III) के द्वारा भारत के महात्वाकांक्षी चंद्रयान -2 का भी प्रक्षेपण किया गया थाएक चंद्र ऑर्बिटर, लैंडर और रोवर शामिल हैं, जो सभी स्वदेशी रूप से विकसित किए गए थे और इसका उपयोग भारतीय मानव स्पेसफ्लाइट प्रोग्राम के तहत पहला क्रू मिशन गगनयान को ले जाने के लिए किया जाएगा। मार्च 2022 में, यूके स्थित वैश्विक संचार उपग्रह प्रदाता वनवेब ने इसरो के साथ पीएसएलवी के साथ जीएसएलवी एमके III पर वनवेब उपग्रहों को लॉन्च करने के लिए एक समझौता किया जिस के तहत पहला प्रक्षेपण 22 अक्टूबर 2022 को हुआ, 'एलवीएम-3-एम2/वनवेब इंडिया-1 मिशन ने पृथ्वी की निचली कक्षा के लिए 36 उपग्रहों को इंजेक्ट किया गया। इस रॉकेट की क्षमता 8,000 किलोग्राम तक के उपग्रहों को अंतरिक्ष में ले जाने की है। इसरो के अनुसार, मिशन में वनवेब के 5,796 किलोग्राम वजन के 36 उपग्रहों के साथ अंतरिक्ष में जाने वाला यह पहला भारतीय रॉकेट बन गया है। LVM3-M2 मिशन के सफल प्रक्षेपण के बाद ISRO ने अंतरिक्ष की एक विशेष कक्षा में पेलोड लगाने के लिए वाहन की क्षमता पर किसी भी अस्पष्टता को दूर करने के लिए GSLV Mk3 का नाम बदलकर LVM 3 कर दिया

 

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